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Wednesday, 27 August 2014

बस्तर (छत्तीसगढ़) अंचल के नारी-लोक की महागाथा "तीजा जगार" विमोचित

पूरे दस वर्षों की लम्बी प्रतीक्षा और धैर्य के बाद "तीजा जगार" का प्रकाशन पिछले महीने भारतीय ज्ञानपीठ से हुआ। "तीजा जगार" (गुरुमाय सुकदई द्वारा प्रस्तुत बस्तर, छत्तीसगढ़ अंचल के नारी-लोक की महागाथा) पुस्तक का विमोचन इस महागाथा की गायिका स्वयं गुरुमाय सुकदई कोर्राम के हाथों एक सादे कार्यक्रम में बिना किसी ताम-झाम के कोंडागाँव में सम्पन्न हुआ। पुस्तक का विमोचन करते हुए गुरुमायँ सुकदई भाव-विभोर हो गयीं। उन्होंने कहा कि प्राय: पुस्तकों का विमोचन बड़े-बड़े समारोहों में नामी-गिरामी व्यक्तित्वों के द्वारा किया जाना तो उन्होंने सुन रखा था किन्तु इस अलिखित महागाथा को पुस्तक-रूप में प्रस्तुत करने वाले हरिहर वैष्णव ने बजाय किसी नामी-गिरामी व्यक्तित्व के मुझ जैसी अनपढ़ और ठेठ गँवई-श्रमिक महिला से इसका विमोचन मेरे ही घऱ पर करवा कर मुझे गौरवान्वित किया है। मेरा सम्मान बढ़ाया है। मैं उनके प्रति आभार व्यक्त करती हूँ।


ज्ञात हो कि बस्तर अंचल में चार लोक महाकाव्य वाचिक परम्परा के सहारे पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरित होते आ रहे हैं। इन्हीं चार लोक महाकाव्यों में एक "तीजा जगार" भी है। "आलोचना के अमृत-पुरुष" प्रो. (डॉ.) धनंजय वर्मा जी, जो डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (मध्य प्रदेश) के कुलपति रह चुके हैं, इस पुस्तक के फ्लैप पर लिखते हैं, "वाचिक परम्परा में पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरित  होते आ रहे लोक-महाकाव्य "तीजा जगार" को, नारी के द्वारा, नारी के लिये, नारी की  महागाथा कहना अतिशयोक्ति न होगा। आदिवासी बहुल बस्तर अंचल शुरू से ही मातृ-शक्ति का उपासक रहा है। "तीजा जगार" उसी मातृ-शक्ति की महागाथा है। इसमें नारी का मातृ-रूप ही मुखर है। नारी यहाँ तुलसी का बिरवा रोपती है, सरोवर और बावड़ी खुदवाती है, बाग़-बगीचे लगवाती है तो निष्प्रयोजन नहीं; वह इनके माध्यम से सम्पूर्ण मानवता, जीव-जन्तु और पेड़-पौधों यानि प्राणि-मात्र के लिये अपनी ममता का अक्षय कोष खुले हाथों लुटाती है। वर्षों से पिछड़ा कहे जाने को अभिशप्त बस्तर अंचल के आदिवासियों की नैतिक और सांस्कृतिक समृद्धि का दस्तावेज है, "तीजा जगार"। आदिवासियों की घोटुल जैसी पवित्र संस्था को विकृत रूप में पेश करने वाले विदेशी ही नहीं, देशी नृतत्त्वशास्त्री, साहित्यकार, छायाकार, कलाकार आदि संस्कृति-कर्मियों की दृष्टि से अब तक अछूती "तीजा जगार" महागाथा के माध्यम से हरिहर वैष्णव ने बस्तर की समृद्ध संस्कृति को समग्रता में प्रस्तुत किया है। बस्तर की लोक-संस्कृति और लोक-गाथा को एक नयी रोशनी में उद्घाटित करती उनकी यह शोधपूर्ण प्रस्तुति रचनात्मक अनुसन्धान के नये प्रतिमान भी स्थापित करती है।"
अब थोड़ी-सी बात इस महागाथा के प्रकाशन से पूर्व की। 2003 में प्रकाशित "गुरुमाय सुकदई द्वारा प्रस्तुत बस्तर की धान्य-देवी की कथा : लछमी जगार" की प्रति मैंने अन्य प्रतिष्ठानों के साथ-साथ भारतीय ज्ञानपीठ को भी अवलोकनार्थ भेजी थी। इसे भारतीय ज्ञानपीठ के तत्कालीन निदेशक डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय जी ने गम्भीरता से लिया और 2003 के आखिरी महीने या 2004 के शुरुआती महीने का कोई एक दिन। सवेरे 9 बजे के आसपास उन्होंने मुझे फोन किया। मुझे याद है, उन्होंने फोन पर अपना परिचय देते हुए मुझसे कहा था, "यह आपने क्या कर दिया?"
इतना सुन कर मैं घबरा गया कि मुझसे ऐसा कौन-सा अपराध हो गया कि डॉ. साहब ऐसा कह रहे हैं? मेरा जवाब था, "जी, सर! मैं समझा नहीं।"
वे बोले थे, "आप भारतीय ज्ञानपीठ के विषय में जानते हैं?"
मैंने कहा, "जी सर।"
वे बोले, "आपने अपनी यह पाण्डुलिपि भारतीय ज्ञानपीठ को क्यों नहीं दी?"
मैंने संकोच के साथ कहा था, "सर! मैं इतने बड़े प्रतिष्ठान से छपने का सपना भी नहीं देख सकता।"
फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या इस तरह की और भी गाथाएँ हैं? तब मैंने उन्हें तीन और गाथाओं "तीजा जगार", "बाली जगार" और "आठे जगार के विषय में बताया। इस पर उन्होंने कहा कि मैं इन तीनों महागाथाओं को यथाशीघ्र पूरा कर भारतीय ज्ञानपीठ को भेज दूँ। इनका प्रकाशन वहीं से और एक साथ होगा। और बस! मैं जुट गया इन तीनों ही महागाथाओं के लिप्यन्तरण, संक्षेपीकरण और अनुवाद में। तीनों ही महागाथाएँ भेज दीं और सौभाग्य से तीनों ही महागाथाएँ प्रकाशन हेतु स्वीकृत कर ली गयीं। किन्तु पहले से ही स्वीकृत कई पाण्डुलिपियों के कारण इन महागाथाओं का प्रकाशन विलम्बित होता गया और अन्तत: इस वर्ष इनमें से एक "तीजा जगार" का प्रकाशन हो पाया। शेष दोनों महागाथाओं के प्रकाशन की भी प्रतीक्षा है। उम्मीद है अगले एक-दो वर्षों में इन दोनों महागाथाओं का भी प्रकाशन हो जायेगा।
इस पुस्तक में मूल हल्बी के साथ-साथ हिन्दी अनुवाद भी है, जिससे मूल लोक-भाषा का भी आनन्द आये और अनुवाद का भी। 388 पृष्ठीय इस हार्ड कवर पुस्तक की कीमत 490.00 रुपये है। अंचल के सुप्रसिद्ध लोक चित्रकार और मेरे अनुज खेम वैष्णव के बस्तर की लोक-चित्र-शैली में बने अद्भुत-आकर्षक रेखांकनों एवं उनकी पुत्री, मेरी भतीजी रागिनी के मुख-पृष्ठ से यह पुस्तक सुसज्जित है।

Sunday, 6 October 2013

लोककथायें इतिहास को आगे ले जाती हैं : डॉ. कौशलेन्द्र मिश्र

इस बार बस्तर की लोक कथाओं के संकलन "बस्तर की लोक कथाएँ" पर डॉ. कौशलेन्द्र मिश्र जी का सारगर्भित आलेख प्रस्तुत है।

 

पुस्तक :- बस्तर की लोककथायें।सम्पादक द्वय :- लाला जगदलपुरी एवं हरिहर वैष्णव।प्रकाशन :- लोक संस्कृति और साहित्य श्रंखला के अंतर्गत नेशनल बुक ट्रस्ट, इण्डिया द्वारा प्रकाशित।पुस्तक का विशेष आकर्षण :- हरिहर वैष्णव का 26 पृष्ठीय निवेदन।


वागर्थाविव संप्रक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तये। 
जगतः पितरौ वन्दे पार्वती परमेश्वरौ॥ 

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते, पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवाशिष्यते।

   पुस्तक के प्रारम्भ में प्रस्तावना या प्राक्कथन के स्थान पर एक निवेदन प्रकाशित किया गया है जो निश्चित ही इस पुस्तक का एक विशेष आकर्षण है।  
   अविभाजित पूर्व बस्तर के वर्तमान सात जिलों के वनवासी अंचलों में प्रचलित आंचलिक भाषाओं, उन्हें बोलने वाले समुदायों, भाषायी विशेषताओं,आंचलिक भाषाओं के पारस्परिक संबन्धों-प्रभावों और इन आंचलिक भाषाओं की व्याकरणीय समृद्धता का विश्लेषण करता हुआ हरिहर जी का छब्बीस पृष्ठीय निवेदन अपने आप में एक संग्रहणीय आलेख हो गया है। लोककथाओं के इस संकलन में यदि यह प्राक्कथन न होता तो पुस्तक निष्प्राण सी रह जाती। न केवल भाषाप्रेमियों अपितु भाषाविज्ञानियों और शोधछात्रों के लिये भी यह प्राक्कथन बहुत ही उपयोगी बन गया है। बस्तर की लोकबोलियों में हमें द्रविणभाषा परिवार और भारोपीयभाषा परिवार के बीच एक सहज संबन्ध स्थापित होता हुआ स्पष्ट दिखायी देता है जो भाषा के जिज्ञासुओं के लिये आनन्ददायी है।  


   भौगोलिक दूरियों के विस्तार के साथ-साथ उच्चारण में विभिन्न सामुदायिक और आंचलिक भिन्नताओं के कारण भाषाओं और बोलियों के स्वरूप में परिवर्तन होते रहते हैं। विभिन्न समुदायों के पारस्परिक सामाजिक संबन्ध जहाँ भाषाओं को प्रभावित करते हैं वहीं उन्हें समृद्धता भी प्रदान करते हैं। बस्तर की सीमायें आन्ध्रप्रदेश, ओड़िसा और महाराष्ट्र की सीमाओं को स्पर्श करती हैं इसी कारण बस्तर की बोलियों पर हिन्दी, पूर्वी, तेलुगु, मराठी, उड़िया और संस्कृत आदि भाषाओं के प्रभाव तो हैं ही प्रवासी विद्वानों, व्यापारियों, घुमंतू बंजारों, विभिन्न राजवंशी शासकों, राजसेवकों और विदेशी आक्रमणकारियों के सतत सम्पर्क के कारण तमिल, राजस्थानी, अरबी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी आदि सुदूर प्रांतों एवं राष्ट्रों की भाषाओं के भी स्पष्ट प्रभाव देखे जा सकते हैं।
  संस्कृति, सभ्यता और परम्पराओं के संवहन की मौलिक विधा के रूप में वाचिक और श्रवण परम्पराओं ने लोककथाओं को जन्म दिया है। लिपि के विकास से बहुत पहले अपने अनुभवों, सन्देशों और शिक्षाओं के सम्प्रेषण तथा मनोरंजन के लिये पूरे विश्व के मानवसमाज ने लोककथाओं की मनोरंजक विधा को अपनी-अपनी बोलियों में गढ़ा और विकसित किया। निश्चित ही लोककथाओं का उद्देश्य केवल मनोरंजन न होकर समाज की बुराइयों और शिक्षाओं को वाचिक परम्परा के माध्यम से अगली पीढ़ियों को सौंपना भी था। इसीलिये, इन लोककथाओं में मनुष्य की स्वार्थ और धूर्तता जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों के विरुद्ध बुद्धिमत्तापूर्ण उपायों से किये जाने वाले संघर्षों से प्राप्त होने वाली विजय की कामना के साथ-साथ आंचलिक विविध समस्याओं के समाधान के लिये भी कहानियाँ गढ़ी जाती रही हैं।
    कहानियाँ अपने अंचल और समुदाय का प्रतिनिधित्व करती हैं। बस्तर की लोककथाओं के माध्यम से बस्तर के जनजीवन, उनकी सरल परम्पराओं,जीवनचर्या और समस्याओं को प्रतिबिम्बित किया गया है। बस्तर की लोककथाओं की विशेषता इन कथाओं के भोलेपन और कथा कहने की शैली में दृष्टिगोचर होती है। इस नाते ये कथायें बस्तर के वनवासीसमाज की अकिंचन जीवनशैली, उनकी सोच, और उनकी परम्पराओं का एक लेखा-जोखा प्रस्तुत करती हैं।
    इन सरल कहानियों के पात्र आम वनवासी के बीच से उठकर आते हैं इसीलिये कोस्टी लोककथा लेड़गा का राजकुमार भी शहर घूमने की इच्छा करता है और सम्पन्न होते हुये भी जीवन की आम समस्याओं से दो-चार होता है। लोककथाओं में ऐसा भोलापन अकिंचन समाज से ही स्रवित होकर आ पाता है। राजघरानों की कुटिलताओं के किस्से भी आमआदमी के पास तक पहुँचते-पहुँचते हल्बी लोककथा राजा आरू बेल-कयना एवं पनारी लोककथा राजा चो बेटीके किस्सों की तरह कोई न कोई चमत्कारिक समाधान खोज ही लेते हैं। यह लोकजीवन की सरलता और जीवन में सुख की आकांक्षा का प्रतीक है। अतीन्द्रिय शक्तियों में आस्था, दैवीय चमत्कार, तंत्र-मंत्र और जादू-टोना पर विश्वास आदिम मनुष्य की भौतिक सामर्थ्य सीमा के अंतिम बिन्दु से प्रकट हुये वे उपाय हैं जो किसी न किसी रूप में सुसंस्कृत, सुसभ्य और अत्याधुनिक समाज में आज भी अपना स्थान बनाये हुये हैं। अबूझमाड़ी कथा गुमजोलाना पिटोऔर दोरली कथा देवत्तुर वराम् के माध्यम से वनवासी समूहों द्वारा अतीन्द्रिय शक्तियों में आस्था प्रकट की गयी है जो मनुष्य को उसकी सीमित शक्तियों की आदिम अनुभूति की विनम्र स्वीकृति है।             
    मानव समाज में धूर्तों के कारण मिलने वाले दुःखों और उनसे मुक्ति के लिये युक्ति तथा दैवीय न्याय की स्थापना हेतु पशु-पक्षियों के माध्यम से मनोरंजक शैली में सतूर कोलियाल जैसी सरल-सपाट कहानियाँ गढ़ी गयी हैं जो बच्चों को मनोरंजन के साथ-साथ कुछ सीख भी देती हैं।   
   रक्त संबन्धों में विवाह किया जाना किसी भी विकसित और सभ्य समाज के लिये अकल्पनीय है तथापि कुछ जाति समूहों में रक्त सम्बन्धों में विवाह की परम्परा उन-उन समाजों द्वारा मान्य होकर स्थापित है। अबूझमाड़ की जनजातियों में ऐसे सम्बन्धों पर चिंता प्रकट करते हुये अबूझमाड़ी गोंडी लोककथाऐलड़हारी अनी तम दादाल के माध्यम से एक सुखद एवं वैज्ञानिक सन्देश देने का प्रयास किया गया है। रक्त सम्बन्धों में विवाह की वर्जना न केवल नैतिक और सामाजिक अपितु सुस्थापित वैज्ञानिक तथ्यों का भी शुभ परिणाम है। विषमगोत्री विवाह जातक के न केवल बौद्धिक और शारीरिक विकास की उत्कृष्टता के लिये अपितु जातियों को विनाश से बचाने के लिये भी अपरिहार्य है। जेनेटिक डिसऑर्डर, म्यूटेशन और ऑटोइम्यून डिसऑर्डर जैसी विनाशक व्याधियों से बचने के लिये नयीपीढ़ी को वैज्ञानिक सन्देश देने वाली ऐसी कहानी गढ़ने के लिये लोककथाकार निश्चित ही साधुवाद के पात्र हैं।
    रात में सोते समय दादी-नानी की सीधी-सरल कहानियाँ छोटे-छोटे बच्चों के लिये न केवल मनोरंजक होती हैं अपितु बालबुद्धि में संस्कारों का बीजारोपण भी करती हैं। मनोरंजन के आधुनिक साधनों ने हमारी नयी पीढ़ी को संस्कारों से वंचित कर दिया है, पारिवारिक आत्मीय सम्बन्धों की बलि ले ली है और समाज को दिशाहीन स्थिति में छोड़ दिया है। आधुनिक संसाधनों और सिमटती भौगोलिक सीमाओं के कारण विभिन्न सभ्यताओं के पारस्परिक सन्निकर्ष के परिणामस्वरूप हमारी प्राचीन विरासतें समाप्त होने के कगार पर हैं। हम अपनी नयीपीढ़ियों को कुछ बहुत अच्छा नहीं दे पा रहे हैं, ऐसे में लोककथाओं के संकलन के माध्यम से अपनी विरासत के संरक्षण का प्रयास निश्चित ही कई दृष्टियों से प्रशंसनीय एवं अनुकरणीय है। सम्पादक द्वय से हमारा विनम्र अनुरोध है कि बस्तर अंचल की सभी बोलियों में प्रचलित लोककथाओं का एक बार पुनः संकलन कर बस्तर की प्रतिनिधि लोककथाओं का एक और अंक निकालने के सद्प्रयास का कष्ट करें।
    लोकसाहित्य समाज की सहज और भोली अभिव्यक्ति ही नहीं है वह लोकजागरूकता का भी प्रतीक है। आधुनिक जीवनशैली और जीवन को सुविधायुक्त बनाने वाले संसाधनों ने हमारी सामाजिक संवेदनाओं को कुंठित कर दिया है जिसका सीधा दुष्प्रभाव लोकसाहित्य पर पड़ा है। हम पुराने का संकलन भर कर रहे हैं, नवीन का सृजन नहीं कर पा रहे। यह एक दुःखद और निराशाजनक स्थिति है। छोटे-छोटे बच्चे जो अभी पुस्तकें पढ़ने के योग्य नहीं हुये हैं उनके लिये तो लोककथायें और लोकगीत ही उनकी जिज्ञासाओं का रुचिकर समाधान कर सकने और संस्कारों का बीजारोपण कर पाने में सक्षम हो पाते हैं। इसीलिये मेरा स्पष्ट मत है कि आज नयी पीढ़ी में संस्काराधान के लिये नये सन्दर्भों में लोकसाहित्य के नवसृजन की महती आवश्यकता है।   
    बस्तर की लोककथाओं के इस संकलन में गुण्डाधुर और गेंदसिंह जैसे भूमकाल के महानायकों की निष्फल तलाश अपने उन पाठकों को निराश करती है जो तत्कालीन शासन व्यवस्था द्वारा किये जाने वाले शोषण के विरुद्ध वनवासी समाज में स्वस्फूर्त उठे विद्रोह और उनकी वीरता की कथाओं में न केवल रुचि रखते हैं अपितु अपने अतीत में अपने पूर्वजों के गौरव को भी तलाश करते हैं। लोककथायें इतिहास को आगे ले जाती हैं, हमें गुण्डाधुर और गेंदसिंह को ज़िन्दा रखना ही होगा।     
    यद्यपि, प्रत्येक कहानी के अंत में हिंदी के पाठकों के लिये हिन्दी अनुवाद दिया गया है किंतु इस संकलन को और भी उपयोगी बनाने की दृष्टि से अगले संस्करण में मूल कहानी के प्रत्येक पैराग्राफ़ के बाद उसका हिन्दी में अनुवाद दिया जाना उन स्वाध्यायी भाषाप्रेमियों के लिये सुविधाजनक होगा जो नयी-नयी भाषाओं को सीखने में रुचि रखते हैं।
   कथाओं के साथ-साथ इस पुस्तक में यदि बस्तर के जनजीवन को प्रदर्शित करने वाले सन्दर्भित रेखाचित्र भी दिये गये होते तो बस्तर से दूर रहने वाले पाठकों को बस्तर और भी उभर कर दिखायी दिया होता।
   त्रुटिहीन प्रकाशन और मुखपृष्ठ की साजसज्जा ने पुस्तक में चारचाँद लगा दिये हैं जिसके लिये नेशनल बुक ट्रस्ट, इण्डिया साधुवाद का पात्र है। लोककथा के इस संकलन के लिये आदरणीय लाला जगदलपुरी जी एवं हरिहरवैष्णव जी का सद्प्रयास अनुकरणीय है।

भगवानेक आसेदसग्र आर्तमा ssत्मनां विभुः।
                              आत्मेच्छानुगतावात्मा नानामत्युपलक्षणः॥

इस टिप्पणी के साथ, अन्त में आज ही दूरभाष पर अकलतरा निवासी और फिलहाल दिल्ली में कार्यरत श्री सुमेर शास्त्री जी की टिप्पणी भी देना उपयुक्त जान पड़ता है। श्री शास्त्री जी की टिप्पणी है कि उन्हें मूल में जो आनन्द आया वह अनुवाद में नहीं। उनका सुझाव है कि अगले संस्करण में इस ओर ध्यान दिया जाये तो बेहतर होगा। उनके इस सुझाव के लिये मैं उनका हार्दिक धन्यवाद ज्ञापन करता हूँ और आश्वस्त करता हूँ कि अगले संस्करण (यदि आया तो) में इस कमी को दूर करने का भरसक प्रयास करूँगा। 
-हरिहर वैष्णव 




Tuesday, 9 October 2012

व्यंग्य : आइये, "करप्शन डे" मनायें!


अरे ओ दुनिया वालो! अरे कभी हम "करप्ट" लोगों के बारे में भी तो सोचो। हमारे द्वारा की जा रही समाज-सेवा के बदले कभी तो हम लोगों को याद कर लिया करो। अरे भाई! रोज नहीं तो कम से कम साल में एक बार। आप लोग तो न जाने कौन-कौन से "डे" मनाते हैं, कैसे-कैसे लोगों को सम्मानित करते हैं और एक हम हैं कि बस टापते रह जाते हैं। अरे इतने सारे (365) "डे" में से एक "डे" हमारे नाम भी कर दोगे तो आपका क्या नुकसान हो जायेगा सर? नहीं, नहीं। आप ही बताइये सर कि क्या यह आप लोगों की नजरों में जायज है? क्या सर! एक के साथ माँ और दूसरे के साथ मौसी (सौतेली माँ) का व्यवहार किसी भी कोण से न्यायसंगत दिखता है क्या? सर, ये घरवाली-बाहरवाली का खेल हमारे साथ मत खेलिये। देखिये, जब आप "मदर्स डे" मना कर साल में एक बार अपनी माता पर अहसान कर देते हैं या "फादर्स डे" मना कर पिता पर, तब तो हम कुछ नहीं कहते। अच्छा है। चलो, इसी बहाने बेचारों को आप साल में एक बार तो याद कर लेते हैं। भले ही के साल के 364 दिन माँ-बाप की ऐसी-तैसी करते रहें किन्तु ठीक 365 वें दिन आपकी धमनियों में मातृ-पितृ भक्ति की गंगा-जमुनी धाराएँ प्रवाहित होने लगती हैं। बिल्कुल सही है। रोज-रोज भक्ति-धारा प्रवाहित होगी तो उसका अवमूल्यन हो जायेगा न, सर। इसीलिये साल में एक बार। बहुत अच्छी बात है, सर। वेरी गुड सर, वेरी गुड!
तो सर प्रत्येक "डे" का कोई न कोई मकसद अवश्य है, सर। जैसे, आप जब "चिल्ड्रन्स डे" मनाते हैं तो भगवान को भी यकीन हो जाता है कि बच्चे वाकई बहुत सुखी और प्रसन्न हैं। सर, यकीन पर तो दुनिया टिकी है, न! अब यह अलग बात है कि किनके बच्चे सुखी और प्रसन्न हैं और किनके नहीं। वैसे भी यह चर्चा का विषय नहीं है, सर। बहरहाल, इसी तरह जब आप "वेलेन्टाईन डे" मनाते हैं तो युवक-युवतियों को सरे आम प्रेम करने का लायसेन्स मिल जाता है, सर। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे साल भर एक-दूसरे को सरे आम प्रेम नहीं करते! करते हैं, किन्तु थोड़ी सी झिझक होती है सर, जो "वेलेन्टाईन डे" पर गधे के सिर से सींग की तरह पूरी तरह गायब हो जाती है। वे इस दिन अपने माता-पिता के सामने भी आपस में इस पवित्र कार्य को अन्जाम देने के लिये अनुमत होते हैं. सर। कुछ तो ऐसा ही करते हैं जबकि कुछ चले जाते हैं किसी "गार्डन" में और वहाँ रास-लीला रचाते हैं। इस "डे" का मकसद भी यही है सर। बड़ा बढ़िया मकसद है, सर। दिल गार्डन-गार्डन हो गया सर। क्या सर! अपने समय में यह सब क्यों नहीं था, सर? 
और इधर "फ्रेंडशिप डे" नामक एक और "डे" का आयात हो गया है सर। तो क्या बाकी दिनों सब एक-दूसरे के दुश्मन रहे आये हैं, सर और इसी एक दिन वे "फ्रेंड" हो जाते हैं? शायद ऐसा ही। केवल एक दिन के फ्रेंड? पता नहीं सर। और सर एक जो बड़ा जबरदस्त "डे" है न सर, वह मुझे बड़ा आतंकित करता है, सर। जी सर, वही "बड्डे"। अरे सर, यह "डे" साल में एक बार नहीं आता, सर। यह तो रोज ही आता है। आज मेरा, कल आपका, परसों उसका और नरसों मेरे, आपके या उसके बाप का। फिर आगे बेटे-बेटी का, नाती-पोतों का। इस तरह यह सिलसिला पूरे साल भर चलता रहता है, सर। तो सर, यह बड़ा प्राणलेवा "डे" होता है। कारण, इससे मेरा प्रत्येक महीने का बजट गड़बड़ा जाता है, सर। और अब तो यह जो "डे" है न सर, यह तो शहरों और कस्बों की सीमा लांघ कर सुदूर गाँवों तक में पहुँच चुका है, सर। 
सॉरी सर, मैं अपने मूल विषय से हटता चला जा रहा हूँ। एक मिनट सर। जरा बाथरूम से हो कर आ लूँ सर फिर मुद्दे की बात करेंगे। आप भी हो आइये सर। टेन्शन में रहेंगे तो बात नहीं बनेगी, सर। अच्छा, सर। ठीक है, सर। चलिये मैं ही हो आता हूँ, सर। हाँ तो सर, मैं आपसे निवेदन करने जा रहा था कि इतने सारे "डेज़" में से एक "डे" हमारे नाम भी कर दें, सर। भगवान आपका भला करेगा, सर। दूधो नहाओगे पूतो फलोगे, सर। और यदि आपने ऐसा कर दिया सर, तो भगवान की कसम! सच कहता हूँ, सर! यह तो आपका क्रान्तिकारी कदम होगा सर! किसी बात में अपना देश आगे रहे न रहे, किन्तु एक जिस बात में यह सबसे आगे है उसी के नाम पर एक "डे" समर्पित कर आप दुबारा दुनिया के नक्शे में इस महादेश को नम्बर वन पर ला सकते हैं, सर। इतिहास में आपका यह काम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जायेगा सर। सर, सर, सर! जी सर। यस सर! सही समझा आपने, सर! जी सर, वही "करप्शन डे" सर। नहीं, यदि मैंने कुछ गलत कहा तो बतायें, सर। जी सर। सर! यह क्या कह रहे हैं, सर? इतने बड़े देश में मुझ जैसे भ्रष्टाचारियों की क्या कमी है, सर? हम लोग बहुसंख्यक हैं, सर। तो सर, इस वर्ष से हमारे नाम पर "करप्शन डे" का ऐलान कर ही दीजिये, सर। क्या है कि हम लोगों ने अपना संघ बना लिया है, सर। और हमारे संघ ने सर्वसम्मति से तय किया है कि यदि आपने अभी और आज ही "करप्शन डे" की घोषणा नहीं की तो अगला चुनाव आपको भारी पड़ सकता है, सर। जी सर! नहीं सर। कोई परेशानी नहीं होगी, सर। सब-कुछ ठीक-ठाक हो जायेगा, सर। आप निश्चिन्त रहें, सर। मैं सब सम्हाल लूँगा, सर। बस! आपका आशीर्वाद चाहिये, सर। जी सर, आप तो जल्दी से जल्दी से इस "डे" की घोषणा कर दीजिये, सर। और फिर सर, आप भी तो हमारे ही कुनबे के हैं, सर। जी सर, इसमें राष्ट्रीय सम्मान की भी व्यवस्था हो, सर। कम से कम पाँच लाख रुपये तो सम्मान-स्वरूप दिये ही जाने चाहिये, सर। शाल-श्रीफल की आवश्यकता नहीं सर। पाँच लाख मिल जायेंगे तो स्वयं ही खरीद लेंगे, सर। उससे कम में तो यह सम्मान नहीं बल्कि अपमान ही होगा न, सर! "डे" की घोषणा होते ही हम लोग प्रस्ताव पारित कर पहला सम्मान आप ही को दिलवायेंगे, सर। आप निश्चिन्त रहें, सर। इसमें कोई बेईमानी नहीं होगी, सर। आखिर सर, चोर-चोर मौसेरे भाई या एक ही थैली के चट्टे-बट्टे जैसी कहावतें यों ही तो नहीं बनी हैं न, सर! और सर, हम लोगों का तो सिद्धान्त भी है सर, बेईमानी में भी ईमानदारी। देखा जाये तो हम लोगों से ज्यादा ईमानदार कोई होता नहीं सर। कारण, बाकी लोग ईमानदारी में बेईमानी करते हैं जबकि हम लोग बेईमानी में भी ईमानदारी! हम लोग एक्स्ट्राआर्डिनरी होते हैं, सर। और इसमें किसी को रत्ती-माशा भर भी संशय नहीं सर। बाकी आप स्वयं समझदार हैं, सर। आपको विस्तार से समझाने की तो जरूरत ही नहीं है, सर। 
जी, क्या कहा सर? जी सर। आपका यह तर्क तो बिल्कुल सही है, सर। तो फिर क्या किया जाये सर? जी फार्मूला? जी सर, बोलिये सर। मैं सुन रहा हूँ, सर। जी, जी। जी सर। यस सर। सर, सर, सर। एक्सीलेन्ट सर! अमेज़िंग..! तो ठीक है सर। ऐसा ही कर लीजिये सर। इससे कोई झंझट भी नहीं होगी सर और सबको अपना हक मिल जायेगा, सर। जी सर। तो सर, एक "डे" की जगह कई "डेज़" का ही फार्मूला ठीक है, सर। जी सर। दस "डेज़"? ठीक है सर। सही है सर। सन्तुष्टिकरण की नीति आवश्यक है, सर। जी सर। सारे के सारे "डेज़" मैं अभी सुझा देता हूँ सर, बाकी बताने को कल रहूँ न रहूँ। सर मैं न रहूँ तो मुझे मरणोपरान्त तो देंगे न, सर? जी सर, नोट कर लें सर। एक तो होगा सर "बोफोर्स घोटाला डे", दूसरा "चारा घोटाला डे", तीसरा "चावल घोटाला डे", चौथा "बारदाना घोटाला डे", पाँचवाँ "स्टाम्प घोटाला डे", छठवाँ "चीनी घोटाला डे", सातवाँ ....। जी सर? जी अच्छा, सर। ठीक है, सर। "घोटाला डेज़" की श्रृंखला में फिलहाल इतने का ही समावेश कर लेते हैं सर, और जैसी कि आपकी मन्शा है; अन्य विधाओं से जुड़ी प्रतिभाओं के लिये "रैपिस्ट्स डे", "किलर्स डे", "रॉबर्स डे" और सामान्य श्रेणी में "करप्शन डे" को सम्मिलित कर लेते हैं। इस अन्तिम श्रेणी में उन सभी महानुभावों को सम्मिलित किया जायेगा जो ऊपर वर्णित श्रेणी के क्राइटेरिया में न आते हों किन्तु जिनका अन्य महत्त्वपूर्ण रचनात्मक अवदान भुलाया भी न जा सके? ठीक है, सर। बिल्कुल ठीक है, सर। जी सर? एक और आइडिया आपके दिमाग में कौंध रहा है सर? जी सर। जैसा आप चाहें सर। अच्छा सर, इन सभी महानुभावों को उपाधियों से भी विभूषित किया जाये? जी सर। एकदम सुपर-डुपर आइडिया है सर। उपाधियाँ होंगी घोटालाश्री, घोटाला विभूषण, घोटालाभूषण, बलात्कारीश्री, हत्याराश्री, चोट्टाश्री, भ्रष्टाचारीविभूषण आदि इत्यादि। जी सर? आप और गलत निर्णय लें? नहीं सर, नहीं। यह न तो कभी हुआ है और न कभी होगा, सर! न भूतो न भविष्यति! सर, आप तो बहुत बड़े जीनियस हैं सर! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सर। नमस्कार सर। मेरा मतलब है, प्रणाम सर।


Saturday, 22 September 2012

व्यंग्य-कथा : आओ मिल कर खायें



       अभी हरिहर वैष्णव नामक इस महापुरुष के जागने का समय ही नहीं हुआ था और बलात् जगा दिया गया। इस महामना का इस दुनिया में यदि कोई दुश्मन है तो वह जो इसे बेवक्त यानी सवेरे साढ़े आठ बजे के पहले जगा दे। वह केवल दुश्मन नहीं बल्कि सबसे बड़ा दुश्मन है। ठीक वैसे ही जैसे इस देश के नेताओं का यदि कोई दुश्मन है तो वह, जो उसे पाँच साल के पहले यानी अगले चुनाव के पहले सोते से जगा दे। लेकिन नहीं। लोग हैं कि मानते ही नहीं। कोई न कोई, किसी न किसी बहाने जगाने पर आमादा रहता है साहब! उन्हें भी और मुझे भी। चैन की नींद सोने ही नहीं देते। ऐसे में जो कोफ्त होती है, उसकी तो पूछिये ही मत। यानी मेरा और नेताओं का दर्द एक-सा! वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीर पराई जाने रे। यदि मैं औरों की पीर न जानूँ तो भला वैष्णव किस बात का बाबा? आप न मानें तो मैं तेलगी वाले स्टाम्प पेपर पर लिख कर दे सकता हूँ कि इस दुनिया में मेरे अलावा दूसरा कोई है ही नहीं जो पराई पीर को जाने, समझे। 
       बहरहाल, अब ज्यादा रहस्य का सृजन न करते हुए बता ही दूँ कि मेरी प्यारी-प्यारी नींद में खलल डालने वाला कोई और नहीं बल्कि साधु-वेश में लिपटा और हाथ में वीणा लिये द्वार पर मेरा नाम ले-ले कर जोर-जोर से चीखने वाला एक अड़ियल किस्म का व्यक्ति था। मेरे घर वालों ने उसे भीख माँगने वाला समझ कर उसे भिक्षा "ऑफर" की किन्तु वह बिफर गया और कहने लगा कि वह भिखारी नहीं, देवर्षि नारद है और हरिहर वैष्णव नामक प्राणी से मिलने आया है। यह सुन कर मेरी श्रीमतीजी ने मुझे झकझोरते हुए उठाया और बड़े 'प्यार' से कहा,  "सुनते हो! एक भिखारी दूसरे भिखारी से मिलने आया है। उठो, और जा कर उसे विदा करो।" 
       अपनी प्राण-प्यारी का "प्यार भरा" आदेश पा कर मैं उठ कर सीधे दरवाजे की ओर भागा। मैंने उन्हें देखते ही पहचान लिया। वे सचमुच देवर्षि नारद ही थे। इसके पहले कि मैं उनसे कुछ कहता-सुनता, उन्होंने मुझे देखते ही गला फाड़ अन्दाज में गाना शुरु कर दिया : 
आओ मिल कर खायें
भैया, आओ मिल कर खायें।

जनता का पैसा है बाबा
मिल कर हम सब खायें
नहीं करें हम शर्म री माई
खायें और पचायें। 

पुल टूटें तो अपनी बला से
भवन गिरें गिर जायें
सड़कों पर गड्ढे पड़ने दो
हम तो मौज मनायें।

बाँध बहें बह जायें मितवा
पेड़ कटें कट जायें
चारा चर लें नेताजी तो
हम काहे खिसियायें? 


बाबू खायें साहब खायें
चपरासी भी खायें
मन्त्री खायें सन्त्री खायें
खाते वे न अघायें। 

कोई लुटे चाहे मिट जाये
हम ना मगज खपायें
हम तो भैया बड़े मजे से
लूट मचाये जायें। 

दुनिया जाये भाड़ में बन्धु
हम तो खाये जायें
खाने से डरने वाले जो
वे पाछे पछतायें। 

       इससे पहले कि वे "लाँग प्ले" की तरह बिना रुके गाते चले जाते, मैंने उन्हें चुप कराना ही उचित समझा। दौड़ कर उन तक जा पहुँचा और साष्टांग दण्डवत् पड़ गया। वे मुझे ऐसा करते देख आग बबूला हो गये। आशीर्वाद देने की बजाय तमक कर बोले, "धिक्कार है तुम पर हरिहर! तुम अभी तक वही घोंघावसन्त हो। आज दुनिया कहाँ की कहाँ पहुँच गयी! लोग अपने माँ-बाप से भी हाथ मिला कर उनका अभिवादन करने लगे हैं; हाय-हैलो करने लगे हैं। माँ-बाप के साथ जाम टकराने लगे हैं। और एक तुम हो कि अभी भी वही चरण-स्पर्श करने की दकियानूसी परिपाटी निभाये चले जा रहे हो।" 
       मुझे काटो तो खून (वैसे तो यह मुहावरा है प्रभुवर! किन्तु सच कहूँ तो यदि आप मेरा शरीर चीर कर भी देख लें तो सचमुच मेरे इस पिद्दी शरीर में खून है ही) नहीं। बहरहाल, मुझ पर आशीर्वादों की झड़ी लगाते हुए उन्होंने अपना वजनी हाथ मेरे छोटे से मुण्डी पर रखा; फिर बोले, ""बेटा हरिहर! कई वर्षों, बल्कि दशकों से तुमसे भेंट नहीं हुई थी सो आज चला आया। इधर तुम्हारे देश का हाल पहले से भी बेहतर है, सिवा तुम्हारे।"" 
नारद जी ने ऐसे कहा, मानो मुझसे मिले बगैर उनके प्राण ही तो छूटे जा रहे थे! मैंने कहा, "प्रभुवर! यह क्या कह रहे हैं आप? मैं तो प्रभु की दया से भला-चंगा हूँ। हाँ, गुड़ाखू की दया से दो-चार दाँत जरूर टूट गये हैं। बाकी सब तो ठीक-ठाक ही है।" ऐसा कहते-कहते मुझे महासमुँद वाले भाई श्री चेतन आर्य जी याद आ जाते हैं, जिन्होंने मेरा नाम ही "गुड़ाखू वाला" रख रखा है।
       वे बोले, "क्या खाक ठीक है वत्स! तुम तो अभी भी वैसे ही फटेहाल हो। तुम्हारी देह पर मांस का तो नामोनिशान नहीं। केवल हड्डियाँ ही हड्डियाँ रह गयी हैं। कंकाल हो गये हो तुम तो। न मरते हो न मोटाते। कुछ लेते क्यों नहीं? कुछ लो। खाओ-पियो। लोग खा-खा कर साँड, बल्कि सुअर हुए जा रहे हैं और एक तुम हो कि बिना खाये सींक! यह बिल्कुल अच्छी बात नहीं है। खाओ, डट कर खाओ। बस! आज तुम्हें मैं यही सीख देने आया हूँ। अगली बार आऊँ तो खाते-पीते नजर आना। तब फिर फुर्सत में बातें होंगी।" और वे चले गये।            
       वे तो चले गये किन्तु मेरे हँसते-खेलते घर में आग लगा गये। भीतर मेरी पत्नीजी तक उनकी यह सीख पहुँची और फिर उन्होंने तो साहब मेरा जीना मुहाल कर दिया। कहने लगीं, ""देखा! मैं न कहती थी आपसे बारम्बार! लेकिन यहाँ मेरी सुनता ही कौन है? अब तो चेतो। नारदजी ने जैसा कहा है, वैसा करो। यदि नहीं कर सकते तो लो, मैं तो चली अपने मायके।"" 
       उनकी झिड़की सुन कर मैंने मन ही मन ठान लिया कि देवर्षि की बात अब तो मान ही ली जाये। आज से ही खाना शुरु कर देता हूँ। उनका गीत अब मेरा मार्ग दर्शन करने लगा था और मैं तलाश रहा था खाने की सम्भावनाएँ। 

Wednesday, 15 August 2012

क्यों रक्त बह रहा है, मेरे देश वासियो?




स्वतन्त्रता दिवस के पावन अवसर पर देश-वासियों को विलम्बित हार्दिक बधाई। तकनीकी कारणों से पोस्ट विलम्बित हुआ। अत: इस विलम्बित बधाई के लिये अत्यन्त विनम्रता पूर्वक क्षमा-याचना सहित प्रस्तुत है बस्तर के रचनाकारों के 02 गीत। 
दरअसल मैं चाहता था कि दोनों गीतों को सस्वर भी प्रस्तुत किया जाये किन्तु लगातार कोशिशों के बाद भी मेरी अज्ञानतावश ऐसा नहीं हो सका। बहरहाल, प्रस्तुत हैं ये गीत "टेक्स्ट" के ही रूप में : 

01. क्यूँ रक्त बह रहा है?
02. स्वातन्त्र्य गीत




इसमें से पहले गीत "क्यूँ रक्त बह रहा है" के रचयिता हैं श्री राजेन्द्र राव "राजन"। उनके पिता स्व. गोविंद राव द्वितीय विश्व युद्ध के सैनिक रहे थे। माता का नाम था स्व. सुशीला राव। उनका जन्म 11 मार्च 1966 को कोंडागाँव (बस्तर-छ.ग.) में हुआ था। कला स्नातक श्री राव पेशे से सरस्वती शिशु मन्दिर, कोंडागाँव में शिक्षक के रूप में वर्षों से पदस्थ हैं। वे मूलत: लोक संगीतकार तथा लोक चित्रकार हैं। बस्तर के सुप्रसिद्ध लोक चित्रकार एवं लोक संगीतकार मेरे अनुज श्री खेम वैष्णव उनके कला-गुरु हैं। इसके साथ ही वे हिन्दी तथा बस्तर की लोक भाषा "हल्बी" में गीत लिखते रहे हैं। गायन में भी उन्हें महारत हासिल है। उन्हें लोक चित्रकारी का राज्य स्तरीय सम्मान 02 अक्टूबर 1997 में प्राप्त हो चुका है। इसके साथ ही, उन्हें 1992 में सृजन नाट्य सम्मान (आगरा, उ. प्र.), 1992 में रिसाली नाट्य महोत्सव सम्मान (भिलाई, छ.ग.), 1993 में पाटलिपुत्र सम्मान (पटना, बिहार) एवं 2012 में छत्तीसगढ़ लोक सेवा समिति सम्मान से नवाजा जा चुका है। 
प्रस्तुत है उनका गीत : 

"क्यूँ रक्त बह रहा है" : 

क्यूँ रक्त बह रहा है, मेरे देश-वासियो,
जागो! उठो! जवानो! मेरे देश-वासियो। 

ये सूर्य की है लालिमा, या प्यार का संदेश
जो आज तक यहाँ था, वो जा बसा विदेश
क्याँ खोदते हो खाई, मेरे देश-वासियो। 
जागो! उठो! जवानो! मेरे देश-वासियो।।

पल में उजड़-उजड़ गया, जो था चमन कभी
रोता हुआ माली यहाँ, गुजर गया अभी
फिर से चमन महकाओ, मेरे देश-वासियो।
जागो! उठो! जवानो! मेरे देश-वासियो।।

इतिहास याद कर लो, ये वक्त है तुम्हारा
दिखला दो राम बन कर, यह देश है हमारा
पहुँचा दो उस क्षितिज तक, संदेश वासियो।
जागो! उठो! जवानो! मेरे देश-वासियो।।




दूसरा गीत "स्वातन्त्र्य गीत" इस नाचीज़ का है : 


स्वतन्त्रता का गान यह, 
चिरकाल तक चलता रहे।

यह शहीदों की धरोहर
हो अमर इस गान का स्वर, 
देश पर अभिमान का 
यह भाव नित पलता रहे। 

इस धरा के मान का
संज्ञान हमको हो सदा,
देश से अनुराग का 
यह दीप नित जलता रहे। 

देश पर ना आ सके
विपदा कभी हम ठान लें,
देश पर बलिदान का 
यह राग नित चलता रहे।