Wednesday, 15 August 2018

बस्तर की भंगाराम देवी और डाक्टर देव
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हरिहर वैष्णव
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बस्तर अंचल के कोंडागाँव जिले में रायपुर-जगदलपुर राजमार्ग पर कोंडागाँव से लगभग 52 किलोमीटर पहले या जगदलपुर की ओर से चलें तो जगदलपुर-रायपुर राजमार्ग पर जगदलपुर से 129 किलोमीटर दूर केसकाल नामक गाँव है। इसी गाँव के एक मोहल्ले सुरडोंगर से हो कर जाते हैं एक पहाड़ी की ओर जहाँ देवी भंगाराम का मन्दिर निर्मित है।
भंगाराम देवी हैं या देवता? :
केसकाल की देवी भंगाराम के विषय में लोगों के बीच भ्रान्तियाँ बनी हुई हैं। कुछ लोग इन्हें "देवता" अर्थात् पुरुष मानते हैं तो कुछ लोग "देवी" यानी महिला। 
ऐसा सम्भवत: इसलिये होता है क्योंकि नाम के साथ "राम" शब्द जुड़ा हुआ है। 04 सितम्बर 1999 को जब मैं अपने अनुज खेम वैष्णव के साथ भादों जतरा देखने और उसके विषय में जानने के लिये केसकाल गया था, तब रास्ते में, और देवी भंगाराम के मन्दिर में भी कुछ लोगों से भेंट हुई थी। उनसे पूछने पर उन्होंने भी भंगाराम को देवी होना बताया था। इन्हीं में से एक सुरडोंगर के बलीराम पोटाई से जब हमने कहा कि हमें दन्तेवाड़ा में बताया गया था कि भंगाराम देवता हैं न कि देवी। तो उन्होंने बताया था : ""देवी है। माई लोग है। नाम के अनुसार तो देव होना चाहिये, किन्तु है देवी। यहाँ तो देवी ही मानते हैं। चोली-लहँगा नहीं पहनतीं। डोली में सवार होती हैं।"" उनकी इस बात की पुष्टि करते हैं लालसाय। वे कहते हैं, ""माई है। आँगा नहीं है उनका। डोली है। कुँअर पाट का आँगा है, नरसिंगनाथ का आँगा है, हिरा कुँअर, खाँडा डोकरा, नाँगसुरजा आदि का आँगा है। ये देव हैं। पुरुस हैं।"" यानी "डोली" प्रतीक है देवी का जबकि "आँगा" होता है, देवता का प्रतीक। किन्तु यह कहना भी सही नहीं होगा। कारण, नेलवाड़ (नारायणपुर जिला) निवासी किन्तु शासकीय सेवा में कोंडागाँव में रह रही जयमती कश्यप का कहना है कि "वंगे डोकरी" नामक देवी का भी आँगा है। यह बात उन्होने 09 मार्च 2018 को हुई उनसे चर्चा में कही। इसी तरह 10 मार्च 2018 को पुसपाल मेला का जिक्र करते हुए फेसबुक में कोंडागाँव के शकील रिज़वी ने, जो छोटे कुवाली गाँव में रहने लगे हैं, भंगाराम को स्थानीय लोगों के हवाले से देवता बताया है।
उत्पत्ति या आगमन : 
04 सितम्बर 1999 की ही बातचीत में आलोर से इस भादों जतरा में देवी भंगाराम के मन्दिर पहुँच रहे बन्सीलाल दीवान के अनुसार इस देवी का आगमन बंगाल से हुआ है। 
किन्तु वहीं कोंडागाँव जिले के बहीगाँव ग्राम के निवासी और उत्तर बस्तर, विशेषत: कोंडागाँव जिले, के पुरातात्त्विक अवशेषों के विषय में काफी जानकारी रखने वाले श्री घनश्याम सिंह नाग अपने विभिन्न स्रोतों के हवाले से भंगाराम देवी का आगमन वारंगल से होना बताते हैं। उनके अनुसार, लोग यह मानते हैं कि देवी भंगाराम वारंगल से आयीं। चूँकि लोग वारंगल का उच्चारण "ओरंगाल" किया करते थे, और आज भी लगभग यही उच्चारण करते हैं। इससे देवी का नाम "ओरंगाल" और फिर बिगड़ते-बिगड़ते "भोरंगाल" और अन्त में "भंगाराम" हो गया।
बहरहाल, हम इस विषय पर अधिक चर्चा न करते हुए और यह निष्कर्ष निकालते हुए, जो गलत भी हो सकता है, कि यह देवी ही हैं आगे बढ़ते हैं। वस्तुत: यह देवी महज केसकाल की नहीं बल्कि पूरे बस्तर अंचल की महत्त्वपूर्ण देवियों में से एक हैं। इन्हें देवी-देवताओं का न्यायाधीश भी कहा जाता है। यहाँ एक वार्षिक पूजा जिसे भादों जतरा कहते हैं, होती है। यह स्थान इसी के लिये विशेष प्रसिद्ध है।
क्या है भादों जतरा? :
वर्षों से चली आ रही परम्परा के अनुसार "भादों जतरा" जिसे "घाट मुँड भादों जतरा" भी कहा जाता है, भादों अर्थात् भाद्रपद मास में पोरा यानी पोला त्यौहार के बाद आने वाले प्रथम शनिवार को सम्पन्न होता है। यह जतरा बस्तर अंचल के गाँव-गाँव में मनाये जाने वाले "बोहरानी" की कड़ी का सबसे अन्तिम बिन्दु होता है। देवी भंगाराम के मन्दिर में सम्पन्न इस भादों जतरा के बाद वर्ष भर पूरे बस्तर अंचल में कहीं भी यह जतरा नहीं होता। इससे पहले प्रत्येक गाँव में "बोहरानी" होती है। "बोहरानी" या "रवानगी" का अर्थ है, उस गाँव के ऐसे देवी-देवता को, जो मानव का हित करने की बजाय अहित करते हों, सम्बन्धित गाँव की ग्राम-देवी के आदेश से 

अपने गाँव से विधि-विधान पूर्वक बाहर, अपने गाँव और दूसरे गाव के सँद यानी सन्धि-स्थल में ले जाकर विदा करना। इसके बाद सबसे अन्त में भंगाराम देवी के स्थल में ऐसे देवी-देवताओं को लाया जाता है। यहाँ यह देवी इनकी परीक्षा लेती है और अपराधी पाये जाने पर उसे या उन्हें मन्दिर के पीछे खाई में फेंकने का हुक्म देती है।
इस खाई में सोने-चाँदी के आभूषण, चाँदी के पुराने सिक्के तथा देवी-देवताओं के प्रतीक आँगा, डोली, टोकरे आदि फेंके गये हैं और कुछ तो ज़मीन में गाड़े गये हैं। फेंके गये सिक्के "हाँडा देव" यानी "हण्डा देव" के प्रतीक हैं। बस्तर अंचल में प्राय: "हाँडा देव" के विषय में कहा-सुना जाता है। कहते हैं कि जब सिक्के किसी हाँडी या धातु के किसी पात्र में भर कर जमीन में गाड़ दिये जाते हैं तो कुछ समय बाद वे सिक्के देवता के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। भंगाराम मन्दिर के सिरहा कोदूराम बताते हैं कि गाँव-गाँव से लाये गये ऐसे देवी-देवता, जो नकारात्मक भूमिका निभाते हैं, को ला कर माँ भंगाराम के न्यायालय में पेश किया जाता है। माँ भंगाराम उनकी परीक्षा लेती हैं और अपराधी पाये जाने पर उन्हें खाई में फेंकने का हुक्म देती हैं। वे ऐसे देवी-देवताओं को ग्यारह महीने तक अपने पास एक कमरे में "रिमाण्ड" पर रखती हैं और भादों मास में होने वाले जतरा के समय इन्हें खाई में फेकवा देती हैं। यहाँ से किसी भी वस्तु को कोई भी उठा कर ले जाने की हिम्मत नहीं करता। यदि कोई ऐसा करने का प्रयास भी करता है तो उसे परेशानियों का सामना करना पड़ता है। यहाँ तक कि ऐसे व्यक्ति के पूरे परिवार का नाश हो जाता है।
मन्दिर के भीतर प्रतिष्ठित देव-प्रतिमाओं के विषय में कोदूराम जी ने बताया कि दायीं ओर जो प्रतिमा है, वह माँ भंगाराम देवी की प्रतिमा है और चुनरी से आवृत्त है। शेष प्रतिमाएँ भी माँ भंगाराम के ही भिन्न-भिन्न रूपों की हैं किन्तु इनमें से तीन प्रतिमाएँ कपड़े से आवृत्त नहीं हैं जबकि पाँचवे क्रम पर स्थापित प्रतिमा भी कपड़े से आवृत्त है। दूसरे क्रम में कोदूराम जी के दादा बिसाल राम जी द्वारा मन्दिर को भेंट की गयी चतुर्भुजी देवी की प्रतिमा है, जो खड़ी मुद्रा में है। शेष प्रतिमाएँ भी माँ भंगाराम देवी की, देवी दन्तेश्वरी एवं सिंहवाहिनी देवी दुर्गा स्वरूपों की हैं और बिसाल राम जी के ही भाई-बन्धुओं द्वारा मन्दिर को भेंट की गयी हैं। कोदूराम जी के दादा बिसाल राम जी भी सिरहा थे। कोदूराम जी के अनुसार ये प्रतिमाएँ न तो किसी दूसरे परगने की हैं और न ही बस्तर महाराजा के स्थान की। महाराजा द्वारा मन्दिर के नीचे घाट पर जो शिला है, उसी की प्रतिष्ठा की गयी थी जिस पर तेल-हल्दी का लेपन किया जाता रहा है। उसे इसी कारण "तेलिन सती" के नाम से जाना जाता है। यहाँ पर माँ दन्तेश्वरी के नाम पर एक स्तम्भ की प्रतिष्ठा महाराजा द्वारा की गयी है।
कौन है डाक्टर देव? :
कोदूराम जी अपने पूर्वजों के हवाले से बताते हैं कि माँ भंगाराम देवी बंगाल की हैं। वहाँ से वे अपनी बहन दन्तेश्वरी देवी के साथ निकलीं बस्तर में निवास करने के लिये। चलते-चलते दोनों नागपुर पहुँची। वहाँ उस समय हैजा बीमारी फैली हुई थी। हैजा के रोगियों का उपचार एक डॉक्टर के द्वारा किया जा रहा था। वह डॉक्टर मुस्लिम था। उस समय इन दोनों बहनों ने मानव-रूप में आकर उस डॉक्टर से पूछा कि वह क्या कर रहा है? तब डॉक्टर ने पूरी बात बतायी और उन्हें भी एहतियात के तौर पर सूई यानी इंजेक्शन लगवा लेने का आग्रह किया ताकि वे इस बीमारी से बच सकें। दोनों बहनों ने उसकी बात मान ली और इंजेक्शन लगवा लिया और वहाँ से चलने को हुईं। फिर दोनों ने आपस में विचार किया कि यह तो एक भला मानुस है और चिकित्सक भी। इसकी आवश्यकता बस्तर में पड़ सकती है तो क्यों न इसे भी अपने साथ ले लिया जाये? देवियों के ऐसा विचार करते ही उस डॉक्टर की हैजा बीमारी से ही वहीं पर मृत्यु हो गयी और वे भी देव-स्वरूप हो कर दोनों देवियों के साथ 
उनके सहायक के रूप में यहाँ आ गये। कोदूराम जी के पूर्वज बिसालराम जी को देवियों ने स्वप्न में दर्शन दिया और एक बवंडर के रूप में यहाँ पधारीं। तब देवी के आदेशानुसार तत्कालीन बस्तर महाराजा भैरमदेव को भी इसकी सूचना दी गयी। इस पर महाराजा स्वयं आये और इन देवियों की प्रतिष्ठा यहाँ की। यही कारण है कि इस मन्दिर-परिसर में प्रतिष्ठित डॉक्टर देव की भी पूजा-अर्चना की जाती है। इनकी पूजा में मुर्गा, अण्डा और नीबू चढ़ाये जाते हैं। मुस्लिम होने के कारण मुर्गा हलाल किया जाता है।
लेकिन उपर्युक्त कथन से भिन्न 1938 में प्रकाशित अपनी पुस्तक "द माड़िया गोंड्स ऑफ बस्तर" के पृष्ठ 193 पर डब्ल्यू. व्ही. ग्रिग्सन लिखते हैं कि भंगाराम मन्दिर परिसर में प्रतिष्ठित डॉक्टर देव वस्तुत: एक मुस्लिम उप सहायक शल्य चिकित्सक की देव-रूप हो चुकी आत्मा है, जिसकी बस्तर से रायपुर लौटते हुए केसकाल घाटी में हैजा के प्रकोप से मृत्यु हो गयी थी। उस देवता को भंगाराम देवी के भक्तों ने भंगाराम देवी के चाकर या सहायक के रूप में भंगाराम मन्दिर परिसर में प्रतिष्ठित कर दिया। इस तरह इस देवता के विषय में भी मतैक्य नहीं है।
इसी मन्दिर-परिसर में देवी दन्तेश्वरी और अन्य दो देवताओं की प्रतिष्ठा की गयी है। इन दो देवताओं के नाम हैं, खिलौली देव और कुँअर चक्कर सिंह देव।







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