Wednesday, 27 August 2014

बस्तर (छत्तीसगढ़) अंचल के नारी-लोक की महागाथा "तीजा जगार" विमोचित

पूरे दस वर्षों की लम्बी प्रतीक्षा और धैर्य के बाद "तीजा जगार" का प्रकाशन पिछले महीने भारतीय ज्ञानपीठ से हुआ। "तीजा जगार" (गुरुमाय सुकदई द्वारा प्रस्तुत बस्तर, छत्तीसगढ़ अंचल के नारी-लोक की महागाथा) पुस्तक का विमोचन इस महागाथा की गायिका स्वयं गुरुमाय सुकदई कोर्राम के हाथों एक सादे कार्यक्रम में बिना किसी ताम-झाम के कोंडागाँव में सम्पन्न हुआ। पुस्तक का विमोचन करते हुए गुरुमायँ सुकदई भाव-विभोर हो गयीं। उन्होंने कहा कि प्राय: पुस्तकों का विमोचन बड़े-बड़े समारोहों में नामी-गिरामी व्यक्तित्वों के द्वारा किया जाना तो उन्होंने सुन रखा था किन्तु इस अलिखित महागाथा को पुस्तक-रूप में प्रस्तुत करने वाले हरिहर वैष्णव ने बजाय किसी नामी-गिरामी व्यक्तित्व के मुझ जैसी अनपढ़ और ठेठ गँवई-श्रमिक महिला से इसका विमोचन मेरे ही घऱ पर करवा कर मुझे गौरवान्वित किया है। मेरा सम्मान बढ़ाया है। मैं उनके प्रति आभार व्यक्त करती हूँ।


ज्ञात हो कि बस्तर अंचल में चार लोक महाकाव्य वाचिक परम्परा के सहारे पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरित होते आ रहे हैं। इन्हीं चार लोक महाकाव्यों में एक "तीजा जगार" भी है। "आलोचना के अमृत-पुरुष" प्रो. (डॉ.) धनंजय वर्मा जी, जो डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (मध्य प्रदेश) के कुलपति रह चुके हैं, इस पुस्तक के फ्लैप पर लिखते हैं, "वाचिक परम्परा में पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरित  होते आ रहे लोक-महाकाव्य "तीजा जगार" को, नारी के द्वारा, नारी के लिये, नारी की  महागाथा कहना अतिशयोक्ति न होगा। आदिवासी बहुल बस्तर अंचल शुरू से ही मातृ-शक्ति का उपासक रहा है। "तीजा जगार" उसी मातृ-शक्ति की महागाथा है। इसमें नारी का मातृ-रूप ही मुखर है। नारी यहाँ तुलसी का बिरवा रोपती है, सरोवर और बावड़ी खुदवाती है, बाग़-बगीचे लगवाती है तो निष्प्रयोजन नहीं; वह इनके माध्यम से सम्पूर्ण मानवता, जीव-जन्तु और पेड़-पौधों यानि प्राणि-मात्र के लिये अपनी ममता का अक्षय कोष खुले हाथों लुटाती है। वर्षों से पिछड़ा कहे जाने को अभिशप्त बस्तर अंचल के आदिवासियों की नैतिक और सांस्कृतिक समृद्धि का दस्तावेज है, "तीजा जगार"। आदिवासियों की घोटुल जैसी पवित्र संस्था को विकृत रूप में पेश करने वाले विदेशी ही नहीं, देशी नृतत्त्वशास्त्री, साहित्यकार, छायाकार, कलाकार आदि संस्कृति-कर्मियों की दृष्टि से अब तक अछूती "तीजा जगार" महागाथा के माध्यम से हरिहर वैष्णव ने बस्तर की समृद्ध संस्कृति को समग्रता में प्रस्तुत किया है। बस्तर की लोक-संस्कृति और लोक-गाथा को एक नयी रोशनी में उद्घाटित करती उनकी यह शोधपूर्ण प्रस्तुति रचनात्मक अनुसन्धान के नये प्रतिमान भी स्थापित करती है।"
अब थोड़ी-सी बात इस महागाथा के प्रकाशन से पूर्व की। 2003 में प्रकाशित "गुरुमाय सुकदई द्वारा प्रस्तुत बस्तर की धान्य-देवी की कथा : लछमी जगार" की प्रति मैंने अन्य प्रतिष्ठानों के साथ-साथ भारतीय ज्ञानपीठ को भी अवलोकनार्थ भेजी थी। इसे भारतीय ज्ञानपीठ के तत्कालीन निदेशक डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय जी ने गम्भीरता से लिया और 2003 के आखिरी महीने या 2004 के शुरुआती महीने का कोई एक दिन। सवेरे 9 बजे के आसपास उन्होंने मुझे फोन किया। मुझे याद है, उन्होंने फोन पर अपना परिचय देते हुए मुझसे कहा था, "यह आपने क्या कर दिया?"
इतना सुन कर मैं घबरा गया कि मुझसे ऐसा कौन-सा अपराध हो गया कि डॉ. साहब ऐसा कह रहे हैं? मेरा जवाब था, "जी, सर! मैं समझा नहीं।"
वे बोले थे, "आप भारतीय ज्ञानपीठ के विषय में जानते हैं?"
मैंने कहा, "जी सर।"
वे बोले, "आपने अपनी यह पाण्डुलिपि भारतीय ज्ञानपीठ को क्यों नहीं दी?"
मैंने संकोच के साथ कहा था, "सर! मैं इतने बड़े प्रतिष्ठान से छपने का सपना भी नहीं देख सकता।"
फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या इस तरह की और भी गाथाएँ हैं? तब मैंने उन्हें तीन और गाथाओं "तीजा जगार", "बाली जगार" और "आठे जगार के विषय में बताया। इस पर उन्होंने कहा कि मैं इन तीनों महागाथाओं को यथाशीघ्र पूरा कर भारतीय ज्ञानपीठ को भेज दूँ। इनका प्रकाशन वहीं से और एक साथ होगा। और बस! मैं जुट गया इन तीनों ही महागाथाओं के लिप्यन्तरण, संक्षेपीकरण और अनुवाद में। तीनों ही महागाथाएँ भेज दीं और सौभाग्य से तीनों ही महागाथाएँ प्रकाशन हेतु स्वीकृत कर ली गयीं। किन्तु पहले से ही स्वीकृत कई पाण्डुलिपियों के कारण इन महागाथाओं का प्रकाशन विलम्बित होता गया और अन्तत: इस वर्ष इनमें से एक "तीजा जगार" का प्रकाशन हो पाया। शेष दोनों महागाथाओं के प्रकाशन की भी प्रतीक्षा है। उम्मीद है अगले एक-दो वर्षों में इन दोनों महागाथाओं का भी प्रकाशन हो जायेगा।
इस पुस्तक में मूल हल्बी के साथ-साथ हिन्दी अनुवाद भी है, जिससे मूल लोक-भाषा का भी आनन्द आये और अनुवाद का भी। 388 पृष्ठीय इस हार्ड कवर पुस्तक की कीमत 490.00 रुपये है। अंचल के सुप्रसिद्ध लोक चित्रकार और मेरे अनुज खेम वैष्णव के बस्तर की लोक-चित्र-शैली में बने अद्भुत-आकर्षक रेखांकनों एवं उनकी पुत्री, मेरी भतीजी रागिनी के मुख-पृष्ठ से यह पुस्तक सुसज्जित है।

Sunday, 6 October 2013

लोककथायें इतिहास को आगे ले जाती हैं : डॉ. कौशलेन्द्र मिश्र

इस बार बस्तर की लोक कथाओं के संकलन "बस्तर की लोक कथाएँ" पर डॉ. कौशलेन्द्र मिश्र जी का सारगर्भित आलेख प्रस्तुत है।

 

पुस्तक :- बस्तर की लोककथायें।सम्पादक द्वय :- लाला जगदलपुरी एवं हरिहर वैष्णव।प्रकाशन :- “लोक संस्कृति और साहित्य” श्रंखला के अंतर्गत “नेशनल बुक ट्रस्ट, इण्डिया” द्वारा प्रकाशित।पुस्तक का विशेष आकर्षण :- हरिहर वैष्णव का 26 पृष्ठीय निवेदन।


वागर्थाविव संप्रक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तये। 
जगतः पितरौ वन्दे पार्वती परमेश्वरौ॥ 

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते, पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवाशिष्यते।

   पुस्तक के प्रारम्भ में प्रस्तावना या प्राक्कथन के स्थान पर एक निवेदन प्रकाशित किया गया है जो निश्चित ही इस पुस्तक का एक विशेष आकर्षण है।  
   अविभाजित पूर्व बस्तर के वर्तमान सात जिलों के वनवासी अंचलों में प्रचलित आंचलिक भाषाओं, उन्हें बोलने वाले समुदायों, भाषायी विशेषताओं,आंचलिक भाषाओं के पारस्परिक संबन्धों-प्रभावों और इन आंचलिक भाषाओं की व्याकरणीय समृद्धता का विश्लेषण करता हुआ हरिहर जी का छब्बीस पृष्ठीय निवेदन अपने आप में एक संग्रहणीय आलेख हो गया है। लोककथाओं के इस संकलन में यदि यह प्राक्कथन न होता तो पुस्तक निष्प्राण सी रह जाती। न केवल भाषाप्रेमियों अपितु भाषाविज्ञानियों और शोधछात्रों के लिये भी यह प्राक्कथन बहुत ही उपयोगी बन गया है। बस्तर की लोकबोलियों में हमें द्रविणभाषा परिवार और भारोपीयभाषा परिवार के बीच एक सहज संबन्ध स्थापित होता हुआ स्पष्ट दिखायी देता है जो भाषा के जिज्ञासुओं के लिये आनन्ददायी है।  


   भौगोलिक दूरियों के विस्तार के साथ-साथ उच्चारण में विभिन्न सामुदायिक और आंचलिक भिन्नताओं के कारण भाषाओं और बोलियों के स्वरूप में परिवर्तन होते रहते हैं। विभिन्न समुदायों के पारस्परिक सामाजिक संबन्ध जहाँ भाषाओं को प्रभावित करते हैं वहीं उन्हें समृद्धता भी प्रदान करते हैं। बस्तर की सीमायें आन्ध्रप्रदेश, ओड़िसा और महाराष्ट्र की सीमाओं को स्पर्श करती हैं इसी कारण बस्तर की बोलियों पर हिन्दी, पूर्वी, तेलुगु, मराठी, उड़िया और संस्कृत आदि भाषाओं के प्रभाव तो हैं ही प्रवासी विद्वानों, व्यापारियों, घुमंतू बंजारों, विभिन्न राजवंशी शासकों, राजसेवकों और विदेशी आक्रमणकारियों के सतत सम्पर्क के कारण तमिल, राजस्थानी, अरबी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी आदि सुदूर प्रांतों एवं राष्ट्रों की भाषाओं के भी स्पष्ट प्रभाव देखे जा सकते हैं।
  संस्कृति, सभ्यता और परम्पराओं के संवहन की मौलिक विधा के रूप में वाचिक और श्रवण परम्पराओं ने लोककथाओं को जन्म दिया है। लिपि के विकास से बहुत पहले अपने अनुभवों, सन्देशों और शिक्षाओं के सम्प्रेषण तथा मनोरंजन के लिये पूरे विश्व के मानवसमाज ने लोककथाओं की मनोरंजक विधा को अपनी-अपनी बोलियों में गढ़ा और विकसित किया। निश्चित ही लोककथाओं का उद्देश्य केवल मनोरंजन न होकर समाज की बुराइयों और शिक्षाओं को वाचिक परम्परा के माध्यम से अगली पीढ़ियों को सौंपना भी था। इसीलिये, इन लोककथाओं में मनुष्य की स्वार्थ और धूर्तता जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों के विरुद्ध बुद्धिमत्तापूर्ण उपायों से किये जाने वाले संघर्षों से प्राप्त होने वाली विजय की कामना के साथ-साथ आंचलिक विविध समस्याओं के समाधान के लिये भी कहानियाँ गढ़ी जाती रही हैं।
    कहानियाँ अपने अंचल और समुदाय का प्रतिनिधित्व करती हैं। बस्तर की लोककथाओं के माध्यम से बस्तर के जनजीवन, उनकी सरल परम्पराओं,जीवनचर्या और समस्याओं को प्रतिबिम्बित किया गया है। बस्तर की लोककथाओं की विशेषता इन कथाओं के भोलेपन और कथा कहने की शैली में दृष्टिगोचर होती है। इस नाते ये कथायें बस्तर के वनवासीसमाज की अकिंचन जीवनशैली, उनकी सोच, और उनकी परम्पराओं का एक लेखा-जोखा प्रस्तुत करती हैं।
    इन सरल कहानियों के पात्र आम वनवासी के बीच से उठकर आते हैं इसीलिये कोस्टी लोककथा “लेड़गा” का राजकुमार भी शहर घूमने की इच्छा करता है और सम्पन्न होते हुये भी जीवन की आम समस्याओं से दो-चार होता है। लोककथाओं में ऐसा भोलापन अकिंचन समाज से ही स्रवित होकर आ पाता है। राजघरानों की कुटिलताओं के किस्से भी आमआदमी के पास तक पहुँचते-पहुँचते हल्बी लोककथा ”राजा आरू बेल-कयना” एवं पनारी लोककथा “राजा चो बेटी”के किस्सों की तरह कोई न कोई चमत्कारिक समाधान खोज ही लेते हैं। यह लोकजीवन की सरलता और जीवन में सुख की आकांक्षा का प्रतीक है। अतीन्द्रिय शक्तियों में आस्था, दैवीय चमत्कार, तंत्र-मंत्र और जादू-टोना पर विश्वास आदिम मनुष्य की भौतिक सामर्थ्य सीमा के अंतिम बिन्दु से प्रकट हुये वे उपाय हैं जो किसी न किसी रूप में सुसंस्कृत, सुसभ्य और अत्याधुनिक समाज में आज भी अपना स्थान बनाये हुये हैं। अबूझमाड़ी कथा “गुमजोलाना पिटो”और दोरली कथा “देवत्तुर वराम्” के माध्यम से वनवासी समूहों द्वारा अतीन्द्रिय शक्तियों में आस्था प्रकट की गयी है जो मनुष्य को उसकी सीमित शक्तियों की आदिम अनुभूति की विनम्र स्वीकृति है।             
    मानव समाज में धूर्तों के कारण मिलने वाले दुःखों और उनसे मुक्ति के लिये युक्ति तथा दैवीय न्याय की स्थापना हेतु पशु-पक्षियों के माध्यम से मनोरंजक शैली में “सतूर कोलियाल” जैसी सरल-सपाट कहानियाँ गढ़ी गयी हैं जो बच्चों को मनोरंजन के साथ-साथ कुछ सीख भी देती हैं।   
   रक्त संबन्धों में विवाह किया जाना किसी भी विकसित और सभ्य समाज के लिये अकल्पनीय है तथापि कुछ जाति समूहों में रक्त सम्बन्धों में विवाह की परम्परा उन-उन समाजों द्वारा मान्य होकर स्थापित है। अबूझमाड़ की जनजातियों में ऐसे सम्बन्धों पर चिंता प्रकट करते हुये अबूझमाड़ी गोंडी लोककथा”ऐलड़हारी अनी तम दादाल” के माध्यम से एक सुखद एवं वैज्ञानिक सन्देश देने का प्रयास किया गया है। रक्त सम्बन्धों में विवाह की वर्जना न केवल नैतिक और सामाजिक अपितु सुस्थापित वैज्ञानिक तथ्यों का भी शुभ परिणाम है। विषमगोत्री विवाह जातक के न केवल बौद्धिक और शारीरिक विकास की उत्कृष्टता के लिये अपितु जातियों को विनाश से बचाने के लिये भी अपरिहार्य है। जेनेटिक डिसऑर्डर, म्यूटेशन और ऑटोइम्यून डिसऑर्डर जैसी विनाशक व्याधियों से बचने के लिये नयीपीढ़ी को वैज्ञानिक सन्देश देने वाली ऐसी कहानी गढ़ने के लिये लोककथाकार निश्चित ही साधुवाद के पात्र हैं।
    रात में सोते समय दादी-नानी की सीधी-सरल कहानियाँ छोटे-छोटे बच्चों के लिये न केवल मनोरंजक होती हैं अपितु बालबुद्धि में संस्कारों का बीजारोपण भी करती हैं। मनोरंजन के आधुनिक साधनों ने हमारी नयी पीढ़ी को संस्कारों से वंचित कर दिया है, पारिवारिक आत्मीय सम्बन्धों की बलि ले ली है और समाज को दिशाहीन स्थिति में छोड़ दिया है। आधुनिक संसाधनों और सिमटती भौगोलिक सीमाओं के कारण विभिन्न सभ्यताओं के पारस्परिक सन्निकर्ष के परिणामस्वरूप हमारी प्राचीन विरासतें समाप्त होने के कगार पर हैं। हम अपनी नयीपीढ़ियों को कुछ बहुत अच्छा नहीं दे पा रहे हैं, ऐसे में लोककथाओं के संकलन के माध्यम से अपनी विरासत के संरक्षण का प्रयास निश्चित ही कई दृष्टियों से प्रशंसनीय एवं अनुकरणीय है। सम्पादक द्वय से हमारा विनम्र अनुरोध है कि बस्तर अंचल की सभी बोलियों में प्रचलित लोककथाओं का एक बार पुनः संकलन कर बस्तर की प्रतिनिधि लोककथाओं का एक और अंक निकालने के सद्प्रयास का कष्ट करें।
    लोकसाहित्य समाज की सहज और भोली अभिव्यक्ति ही नहीं है वह लोकजागरूकता का भी प्रतीक है। आधुनिक जीवनशैली और जीवन को सुविधायुक्त बनाने वाले संसाधनों ने हमारी सामाजिक संवेदनाओं को कुंठित कर दिया है जिसका सीधा दुष्प्रभाव लोकसाहित्य पर पड़ा है। हम पुराने का संकलन भर कर रहे हैं, नवीन का सृजन नहीं कर पा रहे। यह एक दुःखद और निराशाजनक स्थिति है। छोटे-छोटे बच्चे जो अभी पुस्तकें पढ़ने के योग्य नहीं हुये हैं उनके लिये तो लोककथायें और लोकगीत ही उनकी जिज्ञासाओं का रुचिकर समाधान कर सकने और संस्कारों का बीजारोपण कर पाने में सक्षम हो पाते हैं। इसीलिये मेरा स्पष्ट मत है कि आज नयी पीढ़ी में संस्काराधान के लिये नये सन्दर्भों में लोकसाहित्य के नवसृजन की महती आवश्यकता है।   
    बस्तर की लोककथाओं के इस संकलन में गुण्डाधुर और गेंदसिंह जैसे भूमकाल के महानायकों की निष्फल तलाश अपने उन पाठकों को निराश करती है जो तत्कालीन शासन व्यवस्था द्वारा किये जाने वाले शोषण के विरुद्ध वनवासी समाज में स्वस्फूर्त उठे विद्रोह और उनकी वीरता की कथाओं में न केवल रुचि रखते हैं अपितु अपने अतीत में अपने पूर्वजों के गौरव को भी तलाश करते हैं। लोककथायें इतिहास को आगे ले जाती हैं, हमें गुण्डाधुर और गेंदसिंह को ज़िन्दा रखना ही होगा।     
    यद्यपि, प्रत्येक कहानी के अंत में हिंदी के पाठकों के लिये हिन्दी अनुवाद दिया गया है किंतु इस संकलन को और भी उपयोगी बनाने की दृष्टि से अगले संस्करण में मूल कहानी के प्रत्येक पैराग्राफ़ के बाद उसका हिन्दी में अनुवाद दिया जाना उन स्वाध्यायी भाषाप्रेमियों के लिये सुविधाजनक होगा जो नयी-नयी भाषाओं को सीखने में रुचि रखते हैं।
   कथाओं के साथ-साथ इस पुस्तक में यदि बस्तर के जनजीवन को प्रदर्शित करने वाले सन्दर्भित रेखाचित्र भी दिये गये होते तो बस्तर से दूर रहने वाले पाठकों को बस्तर और भी उभर कर दिखायी दिया होता।
   त्रुटिहीन प्रकाशन और मुखपृष्ठ की साजसज्जा ने पुस्तक में चारचाँद लगा दिये हैं जिसके लिये नेशनल बुक ट्रस्ट, इण्डिया साधुवाद का पात्र है। लोककथा के इस संकलन के लिये आदरणीय लाला जगदलपुरी जी एवं हरिहरवैष्णव जी का सद्प्रयास अनुकरणीय है।

भगवानेक आसेदसग्र आर्तमा ssत्मनां विभुः।
                              आत्मेच्छानुगतावात्मा नानामत्युपलक्षणः॥

इस टिप्पणी के साथ, अन्त में आज ही दूरभाष पर अकलतरा निवासी और फिलहाल दिल्ली में कार्यरत श्री सुमेर शास्त्री जी की टिप्पणी भी देना उपयुक्त जान पड़ता है। श्री शास्त्री जी की टिप्पणी है कि उन्हें मूल में जो आनन्द आया वह अनुवाद में नहीं। उनका सुझाव है कि अगले संस्करण में इस ओर ध्यान दिया जाये तो बेहतर होगा। उनके इस सुझाव के लिये मैं उनका हार्दिक धन्यवाद ज्ञापन करता हूँ और आश्वस्त करता हूँ कि अगले संस्करण (यदि आया तो) में इस कमी को दूर करने का भरसक प्रयास करूँगा। 
-हरिहर वैष्णव 




Thursday, 19 September 2013

...और नहीं रहे बस्तर मोगली चेंदरू


चेंदरू। पूरा नाम चेंदरू राम मण्डावी। आज से 54 वर्ष पहले 1959 में बस्तर का नाम अपनी कला से पूरी दुनिया में रोशन करने वाले चेन्दरू पक्षाघात से निरन्तर लड़ते हुए अन्तत: 18 सितम्बर 2013 की शाम 4 बजे इस दुनिया से चले गये। सुप्रसिद्ध स्वीडिश फिल्मकार अर्ने सक्सडॉर्फ़ ने चेंदरू और उसके पालतू शेर को ले कर एक फिल्म बनायी, "ए जंगल टेल" जिसने सारी दुनिया में धूम मचा थी। वहीं उनकी पत्नी और सुप्रसिद्ध स्वीडिश शोधकर्ता स्टेन बर्ग़मैन की पुत्री ऑस्ट्रिड सक्सडॉर्फ़ ने उसी दरम्यान इसी शीर्षक से पुस्तक लिखी। इस पुस्तक का सर्वप्रथम प्रकाशन 1960 में फ्रान्स से "चेंदरू एट सन टाइगर" शीर्षक से तथा सुविख्यात अँग्रेजी लेखक विलियम सैनसम द्वारा अँग्रेजी में किया गया अनुवाद यूनाइटेड स्टेट्स (हैरकोर्ट, ब्रेस एंड कम्पनी, न्यू यॉर्क) से "चेंदरू : द बॉय एंड द टाइगर" शीर्षक से हुआ। यह पुस्तक 60 खूबसूरत रंगीन चित्रों से सुसज्जित थी। इस फिल्म तथा पुस्तक दोनों ही के केन्द्र में थे चेंदरू और उनका शेर। 
मुझे याद है 1982 का यही सितम्बर-अक्टूबर का महीना था जब हम यानी मैं, मेरे अनुज लोक चित्रकार एवं लोक संगीतकार खेम वैष्णव, सुप्रसिद्ध धातुशिल्पी भाई जयदेव बघेल और हल्बी-हिन्दी के कवि यशवंत गौतम गढ़बेंगाल पहुँचे थे। वहाँ की सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र बने हुए बेलगुर और स्वीडिश फिल्म "ए जंगल टेल" के नायक चेन्दरु से हमारी मुलाकात हुई थी। बेलगुर वैसे तो बहुत प्रसन्न थे कि उनके यहाँ कई देशी-विदेशी लोग अक्सर आते रहते हैं और बख्शीश के रूप में उन्हें और उनके दल को कुछ रुपये मिल जाते हैं। लेकिन बातचीत के दौरान उनके दल के कुछेक सदस्यों के मन की वितृष्णा स्पष्टत: उभर कर सामने आयी थी। आभास हुआ था कि शोषण का यह चक्र यहाँ भी उसी तरह चलता आ रहा है। चंद रुपयों के प्रलोभन से हम उनकी अक्षुण्ण संस्कृति की खरीद-फरोख्त करने में मसरूफ हैं; पूरी तरह से किसी पूर्व नियोजित षड्यंत्र के तहत।
चेंदरू वैसे तो बहुत कम बोलने वाले और प्राय: गुमसुम-से रहने वाले थे, किन्तु उन्होंने बहुत थोड़े से शब्दों में ही सही, अपने क्षोभ को प्रगट कर ही दिया था, "इतने दिनों तक हम लोगों ने अपनी रोजी तक को ताक पर रख कर उस फिल्म के लिये काम किया, लेकिन हमें मेहनताना केवल दो रुपये प्रतिदिन के हिसाब से दिया गया। हाँ, इतना जरूर है कि मुझे उन लोगों ने कुछेक खिलौने (दूरबीन, अलबम आदि) दिये थे, जो कम से कम हमारे काम के तो थे ही नहीं। उन्हें भी आपके कोंडागाँव के एक ठेकेदार ने, जिसका काम गढ़बेंगाल के पास चल रहा था; हथिया लिया।"
हमने उत्सुकता से पूछा था, "नाम जानते हैं आप, उस ठेकेदार का?"
"जी नहीं, नाम तो नहीं जानता।"  चेंदरू बोले थे। हमने गौर किया था, वे जानते हुए भी अनजान बन रहे थे। क्यों? पता नहीं।
"आपने तो उन्हें बेचा होगा न?"
"नहीं साहब। बेचा नहीं। पता नहीं उन्हें कैसे मालूम हुआ कि ये चीजें मेरे पास हैं। वे एक दिन मेरे पास आये और उन चीजों को देखने की इच्छा व्यक्त की। देखने के बाद बोले, "मैं इन्हें अपने साथ ले जा रहा हूँ। बाद में तुम्हें वापस कर दूँगा।" मैंने विश्वास कर हामी भर दी। आज कई बरस हो गये किन्तु उन्होंने वापस नहीं किया। एक-दो बार मेरे कहने पर यह कह कर डाँट दिया कि तुम्हारे पास क्या सबूत है कि ये सामान तुम्हारे हैं? मैंने कभी कोई चीज तुमसे नहीं ली है। मैं क्या करता साहब, चुप रह गया।"
इसी बीच, मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग के अधीन स्थापित भारत-भवन के अन्तर्गत आधुनिक कला संग्रहालय रूपंकर के निदेशक और प्रख्यात चित्रकार जे. स्वामीनाथन अपने सहयोगियों सुरेन्द्र राजन, अकबर पदमसी तथा प्रयाग शुक्ल के साथ आदिवासी एवं लोक कलाओं के संग्रहण के सिलसिले में बस्तर-भ्रमण पर आये थे। इस दौरान गढ़बेंगाल में उन्होंने काफी समय व्यतीत किया था। तभी उनकी मुलाकात चेंदरू जी से भी हुई थी। मुझे याद आया, बातचीत के दौरान स्वामी जी ने बड़ी ही आत्मीयता से चेन्दरु जी को आश्वस्त किया था। चेन्दरु आगे बताने लगे थे, "हाल ही में पाँच-सात माह पहले एक आदमी आया था। अपने-आप को नागपुर के किसी समाचार-पत्र का संवाददाता बता रहा था। उसने गाँव के लोगों के बीच कुछ कपड़े बाँटे थे। फिर एक दिन मेरी किताब (ए जंगल टेल) कुछ दिनों में वापस करुँगा, कह कर ले गया। किन्तु आज तक वापस नहीं किया है।" वे फिर थोड़ी देर रुके, फिर बताने लगे, "फटे नोट भी बदलवा कर नए नोट ला दूँगा, कह कर ले गया है।"
चेंदरू जी की चिकित्सा के लिये छत्तीसगढ़ शासन आगे आया। विशेषत: नारायणपुर से विधायक और मन्त्री केदार कश्यप जी ने अपनी ओर से सार्थक प्रयास किये। इसके लिये वे धन्यवाद के पात्र हैं। आईबीसी-24 टीवी चैनल लगातार अपने दर्शकों को चेंदरू जी के स्वास्थ्य के विषय में समाचारों के माध्यम से जानकारी देता रहा। इसके लिये यह चैनल भी धन्यवाद का पात्र है। "आमचो बस्तर" उपन्यास के लेखक भाई राजीव रंजन प्रसाद की पुस्तक "बस्तर के जननायक" में एक अध्याय चेंदरू जी (और कीर्ति-शेष लाला जगदलपुरी) पर भी है। राजीव जी के हम आभारी हैं। 
कला की दुनिया में बस्तर का नाम आधी सदी पहले रोशन करने वाले बस्तर-मोगली कीर्ति-शेष चेंदरू जी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।





















सभी छायाचित्र : राजीव रंजन प्रसाद के सौजन्य से। 


Friday, 30 August 2013

हाशिये पर रहे साहित्य-ऋषि लाला जगदलपुरी


साहित्य-सेवा को तन-मन-धन से समर्पित, यहाँ तक कि इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये चिर कुमार रहे लालाजी (लाला जगदलपुरी) का देहावसान साहित्य-जगत के लिये एक अपूरणीय क्षति बन कर रह गयी है। अपने लेखन ही नहीं अपितु अपने मौखिक ज्ञान और अनुभव से साहित्यकारों की नयी-पुरानी पीढ़ी को सींचते उन्होंने लेखन के क्षेत्र में जीवन के लगभग आठ दशक व्यतीत कर दिये किन्तु समाज ने उन्हें उनकी साहित्य-साधना और तपस्या के लिये क्या दिया? ऐसा नहीं है कि साहित्य-जगत के पुरोधा उन्हें नहीं जानते। जानते सभी हैं। सभी ने उनके बस्तर सम्बन्धी ज्ञान और अनुभव का भरपूर लाभ भी लिया और अपने-अपने तरीके से उसका उपयोग भी किया किन्तु जिस तपस्वी से सब-कुछ पाया वे उसे ही हाशिये पर धकेलने में लगे रहे। जब कभी बस्तर सम्बन्धी कोई जानकारी लेने का समय आया, लालाजी सभी को याद आये किन्तु जब कभी सम्मान या पुरस्कार देने का समय आया, वे किसी को भी याद नहीं आये। नाम गिनाना यानी घाव को कुरेदना है। इसलिये बिना नाम लिये कहना होगा कि बस्तर की बात आते ही लालाजी को याद करने वाले महारथियों ने भी लालाजी के प्रति सदाशयता नहीं दिखायी। यह तो भला हो श्री रमेश नैय्यर जी,  श्री मुकुन्द हम्बर्डे जी और श्री अशोक पारख जी का कि 2004 के पं. सुन्दरलाल शर्मा साहित्य सम्मान (राज्य सम्मान) के लिये निर्णायक मण्डल में सम्मिलित इन महानुभावों ने लालाजी का नाम सर्वसम्मति से तय किया अन्यथा शायद यह सम्मान भी उनके हिस्से में नहीं आता। बस्तर का जन इन सभी का हृदय से आभारी है। हम आभारी हैं बस्तर विश्वविद्यालय के यशस्वी कुलपति प्रोफेसर (डॉ.) एन. डी. आर. चन्द्र जी के भी जिन्होंने लालाजी को डी. लिट्. की मानद उपाधि से अलंकृत करवाने के प्रयास अपने स्तर पर किये। यह अलग बात है कि यह उपाधि उन्हें उनके जीवन-काल में नहीं मिल पायी। पद्मश्री के लिये न तो शासन स्तर पर कोई प्रयास हुए और न ही स्वनामधन्य साहित्यिक संस्थाओं अथवा जनप्रतिनिधियों की ओर से कभी कोई पहल की गयी।

17 दिसम्बर 1920 को जगदलपुर में जन्मे, 1936 से लेखन प्रारम्भ करने वाले लालाजी की रचनाएँ 1939 से देश के विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं। स्तरीय और प्रामाणिक लेखन, जिसकी कोई सानी नहीं। जीवन के 93 वें वर्ष में 14 अगस्त 2013 की शाम 7.00 बजे उन्होंने इस संसार से विदा ले ली। उनके देहावसान की खबर को न तो प्रिन्ट मीडिया ने और न इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने ही तवज्जो दी। यह शिकायत नहीं कड़वी सच्चाई है जिसे भोगना साहित्यकार की नियति है। विशेषत: बस्तर जैसे "पिछड़े" अंचल के साहित्यकारों को तो यह भोगना ही पड़ेगा; कारण चाहे जो हों। तभी मैं कई बार सोचने लगता हूँ, "साहित्यकार! तेरी क्या बिसात?" साहित्य को राजनीति के आगे चलने वाली मशाल कहा जाता रहा है। साहित्यकार को "ओपिनियन मेकर" कहा जाता रहा है। बेकार बात है यह। फालतू है यह कहना और सोचना। कौन पूछता है साहित्यकार को? हाँ, फर्जी और जुगाड़ू तथाकथित साहित्यकारों की बात अलग है। उनकी पूछ-परख उनकी चाटुकारिता की वजह से हर जगह होती है। उनके प्रायोजित सम्मान भी होते हैं। किन्तु हमें गर्व है कि लालाजी न तो फर्जी और जुगाड़ू साहित्यकार थे और न प्रायोजित सम्मान में सहभागी। ऐसे स्वाभिमानी और सच्चे साहित्यकार को, ऐसे युगपुरुष को, ऐसे साहित्य-ऋषि को मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि। मेरा शत-शत् नमन। 
छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य परिषद् की कोंडागाँव जिला इकाई ने पिछले दिनों स्व. लालाजी की पुण्य स्मृति में बस्तर सम्भाग के साहित्यकारों को प्रतिवर्ष "इन्द्रावती सम्मान" से अलंकृत करने की घोषणा की है, जिसका हार्दिक स्वागत है। क्या राज्य शासन या प्रादेशिक स्तर पर गठित और संचालित तथाकथित स्वनामधन्य महान साहित्यिक संस्थाएँ लालाजी की पुण्य स्मृति में कोई राज्य स्तरीय सम्मान या किसी शोध अथवा सृजन पीठ की स्थापना करना उचित समझेंगी? क्या कोई लालाजी की कृतियों के समुचित मूल्यांकन के लिये आगे आने का प्रयास करेगा? 

साहित्य-ऋषि लाला जगदलपुरी की स्मृति में इन्द्रावती सम्मान


साहित्य-जगत में बस्तर के पर्यायवाची बन चुके साहित्य-ऋषि लाला जगदलपुरी की पुण्य स्मृति में प्रतिवर्ष इन्द्रावती सम्मान दिये जाने की घोषणा 25 अगस्त को यहाँ आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में की गयी। अवसर था बस्तर के वरिष्ठतम व्यंग्यकार चित्तरंजन रावल की व्यंग्य रचनाओं के संग्रह "व्यंग्य रचनाएँ" के विमोचन का। विमोचन-समारोह में जगदलपुर एवं नारायणपुर से आमन्त्रित एवं स्थानीय कवियों द्वारा काव्य-पाठ किया गया। विमोचन किया छत्तीसगढ़ प्रदेश की महिला एवं बाल विकास मन्त्री सुश्री लता उसेण्डी ने, जो स्वयं भी कोंडागाँव निवासी तथा कोंडागाँव विधान सभा क्षेत्र से विधायक हैं। 

चितरंजन रावल मूलत: व्यंग्यकार एवं कवि हैं। 80 वर्षीय श्री रावल पिछले कई दशकों से सृजन-रत हैं और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन पाते रहे हैं। इससे पहले उनका काव्य-संग्रह "कुचला हुआ सूरज" प्रकाशित हो चुका है। 












लाला जगदलपुरी, जिनकी स्मृति में बस्तर सम्भाग के साहित्यकारों को प्रतिवर्ष दिये जाने वाले "इन्द्रावती सम्मान" की घोषणा छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य परिषद्, कोंडागाँव जिला इकाई द्वारा हुई है, का जन्म 17 दिसम्बर 1920 को जगदलपुर (बस्तर-छत्तीसगढ़) में हुआ था। उन्होंने 1936 से लेखन आरम्भ किया था और 1939 से लगातार प्रकाशन पाते रहे।  प्रकाशन के साथ ही विभिन्न सम्मानों से भी वे विभूषित किये गये। साहित्य के क्षेत्र में ऋषि कहे जाने वाले लाला जगदलपुरी पिछले दिनों 14 अगस्त को हम सबको रोता-बिलखता छोड़ कर अन्तिम यात्रा के लिये प्रस्थान कर गये। छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि देश भर में अपनी रचनाओं, विशेषत: बस्तर सम्बन्धी शोधपरक और प्रामाणिक रचनाओं के लिये ख्यात लालाजी ने साहित्य-सेवा के चलते विवाह तक नहीं किया था। उनकी जीवन-संगिनी थी उनकी लेखनी और सन्तान थी उनका लेखन। उनके निधन का समाचार पाते ही बस्तर सम्भाग के गाँव-गाँव में शोक-सभाएँ आयोजित कर उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि दी गयी। हाल ही में बस्तर विश्वविद्यालय, जगदलपुर (बस्तर-छत्तीसगढ़) द्वारा उन्हें डी.लिट्. की मानद उपाधि से विभूषित किये जाने की घोषणा की गयी थी और पद्मश्री से अलंकृत किये जाने की भी चर्चा चल रही थी। 
ज्ञात हो कि उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित पुस्तक "साहित्य-ऋषि लाला जगदलपुरी : लाला जगदलपुरी समग्र" दो खण्डों में दिल्ली के यश प्रकाशन से शीघ्र ही प्रकाशित हो कर पाठकों के बीच आ रही है।

Sunday, 9 June 2013

"साहित्य-ऋषि लाला जगदलपुरी : लाला जगदलपुरी समग्र"

आज एक बहुत बड़ी खुशी आप सब साथियों के साथ बाँटने का मन बना कर उपस्थित हुआ हूँ। पिछले आठ वर्षों से जारी मेहनत अब जा कर रंग लाने को है। वरिष्ठतम साहित्यकार 92 वर्षीय लाला जगदलपुरी जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर तैयार पाण्डुलिपि "साहित्य-ऋषि लाला जगदलपुरी : लाला जगदलपुरी समग्र" शीर्षक से प्रकाशन जगत में मील का पत्थर साबित होने जा रहे दिल्ली के यश प्रकाशन से पुस्तक रूप में शीघ्र ही प्रकाशित हो कर आपके-हमारे बीच होगी। यह कम्पोज की जा चुकी है और इसके प्रूफ रीडिंग का काम जारी है। कुल 582 पृष्ठों में समायी इस सामग्री का प्रकाशन दो भागों में होने जा रहा है। पहले भाग में लाला जी का व्यक्तित्व पक्ष है तो दूसरे भाग में उनका चुनिन्दा गद्य तथा समग्र पद्य साहित्य। सहयोगी लेखकों में सम्मिलित हैं प्रो. (डॉ). धनंजय वर्मा, राम अधीर, लक्ष्मीनारायण "पयोधि", निर्मला जोशी, त्रिलोक महावर, डॉ. देवेन्द्र दीपक, त्रिभुवन पाँडेय, डॉ. रामकुमार बेहार, जयप्रकाश राय, रऊफ परवेज़, डॉ. सुरेश तिवारी, आई. जानकी, अवध किशोर शर्मा, संजीव तिवारी, केवल कृष्ण, प्रो. बी. एल. झा, सुरेन्द्र रावल, डॉ. राजेश सेठिया, राजीव रंजन प्रसाद, डॉ. रूपेन्द्र कवि, चितरंजन रावल, योगेन्द्र देवांगन, जगदीश दास, महावीर अग्रवाल, के. एल. श्रीवास्तव, उमाशंकर तिवारी  और डॉ. हबीब राहत "हुबाब"।

Saturday, 30 March 2013

बल्ले पर बस्तर की संस्कृति : लोक चित्र के माध्यम से



लगभग पन्द्रह दिनों पहले मेरे अनुज खेम वैष्णव मुझे बताते हैं कि दिल्ली स्थित "आर्ट फॉर ऑल" नामक किसी संस्था ने कुम्हारपारा (कोंडागाँव) स्थित "साथी समाजसेवी संस्था" के अध्यक्ष भूपेश तिवारी के माध्यम से उनसे सम्पर्क किया है और आईपीएल 2013 के मैच के लिये दो बल्लों पर बस्तर के लोक चित्र उकेरने का प्रस्ताव रखा है। इसके साथ ही, मेरे ईमेल आईडी पर एक मेल आता है, जिसमें नमूने के तौर पर एक बल्ले के चार अलग-अलग कोणों से लिये गये चित्र होते हैं। उधर से बताया जाता है कि खेम बल्ले पर क्या उकेरेंगे, यह उन्हीं पर निर्भर करता है। संस्था इस विषय में कुछ भी नहीं कहेगी। खेम को यह बात जँच जाती है और वे योजना बनाते हैं, बस्तर की आदिवासी एवं लोक संस्कृति को दोनों बल्लों पर उकेरने की। दिन भर नगरपालिका परिषद् की नौकरी के बाद रात में आरम्भ होती है चित्रकारी। चार-पाँच दिनों की कड़ी मेहनत के बाद अन्तत: 19 मार्च की रात 01.30 बजे वे इसे पूरा कर पाते हैं और पैंकिंग कर इसी दिन सुबह 04.30 बजे रायपुर के लिये रवाना करते हैं ताकि टीसीआई के माध्यम से इन्हें दिल्ली भेजा जा सके।
इन दोनों बल्लों पर, जिनमें से एक की लम्बाई 5.5 फीट और दूसरे की लम्बाई लगभग 1.5 फीट है, खेम ने बस्तर की संस्कृति को चित्रित किया है। बस्तर की लोकचित्र-शैलियों में से एक "जगार शैली (गड़ लिखतो)" के लोकचित्रकार हैं खेम। इन बल्लों पर खेम ने बस्तर की आदिवासी एवं लोक-संस्कृति तथा जन-जीवन को प्रदर्शित किया है। वे कहते हैं, "बस्तर का आदिवासी एवं लोक समुदाय, जो पूरी तरह वन पर आश्रित है, अपने जीवन  के प्रत्येक पल को गीत-संगीत-नृत्य और आनन्द के साथ जीता है। उसके जीवन में भी कष्ट हैं, दु:ख हैं, पीड़ा है, लाल आतंक का साया भी है; किन्तु तो भी वह अपने में मस्त बना रहना नहीं छोड़ता। यह बस्तर की आदिवासी एवं लोक संस्कृति का एक बहुत महत्त्वपूर्ण पक्ष है। विपरीत और विषम परिस्थितियों में भी जीवन कैसे जिया जाये, यह आरम्भ से ही "पिछड़ा" कहे जाने को अभिशप्त बस्तर अंचल के वनवासियों-ग्रामवासियों से सीखा जा सकता है।"
वे आगे बताते हैं, "यों तो बस्तरिया लोगों के लिये समूचे वन ही जीवन-दाता हैं तथापि महुआ का विशेष महत्त्व है। कारण, यह वृक्ष जन्म से ले कर मृत्यु तक के सभी संस्कारों में बस्तरिया जन-जीवन से जुड़ा होता है। इसके फूल, फल, पत्ते, छाल यहाँ तक की शाखाएँ-प्रशाखाएँ, छोटी-बड़ी टहनियों और जड़ तक का उपयोग जीवन के विभिन्न अवसरों पर होता रहा है। विश्वप्रसिद्ध धातु शिल्पी जयदेव बघेल और सुप्रसिद्ध लौह शिल्पी सोनाधर विश्वकर्मा यदि इस वृक्ष को "जीवन वृक्ष" कहते हैं तो इसमें कोई संशय नहीं है। मेरी दृष्टि में भी यह वृक्ष जीवन-वृक्ष ही है।"
उन्हें इस लोकचित्रकारी की प्रारम्भिक शिक्षा माँ (स्व. जयमणि वैष्णव) से मिली। आगे चल कर गुरुमायों (जगार गायिकाओं) से भी उन्हें इस कला को आगे बढ़ाने में सहयोग मिला। खेम वैष्णव का संक्षिप्त परिचय इस तरह है :
जन्म : 31.07.1958, दन्तेवाड़ा (बस्तर-छत्तीसगढ़)।
पिता : श्यामदास वैष्णव।
माता : जयमणि वैष्णव।
शिक्षा : हायर सेकेण्डरी।
मूलत: लोक चित्रकार। साथ ही बस्तर के लोक संगीत एवं छायांकन में भी पर्याप्त दखल। लोक चित्रकारी की शुरुआत 1970-71 से। सम्पूर्ण कला-कर्म बस्तर पर केन्द्रित।
प्रदर्शनियाँ : जहांगीर आर्ट गैलरी (मुम्बई), डिस्कवरी ऑफ इण्डिया (मुम्बई), नेहरू सेन्टर (मुम्बई), कमलनयन बजाज गैलरी (मुम्बई), प्रिन्स ऑफ वेल्स म्यूजियम (मुम्बई), आल इण्डिया फाईन आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स सोसायटी (नयी दिल्ली), इंजीनियरिंग इन्स्टीट्यूट ऑफ साइंस (बैंगलोर), सूरजकुण्ड क्राफ्ट्स मेला (हरियाणा), क्राफ्ट्स बाजार (माधापुर, हैदराबाद), क्राफ्ट्स मार्केट (गुवाहाटी, असम), क्राफ्ट्स मार्केट मीट (पणजी, गोवा), प्रिमिसेस ऑफ दी क्राफ्ट्स काउन्सिल फेस्टिवल (हैदराबाद), कोलकाता पार्क स्ट्रीट (कोलकाता), महन्त घासीदास संग्रहालय (रायपुर, छत्तीसगढ़), नेशनल फोकलोर सपोर्ट सेन्टर (चेन्नई), नारा सिटी (जापान)।
छत्तीसगढ़ विधान सभा भवन सौन्दर्यीकरण।
संग्रह : ऑस्ट्रेलिया, सं. रा. अमेरिका, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, इंग्लैंड, जापान, फ्रान्स, न्यूजीलैंड, इटली, रूस, इजिप्त आदि देशों के कलाप्रेमियों/कला मर्मज्ञों के निजी संग्रह में।
सम्मान आदि : लोक चित्रकला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिये 1997 में करवट कला परिषद्, भोपाल से "कला सम्मान"। दी राकेफेलर फाऊन्डेशन के आमन्त्रण पर 2002 में इटली प्रवास। देश की विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं एवं ग्रन्थों में रेखांकन एवं छायाचित्र। भारत शासन, संस्कृति विभाग के सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केन्द्र, नयी दिल्ली द्वारा पारम्परिक भित्ति चित्र के लिये "गुरु" की मान्यता। जहांगीर आर्ट गैलरी, मुम्बई द्वारा प्रकाशित समकालीन चित्रकला पर केन्द्रित "इंडियन ड्राइंग टुडे 1987" पुस्तक में स्थान। नेशनल फोकलोर सपोर्ट सेन्टर, चेन्नई द्वारा प्रकाश्य ""इन्साइक्लोपीडिया इण्डिका फॉर किड्स : कल्चर एण्ड इकोलॉजी"" के लिये बस्तर की 21 लोक कथाओं की चित्रमय प्रस्तुति। छत्तीसगढ़ राज्य वनौषधि बोर्ड द्वारा जबर्रा नामक गाँव में आयोजित कार्यशाला में भागीदारी। हैदराबाद के "हैदराबाद इन्टरनेशनल कन्वेन्शन सेन्टर (एचआईसीसी)" में आयोजित "इलेवन्थ मीटिंग ऑफ द कान्फ्रेन्स ऑफ द पार्टीज़ (एमओपी-5, सीओपी 11) टू द इन्टरनेशनल कन्वेन्शन ऑन बायोलॉजिकल डायवर्सिटी" में यूएनडीपी के प्रेक्षक के रूप में सहभागिता। यूएनडीपी के लिये बस्तर की वनौषधियों की उपयोगिता पर आधारित कैलेण्डर के लिये चित्रण। छत्तीसगढ़ राज्य युवा आयोग द्वारा "वरिष्ठ लोक चित्रकार" के रूप में सम्मानित।
सम्पर्क : सरगीपाल पारा, कोंडागाँव 494226, बस्तर-छत्तीसगढ़। मोबाइल : 99261-70261
ईमेल : hariharvaishnav@gmail.com