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Sunday, 9 June 2013

"साहित्य-ऋषि लाला जगदलपुरी : लाला जगदलपुरी समग्र"

आज एक बहुत बड़ी खुशी आप सब साथियों के साथ बाँटने का मन बना कर उपस्थित हुआ हूँ। पिछले आठ वर्षों से जारी मेहनत अब जा कर रंग लाने को है। वरिष्ठतम साहित्यकार 92 वर्षीय लाला जगदलपुरी जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर तैयार पाण्डुलिपि "साहित्य-ऋषि लाला जगदलपुरी : लाला जगदलपुरी समग्र" शीर्षक से प्रकाशन जगत में मील का पत्थर साबित होने जा रहे दिल्ली के यश प्रकाशन से पुस्तक रूप में शीघ्र ही प्रकाशित हो कर आपके-हमारे बीच होगी। यह कम्पोज की जा चुकी है और इसके प्रूफ रीडिंग का काम जारी है। कुल 582 पृष्ठों में समायी इस सामग्री का प्रकाशन दो भागों में होने जा रहा है। पहले भाग में लाला जी का व्यक्तित्व पक्ष है तो दूसरे भाग में उनका चुनिन्दा गद्य तथा समग्र पद्य साहित्य। सहयोगी लेखकों में सम्मिलित हैं प्रो. (डॉ). धनंजय वर्मा, राम अधीर, लक्ष्मीनारायण "पयोधि", निर्मला जोशी, त्रिलोक महावर, डॉ. देवेन्द्र दीपक, त्रिभुवन पाँडेय, डॉ. रामकुमार बेहार, जयप्रकाश राय, रऊफ परवेज़, डॉ. सुरेश तिवारी, आई. जानकी, अवध किशोर शर्मा, संजीव तिवारी, केवल कृष्ण, प्रो. बी. एल. झा, सुरेन्द्र रावल, डॉ. राजेश सेठिया, राजीव रंजन प्रसाद, डॉ. रूपेन्द्र कवि, चितरंजन रावल, योगेन्द्र देवांगन, जगदीश दास, महावीर अग्रवाल, के. एल. श्रीवास्तव, उमाशंकर तिवारी  और डॉ. हबीब राहत "हुबाब"।

Tuesday, 12 March 2013

लोक साहित्य लोक जागरुकता का प्रतीक है : डॉ. कौशलेन्द्र मिश्र


"बस्तर का लोक साहित्य यहाँ के आम लोगों के संघर्ष, मान्यताओं एवं समृद्ध ज्ञान का प्रतीक है। लिपि के विकास के बहुत पहले से ही यहाँ की बोलियों में तमिल, राजस्थानी, अरबी और कई अन्य भाषाओं के प्रभाव शामिल हो गये थे।" ये उद्गार व्यक्त किये डॉ. कौशलेन्द्र मिश्र ने, जो एक चिकित्साधिकारी व साहित्यानुरागी हैं। वे श्री लाला जगदलपुरी एवं हरिहर वैष्णव द्वारा सम्पादित एवं नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया (मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार) द्वारा प्रकाशित पुस्तक "बस्तर की लोक कथाएँ" के लोकार्पण अवसर पर पुस्तक की समीक्षा कर रहे थे। इस आयोजन में मुख्य अतिथि अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिलब्ध शिल्पी डॉ. जयदेव बघेल और अध्यक्ष स्थानीय शिक्षाविद् टी. एस. ठाकुर थे। यह आयोजन नेशनल बुक ट्रस्ट ने छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य परिषद के सहयोग के किया था।


आगंतुकों का औपचारिक स्वागत करते हुए नेशनल बुक ट्रस्ट के संपादक पंकज चतुर्वेदी ने जानकारी दी कि उनका संस्थान पुस्तक पढ़ने की रुचि के उन्नयन के लिये किस तरह की गतिविधियों का आयोजन करता है। लोकार्पित पुस्तक पर समीक्षा प्रस्तुत करते हुए डॉ. कौशलेन्द्र मिश्र ने बताया कि अबुझमाड़ की लोक कथा रक्त-संबंधों में विवाह करने से उत्पन्न होने वाले विकारों की जिस तरह से जानकारी देती है, यह साक्ष्य है कि हमारी जनजातियों की मान्यताएँ बेहद पुरातन काल से वैज्ञानिक रही हैं। पुस्तक के संपादक हरिहर वैष्णव ने बताया कि किस तरह उन्होंने विभिन्न जनजातियों की लोक कथाओं को पहले रिकार्ड किया, फिर उन्हें लिखा, एक बार फिर वे उन्हीं बोलियों के लोगों के पास गये और उनका परिशोधन व अनुवाद उन्हीं की मदद से किया। बस्तर की लोक-संस्कृति तथा वाचिक परम्परा के संरक्षण, संवद्र्धन एवं विस्तार-कार्य के लिये उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्ति भी ले ली।












इस अवसर पर बस्तर की पारम्परिक जड़ी-बूटी पद्धतियों को सहजने में लगे अंतर्राष्ट्रीय रूप से चर्चित वैज्ञानिक    डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने बताया कि लोक संस्कृति के मामले में बस्तर दुनिया का सबसे धनी क्षेत्र है और यहाँ की रचनाएँ दुनिया की किसी भी भाषा में लिखे जा रहे सृजन से कमतर नहीं है। आयोजन के मुख्य अतिथि डॉ. जयदेव बघेल ने बताया कि किस तरह उनके पिताजी से सीखे पुश्तैनी ज्ञान को उन्होंने दुनिया भर में पहुँचाया। उन्होंने बताया कि बस्तर का शिल्प इंसान के जन्म से ले कर उसके अन्तिम संस्कार व उसके बाद भी कुछ ना कुछ अनिवार्य आकृतियाँ गढ़ता रहता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे श्री टी. एस. ठाकुर ने इस आयोजन और पुस्तक के लिये नेशनल बुक ट्रस्ट के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि भविष्य में भी ट्रस्ट इस आंचलिक क्षेत्र में अपनी गतिविधियों का आयोजन करता रहेगा। इस सत्र का संचालन पंकज चतुर्वेदी ने किया जबकि अंत में आभार ज्ञापन श्री सुरेन्द्र रावल ने किया।




भोजनावकाश के बाद आयोजन का दूसरा सत्र भी अपने में अनूठा था। इसमें हिंदी, उर्दू के साथ-साथ हल्बी, भतरी, छत्तीसगढ़ी और गोंडी आदि में रचनाओं का पाठ हुआ। जगदलपुर से आये रुद्रनारायण पाणिग्राही ने भतरी में मुर्गों की लड़ाई पर केन्द्रित अपनी व्यंग्य रचना "कुकड़ा गाली" प्रस्तुत की तो भतरी के ही दूसरे 

रचनाकार नरेन्द्र पाढ़ी (जगदलपुर) ने भी कुत्ता पालने पर अपनी व्यंग्य रचना "कुकुर स्वांग" से श्रोताओं का 
दिल जीत लिया। श्री हरेन्द्र यादव ने छत्तीसगढ़ी में एक छत्तीसगढ़ी लड़के से प्रणय-निवेदन कर रही विदेशी 
बाला के संवाद का हास्य अपनी रचना में पेश किया। आदिवासियों के चहुँमुखी शोषण को रेखांकित करती 
कविताएँ दुर्योधन मरकाम ने गोंडी में और यशवंत गौतम ने हल्बी में प्रस्तुत की। हयात रजवी की उर्दू शायरी ने खूब वाहवाही लूटी। इसके अलावा शिवकुमार पाण्डेय (नारायणपुर) ने हल्बी में गीत और सुरेश चन्द्र 
श्रीवास्तव (काँकेर) ने हिन्दी में समकालीन कविताओं का पाठ किया। अभनपुर से पधारे सुप्रसिद्ध ब्लॉगर 
ललित शर्मा ने छत्तीसगढ़ी में अपनी व्यंग्य रचना "जय-जय-जय छत्तीसगढ़ महतारी" का पाठ किया। अपनी अस्वस्थता के कारण कार्यक्रम में उपस्थित न रह सकने वाले बस्तर के दो वरिष्ठ रचनाकारों लाला जगदलपुरी एवं सोनसिंह पुजारी की हिंदी एवं हल्बी रचनाओं का पाठ हरिहर वैष्णव ने आदर के साथ किया। इस सत्र का संचालन किया श्री सुरेन्द्र रावल ने।
 
इस कार्यक्रम में मनोहर सिंह सग्गू, महेश पाण्डे, महेन्द्र जैन, खीरेन्द्र यादव, जमील अहमद खान, शिप्रा त्रिपाठी, बरखा भाटिया, लच्छनदई नाग, मधु तिवारी, बृजेश तिवारी, रामेश्वर शर्मा, श्री विश्वकर्मा, पीतांबर दास वैष्णव, खेम वैष्णव, उमेश मण्डावी, चितरंजन रावल, शिप्रा त्रिपाठी, श्री पटेरिया, हेमसिंह राठौर, नीलकंठ शार्दूल, जमील रिजवी, नवनीत वैष्णव, उद्धव वैष्णव, सुदीप द्विवेदी आदि अनेक साहित्यानुरागी एवं साहित्यकार उपस्थित थे।

पुस्तक का मूल्य : 85.00 रुपये प्राप्ति स्थल : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, नेहरू भवन 5, इंस्टीट्यूशनल एरिया, फेज-II, वसंत कुंज, नई दिल्ली-110070

Saturday, 2 February 2013

"आमचो बस्तर" : राजीव रंजन प्रसाद का ऐतिहासिक उपन्यास


2011 का शायद नवम्बर-दिसम्बर का कोई दिन या शायद जनवरी 2012 का सम्भवत: प्रथम सप्ताह। दिन ठीक से याद नहीं किन्तु इतना याद है कि एक फोन आता है भाई राजीव रंजन प्रसाद का कि वे कोंडागाँव आ रहे हैं मेरे पास अपने उपन्यास "आमचो बस्तर" की पाण्डुलिपि ले कर। वे मुझसे उस पर चर्चा के साथ-साथ मुझसे उसकी भूमिका लिखवाना चाहते हैं। इसके पहले उनके इस उपन्यास पर फोन पर कई बार बड़ी लम्बी-लम्बी बातचीत होती रही है। वे अपने इस उपन्यास को ले कर खासे उत्साहित और रोमांचित रहे हैं। 
पूर्वान्ह 10-11 बजे के आसपास उनका फोन आता है कि वे कोंडागाँव तो पहुँच गये हैं किन्तु मेरे घर के पास ही कहीं उनकी गाड़ी बिगड़ गयी है। मैं उनसे पूछता हूँ वे किस जगह हैं? वे जगह बताते हैं और मेरे घर का लोकेशन पूछते हैं। मैं तत्काल एक मित्र को फोन कर गाड़ी का लोकेशन बता देता हूँ और मिस्त्री को भेजने के लिये कहता हूँ। मेरे फोन करते ही वे मित्र मिस्त्री को फोन करते हैं और मिस्त्री बिना किसी विलम्ब के गाड़ी तक पहुँच जाता है। इसके बाद मैं उनकी बतायी जगह तक जाने के लिये निकलने को ही होता हूँ कि वे स्वयं चले आते हैं। उनकी गाड़ी मेरे घर से लगभग 150 मीटर की दूरी पर बिगड़ी खड़ी है। मैं उनका स्वागत करता हूँ। मेरे स्वागत का उत्तर वे मेरे चरण-स्पर्श कर देते हैं। वे बताते हैं कि मैकेनिक गाड़ी के पास खड़े हैं किन्तु वे आपके घर का लोकेशन नहीं जानते। तब मैं उन्हें घर पर ही छोड़ कर गाड़ी तक जाता हूँ। इसमें मुझे कुल मिला कर पाँच मिनट लगते हैं। वहाँ पहुँचता हूँ तब तक मिस्त्री गाड़ी को ठीक कर चुका होता है। वह मुझे देख कर पहचान जाता है और गाड़ी स्टार्ट कर मेरे घर तक ले आता है। मैं उससे उसका मेहनताना पूछता हूँ तो वह मुस्करा कर कहता है, "गाड़ी में कुछ खराबी थी ही नहीं। तो फिर मेहनताना किस बात का?" और अपने एक साथी के साथ मोटर सायकिल पर बैठ कर वापस चला जाता है। मैं इसके लिये उसका धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ। भाई राजीव रंजन प्रसाद भी।
इसके बाद चर्चा चलती है उपन्यास पर। राजीव अपने इस उपन्यास के विषय में बताते चलते हैं। मेरा स्वास्थ्य गड़बड़ा जाने के बावजूद मैं उनके साथ चर्चा में सम्मिलित तो होता हूँ किन्तु अस्वस्थता मेरे मस्तिष्क को स्थिर नहीं रहने देती। मैं सुनता कुछ और गुनता कुछ हूँ। इसी बीच "सहारा समय" टी.वी. चैनल के बस्तर जिला ब्यूरो चीफ श्री राजेन्द्र बाजपेई का फोन आता है, एक कार्यक्रम में "फोनो" के लिये। मैं उनसे क्षमा माँग लेता हूँ। बताता हूँ कि पिछली कई रातों से अनिद्रा का शिकार चल रहा हूँ और मानसिक रूप से तैयार नहीं हूँ इसीलिये मैं "फोनो" पर उपलब्ध नहीं हो पाऊँगा। बहरहाल। राजीव जी के उपन्यास पर चर्चा के बाद वे मुझसे इसकी भूमिका लिखने का आग्रह करते हैं। मैं कहता हूँ कि इस वृहदाकार उपन्यास की भूमिका लिखना मेरे लिये फिलहाल सम्भव नहीं होगा। कारण, इसे पढ़ने में ही मुझे कम से कम पन्द्रह दिनों की आवश्यकता होगी, जबकि उन्हें भूमिका हर हाल में जनवरी के मध्य तक चाहिये थी ताकि फरवरी में आयोजित हो रहे विश्व पुस्तक मेला के अवसर पर यह उपन्यास प्रकाशित हो कर सामने आ जाये। मेरे लिये यह अत्यन्त कठिन था कि मैं इतने कम समय में इसे पूरा पढ़ कर इसकी भूमिका लिख सकूँ। और पढ़े बिना भूमिका लिखना उपन्यास के साथ अन्याय होगा और स्वयं मेरे लिये भी उपयुक्त नहीं हो सकता। फिर वे कहते हैं कि कम से कम आशीर्वचन के रूप में दो शब्द ही लिख दूँ। यह बात मुझे जम जाती है। फिर श्रद्धेय लालाजी (लाला जगदलपुरी जी) से सम्बन्धित और बस्तर को ले कर विभिन्न बातें होती हैं। साथ बैठ कर भोजन किया जाता है। फिर वे मेरे इस आश्वासन के साथ विदा होते हैं कि मैं उनके द्वारा मुझे उपलब्ध कराये गये उनके इस उपन्यास के सार-संक्षेप के आधार पर दो शब्द अवश्य ही लिख भेजूँगा। और मैं ऐसा करता भी हूँ। वे वापस होने के बाद ईमेल से मुझे लगभग 4-5 पृष्ठों में समाया सार-संक्षेप लिख भेजते हैं। और मैं उस सार-संक्षेप के आधार पर अपना मंतव्य उन्हें लिख भेजता हूँ। मेरे उस मंतव्य को, जो किसी काम का नहीं होने के बावजूद, उन्होंने प्रथम संस्करण में फ्लैप के रूप में स्थान दिया। इसके लिये मैं उनका हार्दिक रूप से आभारी हूँ।
इस उपन्यास को ले कर इस बस्तरिया युवक की मेहनत मैंने देखी है। बस्तर का गाँव-गाँव उन्होंने छान मारा है। तथ्य जुटाने के लिये वे न जाने कितने लोगों से मिलते रहे हैं। अथक परिश्रम किया है उन्होंने। ऐसे समय में जब बस्तर पर लिखना "फैशन" की तरह चल निकला है और जिस किसी के भी पास लिखने को कुछ और नहीं है उसे "बस्तर" भा जाता है और वह एकाध-दो दिनों के लिये बस्तर के एकाध कस्बे या नगर का एक चक्कर लगा कर "पोथा" लिख जाता है; राजीव रंजन प्रसाद का ठेठ हल्बी शीर्षक वाला यह उपन्यास वाकई "आमचो बस्तर" है। इसमें राई-रत्ती भर की भी शंका की कोई गुंजाइश नहीं। कुल मिला कर यह कि उनका यह उपन्यास बस्तर पर अब तक लिखी गयी किसी भी साहित्यिक रचना की तुलना में बीस ही साबित होती है, उन्नीस नहीं। इसमें बस्तर का सच बोलता है। अतीत और वर्तमान दोनों ही।
"आमचो बस्तर {का तीसरा संस्करण}"  का विमोचन विश्व पुस्तक मेले (4-10 फरवरी); प्रगति मैदान नई दिल्ली में दिनांक 7.02.2013 को होने जा रहा है।
25 अक्टूबर 2012 को मैं जब नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया द्वारा स्वीकृत पाण्डुलिपि "बस्तर की लोक कथाएँ" के करारनामे की प्रतियाँ ले कर लाला जी के पास उनके हस्ताक्षर हेतु पहुँचा तो उन्होंने हस्ताक्षर के बाद इस उपन्यास के दूसरे संस्करण की प्रति मुझे दिखाते हुए कहा, "बस्तर पर केन्द्रित है।" फिर आगे भी बात हुई। वह बातचीत यथावत् एमपी-3 के रूप में इस पोस्ट के अन्त में प्रस्तुत है। 
और अब अधिक समय न लेते हुए इस उपन्यास पर डॉ. कौशलेन्द्र द्वारा उनके ब्लॉग "बस्तर की अभिव्यक्ति...जैसे कोई झरना..." पर प्रस्तुत दिनांक 12 जनवरी 2013 के पोस्ट को जस-का-तस रख देना उचित होगा : 


 “आमचो बस्तर” -राजीव रंजन प्रसाद का ऐतिहासिक उपन्यास


राजीव रंजन प्रसाद का हालिया लिखा उपन्यास आमचो बस्तर” अपनी ही धरती पर बेगानों के साथ मिलकर अपनों द्वारा क्रूरता से छिछियाये हुये पीड़ित संसार का इतिहास हैअतीत की गुफाओं में दफ़न किये जा चुके बस्तर के देशभक्त महानायकों की गौरवपूर्ण समाधि बनाने और उन पर श्रृद्धासुमन अर्पित कर बस्तर के इतिहास को पुनर्जीवित करने का सार्थक और स्तुत्य प्रयास हैशोषण की अजस्र प्रवाहित विषधारा के प्रति व्यापक चिंता हैछोटी-छोटी समस्याओं के विराट ज्वालामुखी हैं,विदूप हो ठठाते विकास की कड़्वी सच्चायी हैपत्रकारिता की निष्ठा पर अविश्वास है,गोलियों से बहे निर्दोष ख़ून और मासूम चीखों से अपने अहं को तुष्ट करती सत्ता की कहानी हैदुनिया के द्वारा ख़ारिज़ किये जा चुके आयातित विचारों की पोटली में छिपे बम हैं ....और हैं ढेरों प्रश्न जो किसी भी निष्पक्ष पाठक को झकझोरनेअनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर खोजने और एक नई क्रांति के लिये पृष्ठभूमि की आवश्यकता पर चिंतन करने को विवश करते हैं।  
उपन्यास के भीतर से एक आह उठती है – “मेरे बस्तर! क्या तुम इसी प्रजातांत्रिक,धर्मनिरपेक्षसमाजवादी लोकतंत्र का हिस्सा होक्या बस्तर भारत का ही हिस्सा है?”देश को आज़ाद हुये आधी सदी से भी अधिक समय बीत जाने के बाद इस तरह के आह भरे प्रश्न आज़ादी के स्वरूप और औचित्य के लिये चुनौती हैं।   
कई बार मैं यह सोचने के लिये विवश हुआ हूँ कि नैसर्गिक सौन्दर्य और प्राकृतिक सम्पदाओं से भरपूर बस्तर कहीं इस आर्यावर्त की अभिषप्त भूमि तो नहीं?  त्रेतायुग में रावण का उपनिवेश रहा दण्डकवनकलियुग में दुनिया के लिये अबूझ हो गया बस्तरबीसवीं शताब्दी में ब्रिटिशभोसले और अरब आततायियों से आतंकित बस्तर,स्वतंत्र भारत में स्वाधीनसत्ता की गोलियों से भूने जाते निर्दोष गिरिवासियों-वनवासियों के शवों पर सिसकता बस्तर और वर्तमान में लाल-सबेरा के लाल-रक्त से प्रतिदिन स्नान करता बस्तर कब तक शोषित होता रहेगा और क्यों?
बस्तर की माटी में पले-बढ़ेअपने सर्वेक्षण और चिंतन को कलम के माध्यम से अभिव्यक्त करते राजीव रंजन प्रसाद के उपन्यास आमचो बस्तर” के पात्र भी इन्हीं प्रश्नों से जूझते नज़र आते हैं। बस्तर के प्राच्य इतिहास को अपने में समेटे इस ऐतिहासिक उपन्यास की प्रथम यवनिका उठते ही एक गोला सा दगता है- आख़िर सुबह क्यों नहीं होती?” प्रश्न स्वगत उत्तर के रूप में अपने को और भी स्पष्ट करता है-रोज-रोज माओवादी हमलों में मारे जा रहे आदिवासियों से वैसे भी दुनिया का क्या उजड़ता है?”
 प्रकृति ने तो बस्तर को बड़ी उदारता से सब कुछ बाँटा पर मनुष्य ने बस्तर को छलने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत की स्वतंत्रता के 12 वर्षों बाद बस्तर के वनवासियों के साथ भारत सरकार द्वारा एक क्रूर परिहास किया गयाउन्हें बताया गया कि भारत सरकार के द्वारा विजय चन्द्र भंज देव को बस्तर का महाराजा घोषित किया गया हैअब वे ही आप सबके महाराजा हैं।
प्रवीर चन्द्र भंज देव को अपना महाराजा ...अपना अन्नदाता ...अपना भगवान मानने वाले बस्तर के भोले-भाले लोगों को नहीं पता कब किसकी हुक़ूमत आयी और कब किसकी ख़त्म हो गयी। उन्हें दिल्ली नहीं मालुमउन्हें भारत सरकार नहीं मालुम। उन्हें बदला हुआ सत्य न बताकर उनकी आस्था भंग की गयी। बस्तर राज्य को भारतसंघ में स्वेच्छा से सम्मिलित कर चुके महाराजा प्रवीर को भारत सरकार ने बस ‘नाम भर’ का पूर्व राजा  मानने से इंकार करते हुये उनके छोटे भाई को ‘नाम भर’ का राजा घोषित कर दियाएक ऐसा राजा घोषित कर दिया जिसका कोई संवैधानिक अस्तित्व नहीं था। किंतु ...इस घोषणा में जिस बात का अस्तित्व था वह था झूठी शान की दिलासा में दो भाइयों को एक-दूसरे का शत्रु बनाकर सत्ता में बैठे लोगों की अहं की तुष्टि। इस तुष्टि का परिणाम हुआ 31 मार्च 1961 को बस्तर के लोहण्डीगुड़ा में आदिवासियों पर पुलिस की बर्बर फ़ायरिंग। और फिर बस्तर राजमहल में निहत्थे प्रवीरचन्द्र भंज देव की पुलिस द्वारा बर्बर हत्या। क्या स्वतंत्र भारत की यही तस्वीर है?
 उपन्यासकार राजीव रंजन की एक बड़ी पीड़ा यह भी है कि देश के लोग बस्तर को अन्धों के हाथी की तरह देखते रहे हैं ...वह भी अपनी पूरी ज़िद के साथ। दूर दिल्ली में बस्तर के प्रति एक आम धारणा देश की संचार एवं सूचना व्यवस्था का परिहास करती है – “ ... अरे बस्तर से आये होलेकिन तुमने तो कपड़े पहन रखे हैं।
लोगों की दृष्टि में बस्तर कैसा है, लेखक ने इसका  बख़ूबी वर्णन किया है –“बस्तर में ख़ूबसूरती तलाशने के लिये दिल्ली से एक बड़ी पत्रिका के पत्रकार और प्रेस फ़ोटोग्राफ़र आये थे। जंगल-जंगल घूमे। उन्हे यहाँ की हरियाली में ख़ूबसूरती नज़र नहीं आयी। चित्रकोट और तीरथगढ़ जैसे जलप्रपात उन्हें सुन्दर नहीं लगेन ही कुटुमसर जैसी गुफ़ाओं के रहस्य ने उन्हें रोमांचित किया। जिस ख़ूबसूरती की तलाश थी वह थी पत्रिका के मुखपृष्ठ पर छपी निर्वस्त्र आदिवासी युवती।
बस्तर में ख़ूबसूरती तलाशने आये एक फ़्रांसीसी जोड़े को भी किसी नग्न आदिवासी युवती की तलाश थी। घुटनों से ऊपर स्कर्ट और टीशर्ट पहनने वाली रीवा को देखकर स्थानीय युवक के मन प्रश्न उठता है कि आख़िर इतने ख़ुलेपन और न्यूनतम वस्त्रभूषा के बाद भी इन्हें बस्तर में निर्वस्त्र आदिम जीवन को ही देखने की उत्कंठा क्यों है?” आगे लेखक ने चुटकी लेते हुये लिखा है-  ....वह पिछड़ों के नंगेपन और विकसितों के नंगेपन के बीच के अंतर का विश्लेषण कर रहा था।
लेखक बस्तर की इस कृत्रिम छवि से व्यथित है इसलिये उसे ऐतिहासिक हवाला देते हुये बस्तर राज्य के पूर्व मंत्री की हैसियत वाले एक पात्र के माध्यम से यह स्पष्ट करना पड़ा कि, राजा अन्नमदेव से पहले नाग राजाओं की शासन पद्धति गणतंत्रात्मक थी। वैदिक युग से नागों के युग तक बस्तर की जनता का भौतिक,बौद्धिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में विकास हुआ था। आगेलेखक ने बस्तर की त्रासदी को रेखांकित करते हुये एक स्थान पर लिखा - जब एक समाज बाहर और भीतर के द्वार बन्द करले तो समझिये उस समाज ने पीछे की ओर दौड़ लगाना आरम्भ कर दिया है। राजा अन्नमदेव गणतांत्रिक व्यवस्था को कायम नहीं रख सके ... 
 बस्तर की पृष्ठभूमि पर यह उपन्यास जंगल से दूर किसी महानगर के भव्य भवन के वातानुकूलित कक्ष में सुने-सुनाये मिथकों और कल्पना के सहारे नहीं लिखा गया बल्कि बस्तर के जंगल के भीतर बैठकर लिखा गया। इसीलिये उपन्यास एक ऐतिहासिक अभिलेख बन पड़ा है जिसके अतीत में खोये पात्र अत्याचार के विरुद्ध जूझते हुये और शोषण को अपनी नियति स्वीकार कर चुके आधुनिक पात्र विकास की आशा में बड़ी उत्सुकता से बस्तर से बाहर की ओर झाँकते नज़र आते हैं। गहन वन के अंधेरों को बेचकर ख़ुद के लिये रोशनी का ज़ख़ीरा जमा करते लोग बस्तर के अंधेरों को बनाये रखने के हिमायती हैं। अंधेरों के ख़िलाफ़ लड़ने की कसम खाते हुये कुछ तत्वों ने रूस और चीन से आयातित विचारों के सहारे एक समानांतर सत्ता कायम कर ली है जो अब ख़ुद भी अंधेरे बेचने लगी है। सत्ता के गलियारों में नक्सलवाद और माओवाद एक अज़ूबा फ़ैशन बनता जा रहा है जिसे समझने और समझाने की कोशिश में लेखक ने आदिवासी समाज की एनाटॉमीप्रशासन की फ़िज़ियोलोजी और सत्ता की पैथो-फ़िज़ियोलॉजी का पूरी ईमानदारी के साथ विश्लेषण किया है। इस विश्लेषण के प्रयास में एक कुशल जुलाहे की भूमिका निभाते हुये लेखक को अपनी बीविंग मशीन में आगे-पीछे के कई तानों-बानों को आपस में पिरोना पड़ा है जिसके कारण यह उपन्यास अतीत और वर्तमान की कई कहानियों को अपने में समेट कर चल सकने में समर्थ हो सका।
जल संसाधन की दृष्टि से बस्तर सम्पन्न है परन्तु बस्तर से होकर बहने वाली इन्द्रावती का लाभ पड़ोसी आन्ध्रप्रदेश के हिस्से में जाता हैलेखक ने इस जनसरोकार पर बहस छेड़ते हुये मुआवज़े के हक़ की बात अपने पाठकों के समक्ष रखी है। 
आज़ादी के बाद विकास की गंगा बहाये जाने का दावा करने वाली राज्यों की देशी सरकारों के पक्षपातपूर्ण सत्य को उजागर करने में, जहाँ भी अवसर मिला लेखक पीछे नहीं हटता –“बचपन का अर्थ होता है तितली हो जानाखिलखिलानाकूदना,सपने बुनना और जगमग आँखों से आकाश के सारे तारे लूट लेना ...लेकिन ऐसा बचपन शैलेष ने एक बार फिर भरी निगाह से देखा ...नहींउसमें बचपन था ही कहाँ वह लड़की आठ वर्ष की अधेड़ थी।          
आदिवासी समाज की समस्याओं का निर्धारण वातानुकूलित कक्षों में बैठकर नहीं किया जा सकता। किंतु किया यही जाता है इसलिये बस्तर को विकास की धारा में शामिल करने का प्रयास एक पाखण्ड से अधिक और कुछ नहीं हो पाता। स्वतंत्र भारत की शिक्षानीति पर प्रहार करते हुये लेखक ने कई प्रश्न उठाये हैं- सोमली नहीं समझ पाती कि पढ़ायी क्यों ख़रीदी जानी चाहिये। .... पेट्रोल और डीजल को सब्सिडी देने वाली सरकारें शिक्षा के लिये भी ऐसा ही क्यों नहीं करतींएक जैसी स्कूल ड्रेस कर देने से एक जैसी शिक्षा तो नहीं हो जाती?  ....क्या यह ख़तरनाक नहीं है कि विद्यार्थियों में उन संस्थानों का गर्व हो जाये जहाँ सुविधा-सम्पन्नता अधिक है? ...ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि जैसे स्कूल की ड्रेस एक जैसी होती है वैसे ही सबके स्कूल भी एक जैसे ही होंउसी स्कूल में कलेक्टर का लड़का भी पढ़े तो वहीं झाड़ूराम की लड़की भी?”
देश में लागू की गयी व्यवस्था जब अपने नागरिकों में भेद करने लगे तो प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं – “ये तरक्की शालिनियों के ही हिस्से में क्यों हैयह कैसी व्यवस्था है जिसमें पिसने वाला अंततः मिट जाता है। व्यवस्था ऐसा सेतु क्यों नहीं बनती जिसका एक सिरा शालिनी हो और दूसरा सोमली?”
 सरकारी तंत्र ने वर्ग भेद समाप्त करने के नाम पर वर्ग भेद को समाज में इस कदर व्याप्त कर दिया है कि जंगल से शहर तक इसकी कटु अनुभूति पीछा नहीं छोड़ती–“कितनी अजीब बात है शालिनीजगदलपुर में आदिवासी-ग़ैरआदिवासी वाली गालियाँ सुनते रहेअब पिछड़ों और ग़ैर-पिछड़ों वाली गालियाँ सुनो।
नक्सलवाद बस्तर का मैलिग्नेण्ट कैंसर है। नक्सलवाद के प्रति आदिवासियों के स्वाभाविक झुकाव का दावा करने वाले नक्सली दावों की पोल खोलते हुये लेखक ने हक़ीक़त का बयान करते हुये स्पष्ट कर दिया है कि अपनी मोटियारिन के दैहिक शोषण से उफ़नाये ठुरलू ने फावड़े से मुंशी की हत्या कर दी और जंगल में भागकर नक्सलियों की शरण में चला गया। ठुरलू के नक्सली बन जाने की घटना की व्याख्या लेखक ने अपने एक पात्र मरकाम के द्वारा कुछ इस तरह की- ठुरलू का नक्सलवादी हो जाना परिस्थिति का परिणाम हैकिसी विचारधारा का नहीं।
सन् 1857 की क्रांति से तुलना करते हुये लेखक ने आधुनिक नक्सलियों की विचारधारा का विरोध कुछ इस तरह से किया- जैसे चिंगारी से आग लग जाती है वैसे ही क्रांति भी स्वतः स्फूर्त होती है। क्रांति आयातित नहीं होतीक्रांति के लिये बड़ी-बड़ी विचारधाराओं की किताबें नहीं चाटी जातीं, ...”
नक्सलियों द्वारा बारूदी सुरंगों के ज़रिये की जाने वाली हत्याओं की दैनिक परम्परा में शासकीय कर्मचारी की मौत पर लेखक का आक्रोश बहुत ही सधे शब्दों में व्यक्त होता है –“देवांगन आम आदमी थे या नहीं इस पर बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों में मतभिन्नता हो सकती है। देवांगन तथाकथित क्रांतिकारियों के मापक में कितने डिग्री के आम आदमी कहलायेंगे इस पर समाजसेवियों तथा प्रबुद्ध लेखकों में महीनों का विचारमंथन अवश्यम्भावी है।
 नक्सलियों द्वारा बलात् स्थापित आदिवासी क्रांति के हश्र की एक निहायत भोली और विवश अनुभूति लेखक की कलम से कुछ इस तरह व्यक्त होती है – “ .....अपने घर से उठाये जाने के बाद बोदी को महीनों शारीरिक और मानसिक यातनाओं के दौर से गुज़रना पड़ा। अब उसे याद नहीं कि वह कितने शरीरों के लिये मोम की गुड़िया बनी। क्या क्रांतिकारियों के शरीर नहीं होते?”
 नक्सलियों के सच को प्रतिबिम्बित करती एक अभिव्यक्ति देखिये – “झोपड़ी के दरवाजे पर एक कागज़ चिपकाया गया जिस पर लाल स्याही से कुछ लिखा हुआ था। लिखे हुये अक्षर कोई नहीं समझता किंतु लाल रंग के आतंक से अब कौन परिचित नहींसुबह अंधेरा और फैला ....गाँव खाली हो गया।
 नक्सलियों की तथाकथित जनक्रांति पर लेखक की चिंता पाठक को झकझोरती है – “यह कैसी क्रांति होने जा रही है जिसमें मरने और मारने वाला तो आदिवासी होगा लेकिन इस खेल के सूत्रधार शतरंज खेलेंगे।
कुख्यात ताड़मेटला काण्डजिसमें केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के 76 जवानों को नक्सलियों द्वारा उड़ा दिया गया थापर चर्चा करते हुये लेखक ने कहा है – “वे क्रांति कर रहे थे। उन्हें इतना लहू चुआना था कि एक-एक दिल में दहशत घर कर जाये। वे उन सभी के घरों में घना अंधेरा करने की नीयत से ही आये थे जो क्रांति की राह में रोड़ा बन गये हैं। ..... वो औरंगज़ेब के ज़माने थे जब व्यवस्थायें तलवार की नोक पर बदला करती होंगी। माओ के नाम पर ख़ून-ख़राबों ने कई दशक देख लियेक्या बदल गया कहाँ आयी वह लाल सुबह क्या आवाज़ उठाने का तरीका हथियार ही है क्या लहू बहेगा तो ही बदलाव की कालीन बनेगा?” 
 शहरों में बैठकर जंगल के बारे में की जा रही पत्रकारिता की संदिग्ध निष्ठा लेखक को उद्वेलित करती है। प्रकाशन का व्यापार किसी लेखक के लेखनधर्म को किस तरह दुष्प्रभावित करता है इस पर एक व्यंग्य देखिये – “जानकारियाँ काफ़ी नहीं होतीं। ......पाठक क्या पढ़ेंगे उसकी नब्ज़ पकड़ो। फिर नक्सलवाद क्या हैयह सोशियो-इकोनॉमिक प्रॉब्लेम है। ...तुम दोनों को अभी और पढ़ने की ज़रूरत है। मार्क्स को पढ़ोलेनिन और माओ को जानोचे ग्वेरा के संघर्ष को समझो तभी नक्सलवाद को गहराई से जान सकोगे। तभी तुम बस्तर के नक्सलवाद का सही विश्लेषण कर सकोगे।
 मैंने बस्तर पर आर्टिकल लिखा था। मुझे नारायणपुर में रहते बीस साल से अधिक हो गये। मुझे सिखाता है कि बस्तर कैसा है और मुझे क्या लिखना चाहिये।
पत्रकारिता के हो रहे नैतिक पतन से आहत लेखक का एक व्यंग्य देखिये –“ देवी जी प्रयोग करके देखिये। आप ग़ुलाब हैंग़ुलाबी ड्रेस में ख़ूबसूरत दिखती हैं। कल हमारी रिपोर्ट ले जाइयेगा और अदब से झुककर खन्ना से मिलियेगा।
खन्ना के केबिन से बाहर आने के बाद निधि सीधे दीपक के पास आयी और बगल में बैठ गयी ...
क्या हुआ दीपक मुस्कराया।
कल मैटर लग जायेगा।
यह मेरी लिखी हुयी लाइन का नहीं, तुम्हारी नेक-लाइन का कमाल है। 
पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता भी बस्तर की त्रासदियों में अपनी बहुत बड़ी भूमिका निभाती हैलेखक की यह पीड़ा कुछ इस तरह अभिव्यक्त हुयी है – “ .....इन घटनाओं में राष्ट्रीयसमाचार बनने के तत्व क्यों नहीं हैंदिल्ली के पास साउण्ड हैकैमरा है और एक्शन है ...नौकर ने मालिक का क़त्ल किया राष्ट्रीय ख़बर है। बाप ने बेटी का क़त्ल कर दिया सी.बी.आई. जाँच करेगी। बियर-बार में क़त्ल हुआ समूचा राष्ट्र आन्दोलन करेगा। मानव केवल दिल्ली या कि नगरों-महानगरों में रहते हैं जिनके अधिकार हैं?”
 बस्तर के सच्चे इतिहास की सदा ही उपेक्षा की जाती रही है। लेखक ने प्रश्न किया है– “क्यों इतिहास बाबरों-अकबरों और अंग्रेजों के ही लिखे जाते हैंभारत देश के इतने विशाल भूभाग के प्रति ओढ़ा गया अन्धकार क्या नक्सलियों को प्रोत्साहन नहीं है?क्या जयचन्दों और मीर ज़ाफरों की कहानिय़ाँ ही पाठ्यपुस्तकों में परोसी जायेंगी ?क्या गुण्डाधुरडेबरीधुरयादव रावव्यंकटरवगेंद सिंह जैसे संकल्पी और साहसी आदिवासी इतिहास के किसी पन्ने को दस्तक देने की क्षमता रख सकते हैंक्या यह होगा कि अगले सौ-पचास साल बाद जब बस्तर का इतिहास लिखा जायेगा तो इसके नायक बदल चुके होंगेअतीत के इन आदर्शों की स्मृतियों पर लाल खम्बे गड़ चुके होंगे?”
बस्तर की जनजातीय परम्परायें अनोखी और आकर्षक रही हैं। बस्तर एक दीर्घकाल तक शेष विश्व के लिये अबूझ रहा। बस्तर अपने घरेलू और बाहरी शोषकों के लिये उर्वर चारागाह रहा। बस्तर एक जीती जागती प्रयोगशाला रहा। पर्यटन की दृष्टि से विश्व स्तर का स्थान होते हुये भी बस्तर उपेक्षित रहा। बस्तर की धरती अमीर है पर इसके निवासी सदा ग़रीब रहे। बस्तर को दूर बैठकर करीब से देखने का एक अवसर है “आमचो बस्तर”।

   

Sunday, 27 January 2013

उमेश मण्डावी की कविता


इस बार प्रस्तुत है युवा व्यंग्यकार उमेश कुमार मण्डावी की व्यंग्य-कविता "चुनाव"। कोंडागाँव (बस्तर-छत्तीसगढ़) में 23 मई 1975 को जन्मे उमेश मण्डावी यांत्रिकी में बी.ई. और हिन्दी साहित्य में एम.ए. हैं। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन केन्द्र जगदलपुर से कविताएँ प्रसारित। कवि सम्मेलनों में व्यंग्यकार के रूप में चर्चित। श्री सुरेन्द्र रावल एवं श्री केशव पटेल द्वारा साहित्यिक मार्ग-दर्शन। 
सम्प्रति : पंचायत (व्याख्याता) के पद पर शास. उ.मा.वि. कोकोड़ी (बस्तर-छ.ग.) में कार्यरत। छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य परिषद्, कोंडागाँव जिला के सचिव के रूप में साहित्यिक गतिविधियों में संलग्न। प्रस्तुत है उनकी कविता : 


चुनाव


उमेश मण्डावी


एक तुनकमिजाज पत्नी ने पति से कहा :
"जानते हो जी! शर्मा सर के घर में,
टी. वी. है, फ्रिज है, गाड़ी है
उनकी बीवी के पास, हर प्रांत की साड़ी है
उनके ठाट-बाट के क्या कहने हैं!"

पति ने कहा :
"वो दो नंबर का काम करते हैं,
हम तो बस! ईमानदारी की तनख्वाह लेते हैं।"

गुस्से में पत्नी बोली :
"किसने कहा था, ईमानदारी दिखाने को
यदि बेईमानी करते, रिश्वत लेते
तो हम भी सुख-चैन से रहते
अब एक काम करो,
थोड़े ही दिनों में लोक-सभा-चुनाव होने वाले हैं
तुम अपनी ड्यूटी किसी घोर नक्सल प्रभावित क्षेत्र में लगवा लो
हो सके तो, आज ही एप्लीकेशन भिजवा दो।"

पति ने कहा :
"लोग तो चुनाव में जाने से कतराते हैं
तरह-तरह के एप्लीकेशन देकर, ड्यूटी कैंसिल करवाते हैं
और तुम मुझे चुनाव में जाने को कह रही हो।"

पत्नी ने कहा :
"अजीब गँवार हो, मूर्ख हो, बेवकूफ हो
इतना भी नहीं जानते कि
चुनाव में काम करने वालों का
सरकार विशेष ध्यान रखती है
मर गये तो लाखों रुपयों की सहायता देती है
और वैसे भी
जीते जी तो कोई सुख दे नहीं पाये हो
एक सूती साड़ी तक ले नहीं पाये हो
यदि चुनाव के समय मरोगे तो
दो लाख रुपये चुनाव-बीमा का मिलेगा
जी.पी.एफ. का पैसा जल्दी निकल जायेगा
और ढेर सारे दूसरे पैसे निकल जायेंगे
हम देखते-ही-देखते लखपति बन जायेंगे
और जरा बेटी को देखो,
बेटी की शादी दहेज के कारण ही रुकी पड़ी है
आप चुनाव में जायेंगे,
शहीद हो जायेंगे
उसका घर बस जायेगा
और पप्पू को देखो,
एम.ए. फस्र्ट क्लास
पढ़-लिख कर बेरोजगार घूम रहा है
आप चुनाव में जायेंगे
तो उसकी जिंदगी सँवर जायेगी
आपकी जगह उसको अनुकम्पा नियुक्ति मिल जायेगी
वह कई बार कहता है :
"माँ! आजकल नौकरी मिलना बहुत मुश्किल है
सिर्फ अनुकम्पा नियुक्ति का ही सहारा है"
और जब कभी आप सुबह
देर तक सोते रहते हैं
वो बड़ा खुश हो जाता है
दौड़ कर आपके कमरे में जाता है
लेकिन आपको जिंदा देख कर फिर नर्वस हो जाता है
कहता है :
"माँ! पिताजी बड़ी गड़बड़ करते हैं
अपनी जिंदगी जी डाले, अब मरने से डरते हैं"
"और पप्पू के पापा जरा सोचो,
जब पप्पू छोटा था,
तब आप उसका कितना ध्यान रखते थे
उसकी हर फरमाईश पूरी करते थे
और आज वो क्या माँग रहा है?
सिर्फ मरने के लिये ही तो कह रहा है
अरे! मेरे लिये नहीं,
बच्चे का दिल रखने के लिये ही सही
एक बार मर जाओ।

देवांगन साहब को देखो,
पिछले चुनाव में शहीद हुए
उनके लड़के को शानदार नौकरी मिल गयी
अपने वर्मा साहब को देखो,
पिछले चुनाव में दुर्भाग्यवश बच गये
पर रिटायरमेंट के ठीक पहले गाड़ी के नीचे आ गये
उनके लड़के को भी नौकरी मिल गयी
यह सब देख पप्पू उदास हो जाता है,
झुँझला कर कहता है :
"माँ! हम क्या ऐसे ही तंगहाल रहेंगे?
पिताजी से पूछो ना, वे कब मरेंगे?"

"और जरा अपने आपको देखो,
सूख कर काँटा हो गये हो
यदि बेमौसम मरोगे तो
चार आदमी कंधा देने के लिये ढूँढ़ना मुश्किल है
और यदि चुनाव के समय मरोगे तो
अरे वाह! आपकी अर्थी को सरकारी गाड़ी में लायेंगे
कई लोग हमारे घर आयेंगे
मन्त्री, विधायक, अधिकारी हमसे मिलने आयेंगे
और हम देखते-ही-देखते वी.आई.पी. बन जायेंगे
टी.वी. वाले मुझसे पूछेंगे :
"आपका पति चुनाव में शहीद हो गया
आप कैसा महसूस कर रही हैं?"

मैं कहूँगी :
"बड़े गर्व की बात है कि
मेरा पति देश के काम आया
पर दु:ख इस बात का है कि मेरा सिर्फ एक ही पति था
यदि आठ-दस और होते तो
मैं सबको देश के लिये शहीद कर देती।"
और हो सकता है कि
आपके मरने के बाद
किसी राजनीतिक दल का टिकट
मुझे मिल जाये
फिर मैं आपके नाम से
बड़े-बड़े स्कूल व अस्पताल बनवाऊँगी
और यह सब देख कर आप निश्चित मानिये
आपकी भटकती आत्मा को 
नरक में शांति मिल जायेगी।"




Friday, 25 January 2013

फिर भी चाहती हूँ जीना, माँ!


इस बार एक नवोदित युवा कवि सूर्यकान्त साहू की एक कविता "फिर भी जीना चाहती हूँ, माँ!" प्रस्तुत है। 

सूर्यकान्त साहू का जन्म 23 फरवरी 1989 को बालोद (छत्तीसगढ़) में हुआ था। 
माता का नाम बेलाबाई और पिता का नाम राधेश्याम साहू। वे वर्तमान में भिलाई (छत्तीसगढ़) में एम. सी. ए. की पढ़ाई कर रहे हैं। उनका वर्तमान निवास है : सरगीपालपारा, कोंडागाँव 494226। उनसे उनके मोबाइल 88179 47387 पर सम्पर्क किया जा सकता है। 

लेखन के विषय में वे कहते हैं, "मैं 10 वीं कक्षा में था तब से कलम पकड़ने की कोशिश कर रहा हूँ। इसे मैं लिखना नहीं कहता। मैं तो केवल अपने भाव व्यक्त कर रहा हूँ।" सूर्यकान्त लिखने के साथ-साथ संगीत में भी रुचि रखते हैं। प्रस्तुत है उनकी कविता : 


फिर भी चाहती हूँ जीना, माँ!


सूर्यकान्त साहू 


थम रही हैं साँसें मेरी 
फिर भी चाहती हूँ जीना, माँ
आँखें हो गयी हैं नम
फिर भी चाहती हूँ जीना, माँ

धड़कनें छोड़ रही हैं साथ
फिर भी
ज़िंदगी के इस बेबस मंजर पर
पहुँच कर भी चाहती हूँ जीना, माँ

अभी भी कुछ कर गुजर 
चाहती हूँ आगे बढ़ना, माँ
इन हैवानों को अभी मैं
चाहती हूँ सबक सिखाना, माँ

जो मेरी आबरू को नंगा कर
घूम रहे हैं खुले आम
उनके झूठ के नकाब उतार 
उनके काले-घिनौने सच को
सामने चाहती हूँ लाना, माँ

अभी तो कुछ कर गुजर कर
आगे चाहती हूँ बढ़ना, माँ

सपने तो अब भी बुन रही हूँ
मंज़िल की राहों पर मैं
अब भी आगे बढ़ रही हूँ
पर साँसें नहीं दे रही हैं मेरा साथ
ज़िंदगी से फिर भी लड़ रही हूँ, माँ

दिन ढल रहा है
फिर भी मेरे मन में
अभी सूरज ऊग रहा है, माँ
फिर भी चाहती हूँ जीना, माँ! 





Monday, 14 January 2013

श्री सुरेन्द्र रावल और उनकी काव्य-यात्रा



28 दिसम्बर 1938 को जगदलपुर (बस्तर) में जन्मे आदरणीय गुरुदेव श्री सुरेन्द्र रावल बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। लब्धप्रतिष्ठ कवि एवं व्यंग्यकार होने के साथ-साथ वे चर्चित रंगकर्मी और मंच-संचालक भी रहे हैं। पंचायत शिक्षकों के आन्दोलन को अपना नैतिक समर्थन देते हुए उन्होंने अपना जन्म-दिवस मनाने से इंकार कर दिया था। किन्तु 31 अक्टूबर 2012 से संस्कार धानी कोंडागाँव में की गयी पहल के मद्देनजर अन्तत: उन्होंने 13 जनवरी को अपना जन्म-दिवस मनाने की सहमति छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य परिषद् की कोंडागाँव इकाई को दे ही दी। 
यह दिन एक साथ तीन प्रसंगों को समेटे हुए था। पहला आदरणीय गुरुदेव श्री सुरेन्द्र रावल जी का जन्म-दिन, दूसरा दिल्ली से पधारे "आऊटलुक" के संयुक्त सम्पादक आदरणीय श्री सुमन्त भट्टाचार्य जी का सम्मान और हिन्दी-छत्तीसगढ़ी के नवोदित कवि भाई श्री हरेन्द्र यादव जी की विदाई का समारोह। भाई श्री हरेन्द्र यादव अभी-अभी (31 दिसम्बर 2012 को) वन विभाग से वनक्षेत्रपाल के पद से सेवानिवृत्त हुए ही थे कि शासन ने उन्हें वन विद्यालय, भानुप्रतापपुर में प्रशिक्षक के पद पर संविदा नियुक्ति दे दी। 

1982 में बस्तर पर केन्द्रित संदर्भ-ग्रंथ "इन्द्रावती" (सम्पादक : मनीषराय, बलराम) में सह-सम्पादक के रूप में अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराने वाले आदरणीय गुरुदेव श्री सुरेन्द्र रावल सर की कविताएँ, हास्य-व्यंग्य एवं निबन्ध आदि देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं आकाशवाणी तथा दूरदर्शन के प्रसारणों में स्थान पाती रही हैं। उन्होंने राज्य संसाधन केन्द्र, प्रौढ़ शिक्षा, मध्य प्रदेश, इन्दौर एवं आदिवासी विकास, मध्य प्रदेश, भोपाल के लिये भी लेखन-कार्य किया है। हिन्दी में एम. ए. तथा बी. एड. तक शिक्षा प्राप्त श्री रावल शिक्षकीय कार्य करते हुए प्राचार्य के पद से कुछ वर्षों पूर्व सेवानिवृत्त हुए हैं। वर्तमान में वे कोंडागाँव में ही रहते हुए एक स्थानीय निजी विद्यालय में प्राचार्य के पद पर कार्यरत हैं। उनका सम्पर्क सूत्र है : विकास नगर, कोंडागाँव 494226, बस्तर-छत्तीसगढ़, चलित वार्ता : 92003-01888
मुझे याद आता है। मैं 1966-67 में जब कक्षा 7वीं का छात्र था, तभी से मेरे मन में पुस्तकें पढ़ने के प्रति रुझान पैदा हुआ। इसका श्रेय जाता है मुझ से एक कक्षा पीछे चल रहे मेरे अभिन्न मित्र भाई कृष्णनाथ देवांगन (जिन्हें तब से ले कर आज तक हम उनके घरु नाम "बहादुर" से ही सम्बोधित करते हैं) को। हालाँकि उनका रुझान गुलशन नन्दा, वेदप्रकाश कम्बोज जैसे लेखकों की पुस्तकों की ओर था। वे मुझे इन लेखकों की पुस्तकें देते और मैं उन्हें "चन्दामामा", "पराग" और "मिलिन्द" जैसी स्तरीय बाल पत्रिकाएँ। पुस्तकें मिल-बाँट कर पढ़ी जातीं। लेकिन बाद-बाद में मैं गुलशन नन्दा और वेदप्रकाश काम्बोज आदि की पुस्तकों से कटता चला गया और फिर "चन्दामामा", "पराग", "मिलिन्द" आदि पत्रिकाओं ने आगे चल कर 9वीं-10वीं तक आते-आते लेखन के बीज भी बो दिये और मैं छिटपुट रचनाएँ लिखने लगा था।
                                                                                                                                                       शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, कोंडागाँव में तब एक सम्पन्न पुस्तकालय भी हुआ करता था। पुस्तकालय के प्रभारी हुआ करते थे आदरणीय गुरुदेव श्री टी. एस. ठाकुर जी। पुस्तकालय में एक-से-एक साहित्यिक पुस्तकें थीं। उन्हें क्रम से विद्यार्थियों को दिया जाता। विद्यार्थी उन्हें पढ़ते और फिर उन पर कक्षा में चर्चा भी हुआ करती। पाठ्यपुस्तकों से इतर अन्य लेखकों को पढ़ने का सौभाग्य कुछ इसी तरह मुझे मिला था। उसी पुस्तकालय से मैंने हिन्दी-उर्दू शब्दकोश का भी थोड़ा सा अध्ययन किया था। आज पता नहीं वे पुस्तकें हैं भी या नहीं। इसी तरह एक और पुस्तकालय हुआ करता था "भारत क्लब" के अधीन। किन्तु आज वहाँ कुछ भी नहीं है। इसी बीच मैंने हिन्द पॉकेट बुक्स की "घरेलू लायब्रेरी योजना" की सदस्यता ले ली और फिर तो प्रेमचंद जी, रेणु जी, भगवती चरण वर्मा जी जैसे प्रख्यात लेखकों की कालजयी रचनाओं से परिचय होने लगा। बहरहाल। मेरे सौभाग्य से कवि एवं व्यंग्यकार श्री सुरेन्द्र रावल जी हमारी पाठशाला में हिन्दी के शिक्षक हुआ करते थे और 9वीं से 11वीं तक हमारे कक्षा-अध्यापक भी। उन्होंने मेरी हिन्दी देखी और एक दिन पूछा, "क्यों हरिहर! तुम कुछ लिखते-विखते भी हो, क्या?" मैंने संकोच के साथ "हाँ" में अपनी मुण्डी हिलायी। और बस! तभी से वे मुझे प्रोत्साहित करने लगे। इस तरह वे न केवल विद्यालय में मेरे गुरु रहे अपितु साहित्य के क्षेत्र में भी वे मेरे आदि गुरु रहे हैं। नगराते हुए गाँव में होने वाली नियमित काव्य-गोष्ठियों में मुझे वे अनिवार्य रूप से बुलाने लगे। मैं सभी कवियों की रचनाएँ बड़े ध्यान से सुनता और जब मेरी बारी आती तो मैं बहुत ही संकोच के साथ अपनी अनगढ़ रचनाएँ सुनाता। रचनाओं को सुन कर श्री रावल सर, श्री टी. एस. ठाकुर सर और स्व. हादी भाई रिज़वी साहब बड़े ही ममत्व के साथ उसे "ठीक-ठाक" करने में अपना सहयोग देते। आदरणीय श्री टी. एस. ठाकुर सर आज भी साहित्यिक गोष्ठियों में अपनी उपस्थिति अनिवार्यत: दर्ज कराते हैं। 
13 जनवरी को जब हम आदरणीय श्री सुरेन्द्र रावल जी का जन्म दिन मना रहे थे, तब मैं श्री रावल सर और श्री ठाकुर सर के विषय में बता ही रहा था कि मेरी साहित्य-यात्रा में और अँग्रेजी भाषा-ज्ञान का सारा श्रेय इन्हीं दोनों को जाता है कि तभी श्री ठाकुर सर मुझसे पूछ बैठे, "तुम्हारी पहली रचना कौन सी थी, याद है तुम्हेंे?" मैंने कुछ याद कर कहा, "जी, ध्यानाकर्षण। एक कविता, जो लाला जी के सम्पादन में प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक पत्र "अंगारा" में छपी थी।"
इस पर श्री ठाकुर सर ने कहा, "गलत। "वैदेही-वनवास" तुम्हारी पहली रचना थी।" और मैं सन्न रह गया। कारण, मुझे स्वयं ही याद नहीं था कि वाकई "वैदेही-वनवास" ही मेरी पहली रचना थी। यह दरअसल मेरा एक खण्ड-काव्य है, जिसके कुछ ही अध्याय मैं लिख पाया था और वह आज भी उसी स्थिति में है। मुझे श्री ठाकुर सर की स्मृति पर घोर आश्चर्य हुआ। इससे यही तो साबित होता है कि उन्हें मेरी रचनाओं से कितना लगाव रहा है। अब जब बात चल ही पड़ी है तो बता ही दूँ कि श्री ठाकुर सर अँग्रेजी के शिक्षक थे और "कड़क" इतने कि हम अँग्रेजी का एक भी वाक्य गलत बोलने की जुर्रत ही नहीं कर सकते थे। पूरी पाठशाला उन्हीं के कारण अनुशासित हुआ करती थी। जिस रास्ते पर वे चलते नजर आ जाते, मजाल थी कि कोई विद्यार्थी उधर से गुजरने तक की जुर्रत करे! यह सब डर की वजह से नहीं, अनुशासन के पालन के चलते और उनके प्रति श्रद्धा और आदर के कारण हुआ करता था। आज भी आदरणीय ठाकुर सर के प्रति कोंडागाँव की पुरानी पीढ़ी के मन में वही श्रद्धा और भक्ति-भावना है, जो पहले थी। 
बात को और अधिक लम्बा न खींचते हुए मैं अब मूल प्रसंग की ओर लौटता हूँ। आदरणीय गुरुदेव श्री सुरेन्द्र रावल की कविताओं का एकमात्र संग्रह प्रकाशित है। शीर्षक है, "काव्य-यात्रा"। इस संग्रह की भूमिका "अपनी बात" में वे कहते हैं : 
"प्रस्तुत काव्य-संग्रह "काव्य-यात्रा" वस्तुत: मेरी साढ़े चार दशकों की काव्य-यात्रा ही है। समय के इस लम्बे अन्तराल में, देश, समाज, साहित्य, कला, संस्कृति तथा जीवन-मूल्यों में भी तीव्र गति से परिवर्तन हुए हैं। साहित्य में भाषा, कथ्य, शिल्प और अभिव्यंजना-शैली ही नहीं, सरोकार भी बदले हैं। 
"प्रस्तुत संग्रह की रचनाओं पर, अपने रचना-काल की प्रवृत्तियों का प्रभाव स्वाभाविक रूप से पड़ा है। मैंने अपने प्रिय पाठकों के रुचि-वैविध्य पर विश्वास रख कर, संग्रह में रचनाएँ काल-क्रमानुसार नहीं रखी हैं। काव्य-संग्रह में प्रारंभ से अंत तक पाठक की रुचि बनी रहे, यही मेरा अभीष्ट है।
"इसमें मेरी नई-पुरानी, छन्दबद्ध, छन्दमुक्त, छन्दमुक्त-लयबद्ध रचनाएँ हैं। गीतों, ग़ज़लों, मुक्तकों और क्षणिकाओं को भी मैंने इसमें सम्मिलित किया है। इनमें से अनेक रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित अथवा आकाशवाणी रायपुर, जगदलपुर, रींवा तथा दूरदर्शन केन्द्र जगदलपुर से प्रसारित हुई हैं। अंचल के विभिन्न स्थानों में, समय-समय पर होने वाले कवि-सम्मेलनों या काव्य-गोष्ठियों में, कुछ रचनाओं का पाठ भी मैंने किया है। पुस्तकाकार प्रकाशन की तुलना में मुझे, इन माध्यमों से अभिव्यक्ति अधिक जीवन्त और सार्थक लगती रही है। हर साहित्यकार की तरह ही, सुधी श्रोता, मुझे पाठकों से अधिक प्रिय प्रतीत होते रहे हैं। 
"यह मेरा प्रथम प्रकाशित काव्य-संग्रह है, अत: कुछ तथ्यों के प्रकाशन के साथ ही अपनों के प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन मेरा कत्र्तव्य है।
"छन्दों के संस्कार मेरे काव्य-गुरु, मेरे आदर्श, आदरणीय श्री लाला जगदलपुरी जी ने मुझे स्नेहपूर्वक प्रदान किए। भाषा के संस्कार मुझे आदरणीय लाला जी के अतिरिक्त अपने पिता स्व. मगनलाल रावल, स्व. बद्री विशाल त्रिवेदी, स्व. पं. सुन्दरलाल त्रिपाठी, स्व. पं. शिवसेवक त्रिवेदी के अतिरिक्त मेरे गुरु रहे श्री रविशंकर दत्त, श्री भागीरथी दास, श्री बसन्त लाल झा, श्रीमती शकुन जोशी (तिवारी), डॉ. कृष्ण कुमार झा, श्री रमेश जोशी, डॉ. भगवत रावत, डॉ. धनञ्जय वर्मा, श्री टी. एस. ठाकुर आदि से मिले। 
"नई कविता, समकाली कविता और प्रगतिशील लेखन की समझ और तत्सम्बन्धी मार्गदर्शन डॉ. भगवत रावत ने मुझे स्नेहपूर्वक दिया। ग़ज़ल और उर्दू से मेरा परिचय श्री रऊफ परवेज, श्री हादीभाई रिज़वी और श्री हयात ने कराया। मैं आप सबके प्रति कृतज्ञ हूँ।
"लेखन के क्षेत्र में मुझे निरन्तर प्रोत्साहित करने वालों में आदरणीय लालाजी, पं. गंगाधर सामन्त, पं. रघुनाथ महापात्र, पं. दयाशंकर शुक्ल, श्री कमालुद्दीन कमाल, श्री इशरत मीर, श्री रऊफ परवेज, डॉ. के. के. झा, श्री शानी जी, श्री मोतीश बैनर्जी, श्री शेषाराव नायडू, श्री एन. सी. एन. राय, श्रीमती मीरा चौधरी, श्री देवेन्द्र ठाकुर, श्री बंशीलाल विश्वकर्मा, श्री रामसिंह ठाकुर एवं श्री हुकुमदास अचिन्त्य, श्री सुरेश कुमार वर्मा के अतिरिक्त मेरे भ्रातृवत् मित्र श्री जी. बी. वेसली, वरिष्ठ पत्रकार श्री किरीट दोशी, श्री बसन्त अवस्थी, श्री भरत अग्रवाल, श्री एस. करीमुद्दीन तथा श्री राजेन्द्र देवांगन, साहित्यकार श्री मनीष राय यादव, श्री एस. एस. पुजारी, श्री संजीव बख्शी, श्री योगेन्द्र देवांगन, प्राचार्य श्री टी. डी. मेहरा, श्री आलोक मंडल एवं परिक्षेत्राधिकारी श्री ललित दुबे रहे हैं। मेरे प्रिय युवा कवि मित्र श्री मदन आचार्य, श्री अभिलाष दवे, श्री सुभाष पाण्डेय, श्री गोपाल सिम्हा, श्री जोगेन्द्र महापात्र जोगी, श्री अवध किशोर शर्मा, श्री शिवकुमार पाण्डेय, श्री धर्मेन्द्र ठाकुर, रंगकर्मी श्री एम. ए. रहीम, श्री जी. एस. मनमोहन, श्री खुर्शीद खान, श्री विजय सिंह एवं मेरे युवा मित्र प्राचार्य डॉ. ए. के. दीक्षित, डॉ. सतीश, श्री के. परेश, श्री तरुण भटनागर और शिष्य श्री राजेन्द्र राठौर तथा श्री शिवलाल शर्मा आदि ने मुझे सम्मान और अपनापन दिया। मैं आभारी हूँ।
"प्रस्तुत संग्रह के प्रकाशन के लिए, मुझे लगभग मजबूर कर हाथ पकड़ कर काम करवाने का काम किया है, मेरे प्रिय शिष्य श्री हरिहर वैष्णव और श्री खेम वैष्णव ने। मेरे गुरु डॉ. धनञ्जय वर्मा तथा डॉ. भगवत रावत ही नहीं, मेरे ज्येष्ठ भ्राता श्री चितरंजन रावल ने मुझे डाँट-डाँट कर, प्रकाशन हेतु प्रेरित किया। परन्तु, जिनकी सविनय उलाहना और आग्रह की इसमें प्रमुख भूमिका रही है, वे हैं, मेरी पत्नी श्रीमती इन्दु रावल, पुत्र धर्मेन्द्र रावल, पुत्रवधु अ.सौ. पारुल रावल, भतीजा कमलेश रावल तथा मेरी शक्ति स्वरूपा तीन पुत्रियाँ अ.सौ. रश्मि मेहता, अ.सौ. वर्षा रावल एवं अ.सौ. प्रज्ञा त्रिवेदी। इन सबके आत्मीय आग्रह ने आखिर मेरा यह काव्य-संग्रह प्रकाशित करवा कर ही दम लिया। 
"मैं उपर्युक्त सभी अपनों के प्रति नतमस्तक हूँ। बस, इतना ही।"

इस काव्य-संग्रह का प्रस्तावना लिखा है सुप्रसिद्ध शिक्षाविद् डॉ. के. के. झा साहब ने। वे लिखते हैं :
"सुविख्यात कवि श्री सुरेन्द्र रावल के काव्य-संकलन "काव्य-यात्रा" को आद्योपान्त पढ़ने का मुझे सुअवसर मिला। नैसर्गिकता एवं स्वाभाविकता-समन्वित यह अनुपम काव्य-रचना सहृदय-संवेद्य है। जैसे-जैसे एक-एक कविता पढ़ता गया, ऐसा लगा मानों साहित्य-वल्लरी का एक-एक सुमन प्रस्फुटित होता चला गया। काव्य-यात्रा की रचनाओं का माधुर्य निश्चय ही अत्यंत रोचक एवं आश्चर्यजनक है। कविताओं में निहित सौन्दर्रय, भावाभिव्यंजना एवं सरसता मन को अनायास ही आकृष्ट करती है।
"बस्तर-सपूत श्री सुरेन्द्र रावल सच्चे अर्थों में समग्र साहित्यकार है। सरस गीत, गंभीर कविताएँ, हास्य-व्यंग्य, ग़ज़ल, समालोचना, कहानी तथा नाटक-लेखन में इनकी लेखनी सतत् सक्रिय रही है। "वाक्-शैली-सम्राट्" श्री रावल की लेखन-कला भी उतनी ही श्लाघनीय एवं स्वाभाविक है। 
"विविध साहित्यिक-सांस्कृतिक मंचो, आकाशवाणी तथा दूरदर्शन आदि के कार्यक्रमों में इनकी प्रस्तुतियाँ ही नहीं, इनका मंच-संचालन भी अत्यंत हृत्ताकर्षक रहा है। बस्तर के इस बेटे ने लगातार चार दशकों से मंच पर अपना अक्षुण्ण स्थान बना रखा है। शासकीय सेवा से निवृत्ति के उपरांत भी सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक क्षेत्र में इनकी सेवाओं की निरंतरता बनी हुई है। अत: इनकी रचनाएँ भी तृ-आयामी आधार पर उपजी हैं। 
"प्रस्तुत काव्य-संगलन की रचनाओं में बस्तर की माटी की सोंधी महक है। बस्तर के मन की व्यथा उनकी एक कविता "बस्तर की माटी" में मार्मिक रूप से झलकती है। उक्त कविता की कुछ पंक्तियाँ हैं :
"सभ्य दुनिया से हमें कुछ पूछना है
क्या हमें उत्तर मिलेगा?
था नहीं माँगा कभी हमने,
किसी से राजपथ जब,
क्यों हमारी छिन रहीं पगडंडियाँ हैं?
"प्रगतिशील लेखन की प्रखरता भी इनकी अनेक कविताओं में निद्यमान है। उनकी कविता "मेहनतकश का रन्दा" की ये पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं :
"क्यों किसान का रक्त, पसीन बन बहता है।
वज्र सरीखा तन गल-गल कर सब सहता है।
"सुई की नोंक" कविता में भूत, वर्तमान और भविष्य सब कुछ इस तरह प्रतिबिम्बित हुआ है, मानो यह मात्र कविता नहीं, एक निष्पक्ष दर्पण है। कुछ पंक्तियाँ इस तरह हैं :
विडम्बना कैसी/कि सतीत्व को अपमानित करने वाले हाथ
दुरभिसन्धियों के शिविर में थे सुरक्षित
क्यों शायद भूल गया था सुदर्शन-आक्रमण
वह केवल कर सकता था/लज्जा को वस्त्रदान का
सुरक्षात्मक कायर उपाय।
"संकलन के गीत तो सचमुच बाँध लेने की क्षमता रखते हैं। छन्दों की मर्यादा के साथ, भावों का माधुर्य मुग्ध कर देता है। इसका प्रमाण है, काव्य-रस की फुहारों से सराबोर एक गीत की ये पंक्तियाँ :
सागर में आग लगी, सोया दिन साँझ जगी।
किश्ती से उठी तान, वंशी की प्यार-पगी।
लहरों ने चंचल मन, साहिल पर पटका सिर,
सीपी में बाँधा था, मोती वह ढरका।।
"यह पंक्तियाँ स्पष्ट करती हैं कि हास्य-व्यंग्य के लब्ध-प्रतिष्ठ रचनाकार होने के सात ही श्री रावल सरस काव्य के मर्मज्ञ कवि हैं, जिनमें पाठकों का मन मोह लेने की अद्भुत क्षमता है। आत्मीय स्वागत है, उनके अनुपम ग्रन्थ "काव्य-यात्रा" का। 
"श्री सुरेन्द्र रावल की लेखनी में जादू है। मेरा मन कहता है कि उनका यह काव्य-संकलन हिन्दी के समकालीन साहित्य में मील का पत्थर सिद्ध होगा। श्री रावल के साहित्य-सागर में रचनाओं के अनेक बहुमूल्य मोती सुरक्षित हैं। हमारी वांछा-कामना है कि उनकी स्निग्ध आभा से हिन्दी-साहित्य प्रोद्भासित होता रहे, एक के बाद एक ऐसे ही उत्कृष्ट और कालजयी ग्रन्थ प्रकाशित होते रहें।
"आगामी प्रकाशनों की व्यग्र प्रतीक्षा के साथ।"

और अब उनकी एक कविता। शीर्षक है "बस्तर की माटी"


सभ्य दुनिया से हमें कुछ पूछना है,                                    
क्या हमें उत्तर मिलेगा?
था नहीं माँगा कभी हमने,
किसी से राजपथ जब,
क्यों हमारी छिन रही पगडंडियाँ हैं?

हरहराते नदी-नालों
और पर्वत, गहन वन के मध्य,
अपने खेत में हम,
मस्त "लेजा" गा रहे थे।
तुम इस क्या गलत समझे,
और "ले जाने" हमारी-
लकड़ियाँ, महुआ, खनिज, अनमोल इमली।

समझ बैठे तुम इसे आह्वान अपना,
जो हमारे रूठ बैठे देवताओं को, 
मनाने के लिए हमने
सुनाए थे उसे तुम,
सिर्फ क्या इक गीत,
एक धुन, एक लय समझे हुए थे?
प्रार्थना थी वह नहीं क्या?
पूछना वन की किसी भी
एक तितली से, सुमन से या शशक से
या कि बाँके चौकड़ी भरते-
मृगों के झुंड से,
क्या गीत हमने बेच कर,
अपनी क्षुधा को मेटने को ही रचे थे?
जब हमारे गीत फूटे थे, 
नहीं हम जानते थे,
तुम हमारे गीत को, धुन को, लयों को
जंगलों में कैद कर के,
कुछ कँटीले तार से यूँ बाँध लोगे।

हम सदा खुश थे हमारे-
नील नभ से और धरती से, वनों से,
हरहराते नदी-नालों, पर्वतों से,
गहन वन से,
थे हमें जो देवताओं ने दिए।

पर थी नहीं माँगी कभी हमने
तुम्हारी मोटरें, रेलें, सिनेमा, शहर, बिजली
और टीवी।

एक नभ, माटी, हवा, पशु-पक्षि के अतिरिक्त
कुछ पत्ते, वनों के फूल-फल बस!
और कुछ भी था नहीं चाहा, कभी कुछ।
फिर हमारे "घोटुलों" पर,
कैमरों की आँख फाड़े,
क्यों स्वयं की गंदगी,
गंदे विचारों और गंदी सभ्यता ओढ़े
चले आते रहे हो?
झाँकने घर में हमारे-
अतिथि बन कर भी
तुम्हारी दृष्टि,
पशुधन या हमारी
लाज पर पड़ती रही है।
"पेज", "सल्फी" और "लाँदा"
या कि महुए से बने मधु से
हमारी स्नेह-भीगी
अतिथि-सेवा-भावना का
क्या तुम्हारी सभ्यता में-
लूट ही प्रतिदान है?                                                    
फिर बताओ, क्यों हमारी
उच्च संस्कृति
नष्ट करने पर तुले हो?

हम तुम्हारे बिन
"नवाखानी", "दियारी" और "गोंचा"-"दसराहा" में
नाच लेंगे।
देखना हमको नहीं दिल्ली,
नहीं भोपाल,
झूठे रंगमंचों की छटाएँ।

सच बताना!
तुम हमारी नृत्य-शैली,
या हमारी नग्न देहों का
प्रदर्शन चाहते हो?
अब हमें कुछ-कुछ समझ
आने लगा है।
हम नहीं बिकते-
तुम्हारे झूठ या आश्वासनों पर।

याद रक्खो, शेर को तुमने
उसी की माँद में जा कर 
झिंझोड़ा है, जगाया है।
अगर धोखा किया उससे
भले हम पूर्व पीढ़ी के निरक्षर,
साध कर चुप्पी सदा
बैठे रहे थे,
पर नहीं अब,
सिंह के शावक कभी चुप
रह सकेंगे।
धूप, सर्दी, आँधियों के बीच पलते-
आज के पौधे बड़े मजबूत हैं।

वे झेल जाएँगे,
तपिश, आँधी, थपेड़े,
पर नहीं स्पर्श करने
दे सकेंगे-
लाज अपनी,
गीत अपने,
और उनको गुनगुनाते
राजपथ को चीर डालेंगे,
बढ़ेंगे,
देश के प्रहरी बनेंगे
लाल बस्तर के-
बनेंगे देश के प्रहरी।

और सचमुच देखना तुम
एक दिन जब
इसी बस्तर की यही-
खुशबू भरी माटी कभी
इस देश का गौरव बनेगी। 


टीप : लेजा : बस्तर का एक हल्बी लोक-गीत, पेज : चावल के टूटे दानों (कनकी) को उबाल कर बनाया गया पेय, भोजन। सल्फी : इसी नाम के पेड़ से स्रवित होने वाला सफेद मादक पेय। लाँदा : चावल को सड़ा कर बनाया गया मादक पेय जो मादक होने के साथ-साथ भूख को भी मिटाता है। नवाखानी : नवान्न के स्वागत का पर्व। दियारी : अन्नकूट का पर्व। गोंचा : रथयात्रा का पर्व। दसराहा : बस्तर का विश्व प्रसिद्ध दशहरा।