Thursday, 5 April 2018

अन्याय पर न्याय की विजय-गाथा "आठे जगार" विमोचित



प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त हुईं। गुरुमायँ द्वय हीरामनी एवं भानमती द्वारा गाया गया बस्तर का लोक महाकाव्य "आठे जगार" पुस्तक-रूप में साहित्य अकादमी, नयी दिल्ली से प्रकाशित हो गया और अन्तत: उसकी लेखकीय प्रतियाँ भी आज मिल गयीं। इस पुस्तक के साथ एक डीवीडी भी संलग्न है, जिसमें पुजारी पारा, सोनारपाल की उपर्युक्त दोनों गुरुमायों द्वारा 2005 में गाये गये "आठे जगार" के अलावा खुटीगुड़ा की देवला गुरुमायँ द्वारा 2001 में गाये गये "आठे जगार" के भी कुछ अंश आडियो रूप में और कोंडागाँव के नहरपारा तथा कोपाबेड़ा की गुरुमायँ द्वय सोनो और गुरबारी द्वारा 2015 में गाये गये "आठे जगार" के विडियो हैं। हरिहर वैष्णव द्वारा संकलित, सम्पादित और अनूदित 238 पृष्ठीय इस पुस्तक की कीमत 460.00 रुपये है और यह सॉफ्ट कवर में है। डीवीडी नि:शुल्क है। प्राप्ति-स्थल है : साहित्य अकादमी, विक्रय विभाग, "स्वाति" मन्दिर मार्ग, नयी दिल्ली 110001 पुस्तक का विमोचन हरिहर वैष्णव की पत्नी श्रीमती मायावती वैष्णव द्वारा घर पर ही सादगीपूर्ण वातावरण में किया गया। पुस्तक का आवरण चित्र तथा भीतरी रेखांकन अंचल के सुप्रसिद्ध लोकचित्रकार खेम वैष्णव ने तैयार किये हैं।







बस्तर अंचल के हल्बी परिवेश में तीन लोक महाकाव्य "तीजा जगार" या "धनकुल", "लछमी जगार" और "आठे  जगार" तथा भतरी परिवेश में एक लोक महाकाव्य "बाली जगार" प्रचलन में रहे हैं। यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि इन चारों जगारों के केन्द्र में नारी है। नारी द्वारा ही इनका गायन भी किया जाता है, जिन्हें गुरुमायँ कहते हैं। "आठे जगार" श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव तो है ही किन्तु उससे भी कहीं अधिक यह अन्याय पर न्याय की विजय-गाथा है, आततायियों से मानवता को मुक्त कराने की गाथा है; कारण, रैनी (रइनी) बाबी को अबुड़ असुर के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिये यदि रैनी (रइनी) बाबी के गर्भ से कंस का जन्म होता है तो वहीं कंस के उत्पीड़न से देबकी को मुक्ति दिलाने के लिये किरिस्ना का। मातृत्व का एक और रूप इस महागाथा में "उसी" नामक चिड़िया के प्रसंग में भी देखने को मिलता है। यह नारी को उत्पीड़न से उसकी सन्तान द्वारा मुक्ति दिलाने की महागाथा है।
भगवान श्री कृष्ण की कथा के लोक-रूप का गायन इस जगार के अन्तर्गत किया जाता है। कथा लोक-संस्कृति से अनुप्राणित होती है। इसे बच्चों का पर्व माना गया है। बच्चों के साथ-साथ अन्य श्रद्धालु जन भी इस अवसर पर व्रत रखते हैं। इस जगार की प्रमुख गायिका रही हैं बस्तर (जगदलपुर) जिले में खुटीगुड़ा नामक गाँव की गुरुमाय देवला। इन्हीं की शिष्य परम्परा में आने वाली इसी जिले की सोनारपाल (सिवनागुड़ा) निवासी गुरुमायँ हीरामनी और गुरुमायँ भानमती की ननद गुरुमायँ चमेली अभी भी इस जगार का गायन करती हैं। गुरुमायँ भानमती का असामयिक निधन 2013 में हो गया। प्रकाशित "आठे जगार" इन्हीं दोनों गुरुमायों (हीरामनी और भानमती) की प्रस्तुति है।
19 जनवरी 1955 को अविभाजित बस्तर जिले के दन्तेवाड़ा में जन्मे हरिहर वैष्णव अंचल के लोक साहित्य, विशेषत: वाचिक परम्परा के गंभीर अध्येता के रूप में जाने जाते हैं। बस्तर पर केन्द्रित उनकी अब तक 24 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और 7 प्रकाशनाधीन हैं।

Thursday, 8 February 2018

ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो देवता होय


हरिहर वैष्णव



ढाई आखर प्रेम का पढ़ कर पण्डित होने की बात तो सुनी थी किन्तु देवता होने की घटना हमें छत्तीसगढ़ के जनजाति बहुल अंचल बस्तर में ही सुनायी पड़ती है। केवल इतना ही नहीं किन्तु इनकी विधि-विधान पूर्वक पूजा-अर्चना भी होती है। इनमें से एक प्रेमी युगल है "झिटकू-मिटकी" और दूसरे, दो भाई और दो बहनें हैं, "सोमी-दामी" और "रुनकी-झुनकी"। 
इनमें से "झिटकू-मिटकी" की कथा तो बहुचर्चित है किन्तु शेष चारों की प्रेम-कथा बहुश्रुत नहीं है। कारण, इस कथा के नायक जहाँ जनजातीय समुदाय के हैं वहीं नायिकाएँ गैर जनजातीय समुदाय की। इसीलिये इनकी पूजा-अर्चना मुख्यत: इन्हीं दोनों यानी मुरिया जनजाति तथा कलार जाति के परिवारों में होती है। इनकी यह कथा मुझे ग्राम सम्बलपुर के सुग्रीव पोयाम, जो स्वयं मुरिया जनजाति से थे तथा सोनाबाल के कलार जाति के कँवल सिंह बैद ने कई वर्षों पहले सुनायी थी। 
कथा इस तरह है : वर्षों पहले की बात है, बस्तर अंचल के कोंडागाँव जिला मुख्यालय कोंडागाँव से लगभग दो-एक कोस की दूरी पर मुरिया जनजाति का एक परिवार रहा करता था। इस परिवार में दो भाई थे, सोमी और दामी। एक दिन की बात। दोनों कहीं कमाने-धमाने की सोच कर घर से निकल पड़े। चलते-चलते सम्बलपुर गाँव से लगभग पाँच कोस की दूरी पर सोनाबाल नामक गाँव जा पहुँचे। पूछताछ करते-करते दोनों एक कलार जाति के साहूकार के घर पहुँच गये। कलार बहुत धनवान था। उनके आने पर साहूकार ने उनके आने का कारण पूछा। तब उन्होंने कहा, ""हम कहीं नौकरी करके कमाएँगे, सोच कर घर से निकले हैं।"" तब साहूकार ने उन लोगों को अपने घर नौकरी देने की बात कही। दोनों राजी हो गये।



कलार साहूकार की दो बेटियाँ थीं। इनके नाम थे "रुनकी" और "झुनकी"। रुनकी और झुनकी बहुत ही सुन्दर थीं। सोमी और दामी भी वैसे ही सुन्दर थे। एक-दूसरे को देख कर इनमें आपस में प्रेम हो गया। अब देखते-ही-देखते यह बात यहाँ-से-वहाँ होते-होते साहूकार के कानों तक गयी। सुनकर साहूकार बहुत ही क्रोधित हुआ। गाँव भर के लोगों के बीच चर्चा होने लगी। तब साहूकार ने सोमी-दामी और रुनकी-झुनकी को बुलाया और समझाया। लेकिन ये लोग नहीं माने। "जिएँगे तो साथ और मरेंगे तो भी साथ" कहा। तब साहूकार ने सोमी-दामी को मारने की युक्ति सोची। यह बात सोमी-दामी ने सुनी और स्वयं ही धान की "ढुसी" के भीतर कूद कर आत्म-हत्या कर ली। धान रखने के लिये धान के पुआल को ऐंठ कर बनायी गयी रस्सी (बेंट) को लपेट कर बनाया गया भण्डारण-उपकरण "ढुसी" कहलाता है। 
इधर साहूकार उन दोनों को खोजने लगा। खोजते-खोजते इनका शव धान की ढुसी के भीतर मिला। सोमी-दामी की मृत्यु का समाचार रुनकी-झुनकी ने भी सुना। सुन कर उन दोनों ने भी आत्म-हत्या कर ली। इनके मरने के बाद साहूकार के घर में अनहोनी घटनाएँ होने लगीं। गाँव में भी दैवीय प्रकोप होने लगा।
सिरहा (जिस पर देवी की सवारी आती है) ने तन्त्र-मन्त्र से जान कर बताया कि सोमी-दामी मृत्यु के बाद प्रेत बन गए हैं। अब इनकी पूजा करनी पड़ेगी। कहते हैं कि इसी दिन से सोमी-दामी और रुनकी-झुनकी की विधि-विधान पूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है। 
मार्च-अप्रैल 2003 में जब मैं बस्तर के ऐतिहासिक-पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक सर्वेक्षण के लिये निकला तो सोनाबाल ग्राम के दुर्योधन सेठिया और गोवर्धन सेठिया ने भी यही कथा बतायी किन्तु इन दोनों भाइयों की बतायी कथा में भी कहीं-कहीं पर भिन्नता है। दुर्योधन सेठिया के अनुसार सोनाबाल गाँव में सोमी-दामी देवताओं के "जतरा (वार्षिक पूजा)" का आयोजन उन्हीं के परिवार द्वारा किया जाता है, जिसके लिये किसी से कोई आर्थिक सहायता नहीं ली जाती किन्तु उसमें सभी लोग शामिल होते हैं। आज भी सोनाबाल की कलार जाति के साथ-साथ सम्बलपुर की मुरिया जाति के घरों में सोमी-दामी देवताओं की पूजा की जाती है। सोनाबाल गाँव की मँडई (मेला) में सोमी-दामी देवता भी परिक्रमा करते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि सोनाबाल गाँव के खेतों से धान की चोरी नहीं होती। उन्होंने इस सन्दर्भ में एक घटना बतलायी : "कई वर्षों पूर्व कुछ चोर यहाँ के खेतों से धान की खड़ी फसल काट कर ले जा रहे थे किन्तु देवता के प्रताप से वे गाँव की सीमा भी नहीं लाँघ सके और उनकी वहीं पर मृत्यु हो गयी। तब से किसी ने भी चोरी का दुस्साहस नहीं किया है।"
गोंड जनजाति की मुरिया शाखा में देवतेल चढ़ाने के पहले और दूल्हा या दुल्हन को नहलाने के बाद एक रस्म होती है करसा कोंडी भरने की, अर्थात् कलश में धान भरना। यह रस्म पूरी की जाती है गाँयता-पुजारी के द्वारा। कलश भरने के बाद उसे मण्डप के चारों ओर घुमाया जाता है और फिर उसे भीतर ले जा कर रख देते हैं। इस समय महिलाओं द्वारा गाया जाने वाला गीत गोंडी में "करसा पसिह्ना पाटा" और हल्बी में "करसा कोंडी किंदरातो गीत" कहा जाता है। यह गीत जामपदर, कोंडागाँव (बस्तर-छ.ग.) के सोनधर कोराम और झिटकू राम कोराम (दिनांक 08.01.2006 को ध्वन्यांकित) के सौजन्य से (जो मेरी पुस्तक "बस्तर का आदिवासी एवं लोक संगीत", प्रकाशक : राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत, नयी दिल्ली, 2015 में सम्मिलित है) यहाँ प्रस्तुत है :

री रिलो यो रिलो रिलो री रिलो यो रिलो 
री रिलो यो रिला रिला री रिलो यो रिला
री रिलो यो रिला रिला री रिलो यो रेला
सोमी-दामी दुय भाई माँदर मारते एयेत
सोमी-दामी दुय भाई माँदर मारते एयेत
री रिलो यो रिला रिला री रिलो यो रिला
री रिलो यो रिला रिला री रिलो यो रिला।

(री रिलो यो रिलो रिलो री रिलो यो रिलो। सोमी-दामी दो भाई माँदर बजाते आ रहे हैं।)