Wednesday, 15 August 2012

क्यों रक्त बह रहा है, मेरे देश वासियो?




स्वतन्त्रता दिवस के पावन अवसर पर देश-वासियों को विलम्बित हार्दिक बधाई। तकनीकी कारणों से पोस्ट विलम्बित हुआ। अत: इस विलम्बित बधाई के लिये अत्यन्त विनम्रता पूर्वक क्षमा-याचना सहित प्रस्तुत है बस्तर के रचनाकारों के 02 गीत। 
दरअसल मैं चाहता था कि दोनों गीतों को सस्वर भी प्रस्तुत किया जाये किन्तु लगातार कोशिशों के बाद भी मेरी अज्ञानतावश ऐसा नहीं हो सका। बहरहाल, प्रस्तुत हैं ये गीत "टेक्स्ट" के ही रूप में : 

01. क्यूँ रक्त बह रहा है?
02. स्वातन्त्र्य गीत




इसमें से पहले गीत "क्यूँ रक्त बह रहा है" के रचयिता हैं श्री राजेन्द्र राव "राजन"। उनके पिता स्व. गोविंद राव द्वितीय विश्व युद्ध के सैनिक रहे थे। माता का नाम था स्व. सुशीला राव। उनका जन्म 11 मार्च 1966 को कोंडागाँव (बस्तर-छ.ग.) में हुआ था। कला स्नातक श्री राव पेशे से सरस्वती शिशु मन्दिर, कोंडागाँव में शिक्षक के रूप में वर्षों से पदस्थ हैं। वे मूलत: लोक संगीतकार तथा लोक चित्रकार हैं। बस्तर के सुप्रसिद्ध लोक चित्रकार एवं लोक संगीतकार मेरे अनुज श्री खेम वैष्णव उनके कला-गुरु हैं। इसके साथ ही वे हिन्दी तथा बस्तर की लोक भाषा "हल्बी" में गीत लिखते रहे हैं। गायन में भी उन्हें महारत हासिल है। उन्हें लोक चित्रकारी का राज्य स्तरीय सम्मान 02 अक्टूबर 1997 में प्राप्त हो चुका है। इसके साथ ही, उन्हें 1992 में सृजन नाट्य सम्मान (आगरा, उ. प्र.), 1992 में रिसाली नाट्य महोत्सव सम्मान (भिलाई, छ.ग.), 1993 में पाटलिपुत्र सम्मान (पटना, बिहार) एवं 2012 में छत्तीसगढ़ लोक सेवा समिति सम्मान से नवाजा जा चुका है। 
प्रस्तुत है उनका गीत : 

"क्यूँ रक्त बह रहा है" : 

क्यूँ रक्त बह रहा है, मेरे देश-वासियो,
जागो! उठो! जवानो! मेरे देश-वासियो। 

ये सूर्य की है लालिमा, या प्यार का संदेश
जो आज तक यहाँ था, वो जा बसा विदेश
क्याँ खोदते हो खाई, मेरे देश-वासियो। 
जागो! उठो! जवानो! मेरे देश-वासियो।।

पल में उजड़-उजड़ गया, जो था चमन कभी
रोता हुआ माली यहाँ, गुजर गया अभी
फिर से चमन महकाओ, मेरे देश-वासियो।
जागो! उठो! जवानो! मेरे देश-वासियो।।

इतिहास याद कर लो, ये वक्त है तुम्हारा
दिखला दो राम बन कर, यह देश है हमारा
पहुँचा दो उस क्षितिज तक, संदेश वासियो।
जागो! उठो! जवानो! मेरे देश-वासियो।।




दूसरा गीत "स्वातन्त्र्य गीत" इस नाचीज़ का है : 


स्वतन्त्रता का गान यह, 
चिरकाल तक चलता रहे।

यह शहीदों की धरोहर
हो अमर इस गान का स्वर, 
देश पर अभिमान का 
यह भाव नित पलता रहे। 

इस धरा के मान का
संज्ञान हमको हो सदा,
देश से अनुराग का 
यह दीप नित जलता रहे। 

देश पर ना आ सके
विपदा कभी हम ठान लें,
देश पर बलिदान का 
यह राग नित चलता रहे। 






































Wednesday, 8 August 2012

बस्तर के गीत-संगीत और कलाकारों की व्यथा-कथा



इधर कुछ दिनों से लोकगीतों और लोक-कलाओं के संग्रहण तथा लोक कलाकारों से मुलाकात करने की गरज से हमारी टोली लगातार आसपास और दूर-दराज के क्षेत्रों का दौरा कर रही थी। इस टोली में विश्व प्रसिद्ध धातुशिल्पी जयदेव बघेल, हल्बी और हिन्दी के युवा साहित्यकार यशवंत गौतम और अंचल के सुप्रसिद्ध लोक-संगीतकार एवं चित्रकार खेम वैष्णव भी थे। अभी तक इस टोली ने कारसिंग, हंगवा, अनतपुर, बड़े सोहंगा, छिनारी, खोरखोसा, बम्हनी, ईसलनार, बकावंड, चारगाँव और गढ़बेंगाल का दौरा किया है। अभियान के दौरान कई खट्टे-मीठे अनुभव हुए। लोगों से काफी बातें भी हुईं। कई जगहों में लोगों ने जहाँ बड़ी प्रसन्नता से सहयोग किया, वहीं कई जगहों में हमें गहरी उदासी और वितृष्णा मिली। कई जगहों में आक्रोश का भी सामना करना पड़ा।
अभी तक हम कई गाँव घूम चुके थे। बाकी था केवल अनतपुर का एक अन्य मोहल्ला। हम वहाँ भी जा पहुँचे। अनतपुर कोंडागाँव से उमरकोट के रास्ते पर कोंडागाँव से 38 किलोमीटर की दूरी पर स्थित छोटा सा गाँव है। यहाँ की प्राय: 90 प्रतिशत आबादी मुरिया जन-जाति के लोगों की है। उमरकोट से मात्र 26 किलोमीटर इधर ओड़िसा प्रान्त से लगा क्षेत्र होने के कारण यहाँ की बोली "भतरी" है। संस्कृति पर भी ओड़िसा का प्रभाव स्पष्ट नजर आता है। शहरी सभ्यता के प्रतीक रूप में चंद शासकीय कर्मचारी, जैसे शिक्षक, वनपाल, वन रक्षक, ग्राम सहायक और चिकित्सक आदि, यहाँ पदस्थ हैं। यहीं से लगभग 5-7 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व की ओर बड़े सोहंगा और वहाँ से कुल 3 किलोमीटर दक्षिण में बसा है, छिनारी गाँव। बड़े सोहंगा और छिनारी गाँवों की बोली "हल्बी" है। बड़े सोहंगा में पाठशाला है। छिनारी में प्राथमिक पाठशाला के साथ ही एक छोटा-सा शासकीय चिकित्सालय भी है। बड़े सोहंगा के लोगों में शिक्षा के प्रति अधिक जागरुकता दिखलायी पड़ी, वहीं छिनारी के लोगों में इसके ठीक विपरीत उदासीनता का भाव दिखा।

अनतपुर के आदिवासियों से जब हमने चर्चा की कि हम सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने, लगातार लोप होती जा रही आदिवासी और लोक कला के विभिन्न रूपाकारों आदि के संग्रहण के सिलसिले में वहाँ तक पहुँचे हैं, युवक-युवतियों के साथ ही साथ बुजुर्गों ने भी एक स्वर में कहा, "हमारे नृत्य-गीत केवल हमारे लिये हैं। आपके लिये नहीं। हम न तो नृत्य का प्रदर्शन करेंगे और न गीत ही सुनाएँगे।" लोगों के स्वर में तीखापन स्पष्टत: उभर आया था। और जब हमने इसके महत्त्व के विषय में बोलना चाहा, तब तो उनका विरोध और भी अधिक मुखर हो उठा : ""हम शहरियों के कारनामों से अच्छी तरह वाकिफ हैं। नृत्य-गीत के बहाने हमारी बहू-बेटियों पर बुरी नजर डालना और उन्हें फुसला कर भगा ले जाना...., केवल यही ध्येय होता है आप शहरी बाबुओं का।""
अब हमारे चौंकने की बारी थी। हम सकते में आ गये । जरूर कहीं कुछ गड़बड़ है। हमने उन्हें कुरेदा तो वे फट पड़े, ""अभी तक जितने लोग शहरों से आये हैं, एक-दो को छोड़ कर बाकी सभी ने यही किया है।""
गाँव के मुखिया बैसाखू पुजारी, जो काफी रुष्ट और क्रुद्ध थे, ने ज़मीन पर थूकते हुए कहा, ""अब देखिए, अभी हाल की ही बात है। ये जो नलकूप वाले हैं.........इन्होंने जिस-जिस गाँव में नलकूप खोदना शुरु किया, वहीं से लड़कियाँ भगा ले गये। आखिर हम कब तक यह सब सहन करते रहेंगे? बहुत हो चुका। अब हम अपने गाँव के उत्सवों में कभी भी परदेसियों को शामिल होने नहीं देंगे।""
अपने चरित्र पर प्रश्न-चिन्ह लगते देख हम खामोश नहीं रह सके थे, ""लेकिन बाबा, हम लोग वैसे नहीं हैं। कलाकार हैं। और फिर मूलत: बस्तर के रहने वाले हैं।"" हमने सफाई दी थी।
""जरूर होंगे। हम कब कहते हैं कि आप कलाकार नहीं हैं, या कि बस्तर के नहीं हैं। लेकिन बाबू, हमने आपका पेट तो नहीं देखा है, न? और फिर यहाँ जो भी आता है, यही कहता है कि हम कलाकार हैं या सरकारी कर्मचारी हैं। तुम्हारी भलाई के लिये आये हैं। लेकिन अन्त में वही होता है। लोग अपना काला मन उजागर कर ही देते हैं। और फिर सवाल यह है कि हम आखिर किस-किस को और कब तक परखते रहें? परखते-परखते तो आज कितने बरस हो गये । लूट चुके हैं लोग हमें। तो क्या हम इस परखने की प्रक्रिया में सारी उमर और पीढ़ी-दर-पीढ़ी लुटते चले जाएँ?""
बात बड़ी ही सटीक थी। हम भारी मन से केवल यह कह कर कि हाँ बाबा, बात तो सौ फीसदी सही कह रहे हैं। लेकिन हमें अफ़सोस है कि अपने आक्रोश का पात्र आपने गलत व्यक्तियों को बनाया; उठ आये थे अपने डेरे पर। हमारे तथाकथित सभ्य समाज ने इन लोगों को इस हद तक छला है कि अब सही व्यक्ति भी गलत की पंक्ति में गिना जाए तो दोष उनका नहीं, हमारा है। और फिर क्या इनका इस तरह सोचना सही नहीं है? भला बताइये, किस-किस को और कब तक परखते रहें ये........?
बहरहाल, यह बात केवल अनतपुर गाँव की नहीं है, बल्कि बस्तर जैसे प्रत्येक पिछड़े इलाके के साथ यह दुर्भाग्य जुड़ा हुआ है। जब हम गढ़बेंगाल पहुँचे तो वहाँ की सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र बने हुए बेलगुर और स्वीडिश फिल्म "ए जंगल टेल" के नायक चेंदरु से मुलाकात हुई। बेलगुर वैसे तो बड़ा प्रसन्न है कि उसके यहाँ कई देशी-विदेशी लोग अक्सर आते रहते हैं और बख्शीश के रूप में उसे और उसके दल को कुछ रुपये मिल जाते हैं। लेकिन बातचीत के दौरान उसके दल के कुछेक सदस्यों के मन की वितृष्णा स्पष्टत: उभर कर सामने आयी। आभास हुआ कि शोषण का यह चक्र यहाँ भी उसी तरह चलता आ रहा है। चंद रुपयों के प्रलोभन से हम उनकी अक्षुण्ण संस्कृति की खरीद-फरोख्त करने में मसरूफ हैं; पूरी तरह से किसी पूर्व नियोजित षड्यंत्र के तहत।
चेंदरु वैसे तो बहुत कम बोलने वाला और प्राय: गुमसुम-सा रहने वाला है, किन्तु उसने बहुत थोड़े से शब्दों में ही सही, अपने क्षोभ को प्रगट कर ही दिया, ""इतने दिनों तक हम लोगों ने अपनी रोजी तक को ताक पर रख कर उस फिल्म के लिये काम किया, लेकिन हमें मेहनताना केवल दो रुपये प्रतिदिन के हिसाब से दिया गया। हाँ, इतना जरूर है कि मुझे उन लोगों ने कुछेक खिलौने (दूरबीन, अलबम आदि) जरूर दिये थे, जो कम से कम हमारे काम के तो थे ही नहीं। उन्हें भी आपके कोंडागाँव के एक ठेकेदार ने, जिसका काम गढ़बेंगाल के पास चल रहा था; हथिया लिया।""
हमने उत्सुकता से पूछा, ""नाम जानते हो, उस ठेकेदार का?""
जी नहीं, नाम तो नहीं जानता।""  चेंदरु बोला। हमने गौर किया, वह जानते हुए भी अनजान बन रहा था। क्यों? पता नहीं।
""तुमने तो उन्हें बेचा होगा न?""
""नहीं साहब। बेचा नहीं। पता नहीं उन्हें कैसे मालूम हुआ कि ये चीजें मेरे पास हैं। वे एक दिन मेरे पास आये और उन चीजों को देखने की इच्छा व्यक्त की। देखने के बाद बोले, "मैं इन्हें अपने साथ ले जा रहा हूँ। बाद में तुम्हें वापस कर दूँगा।" मैंने विश्वास कर हामी भर दी। आज कई बरस हो गये किन्तु उन्होंने वापस नहीं किया। एक-दो बार मेरे कहने पर यह कह कर डाँट दिया कि तुम्हारे पास क्या सबूत है कि ये सामान तुम्हारे हैं? मैंने कभी कोई चीज तुमसे नहीं ली है। मैं क्या करता साहब, चुप रह गया।""
अभी हाल ही में, मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग के अधीन स्थापित भारत-भवन के अन्तर्गत आधुनिक कला संग्रहालय रूपंकर के निदेशक और प्रख्यात चित्रकार जे. स्वामीनाथन अपने सहयोगियों सुरेन्द्र राजन, अकबर पदमसी तथा प्रयाग शुक्ल के साथ आदिवासी एवं लोक कलाओं के संग्रहण के सिलसिले में बस्तर-भ्रमण पर आये थे। इस दौरान गढ़बेंगाल में उन्होंने काफी समय व्यतीत किया। तभी उनकी मुलाकात चेंदरु से भी हुई थी। मुझे याद आया, बातचीत के दौरान स्वामी जी ने बड़ी ही आत्मीयता से चेंदरु को आश्वस्त किया था। चेंदरु आगे बताने लगा, ""हाल ही में, पाँच-सात माह पहले एक आदमी आया था। अपने-आप को नागपुर के किसी समाचार-पत्र का संवाददाता बता रहा था। उसने गाँव के लोगों के बीच कुछ कपड़े बाँटे थे। फिर एक दिन मेरी किताब ("ए जंगल टेल") कुछ दिनों में वापस करुँगा, कह कर ले गया। किन्तु आज तक वापस नहीं किया है।"" वह फिर थोड़ी देर रुका, फिर बताने लगा, ""फटे नोट भी बदलवा कर नए नोट ला दूँगा, कह कर ले गया है।""
जे. स्वामीनाथन आदि के आने के पूर्व रूपंकर के लिये आदिवासी एवं लोक कला-कृतियों, जिनमें धातु, लकड़ी, लोहा, मिट्टी तथा बाँस आदि से बनी कलाकृतियों का समावेश किया गया था, के संग्रहण के लिये मध्यप्रदेश के कोने-कोने में रूपंकर की ओर से संग्राहक-दल भेजे गये थे। इन्हीं में से एक दल बस्तर को भी कृतार्थ करने आया था। इस दल के सदस्य थे आट्र्स कालेज ग्वालियर, भोपाल आदि में पढ़ने वाले अनिल कुमार, अभय जैन, ऊषा शर्मा और जया टेंभे। जया टेंभे इस दल का नेतृत्व कर रही थीं। जयदेव भाई के माध्यम से इस दल से हमारा परिचय हुआ। बस्तर की माटी के लिये कोई भी कार्य करने की अदम्य लालसा वाले यशवंत गौतम ने लगातार पन्द्रह दिनों तक इस दल के साथ काफी भीतरी इलाक़ों का दौरा किया और कई कलाकृतियाँ इन्हें दिलवाने में मदद की।
इसी दौरान यह दल अनतपुर पहुँचा। यहाँ एक शिक्षक बन्धु की सहायता से ये लोग स्थानीय कलाकार रामसिंह से मिले। रामसिंह देवगुड़ी के किवाड़ों, खम्भों आदि में आदिवासी देवी-देवताओं के सुन्दर चित्र उत्कीर्ण  करने में अपना सानी नहीं रखते। दल ने देवगुड़ी के किवाड़ों और खम्भों में उनके द्वारा उत्कीर्ण चित्र देख कर रूपंकर के लिये भी वैसा ही किवाड़ बना देने का आग्रह किया तथा अगले माह यानी नवम्बर 1981 में मोल चुका कर ले जाने की बात कही। उनके कहे अनुसार रामसिंह अपने काम में जुट गये और दो महीने के अथक परिश्रम के बाद एक शानदार कलात्मक किवाड़ तैयार कर दिया। किन्तु अफ़सोस! संस्कृति के उन प्रहरियों का आज तक कोई अता-पता नहीं है। चूँकि मध्यस्थ यशवंत गौतम और अनतपुर के शिक्षक श्री पंडोले थे, अत: उन्हें ही रामसिंह के तानों और गुहारों से दो-चार होना पड़ रहा है। बेचारे दोनों शिक्षक हैं। भला एक हजार रुपये की कलाकृति खरीद कर वे क्या करेंगे.......? सबसे बड़ी बात, रामसिंह के दो महीने की मजदूरी का क्या होगा.......? अब बताइए, इन स्थितियों में यदि कोई कहे कि हमारी संस्कृति, हमारी कला केवल और केवल अपने लिये है, तो क्या वे सही नहीं हैं?
इन पंक्तियों के माध्यम से रूपंकर के निदेशक जे. स्वामीनाथन से और संस्कृति विभाग के विशेष सचिव अशोक वाजपेयी से रामसिंह अपनी मजदूरी माँग रहा है। क्योंकि वह बेचारा क्या जाने, कला और कलाकार किस चिड़िया का नाम है। वह तो यह जानता है कि किवाड़ों पर चित्र उत्कीर्ण करना उसे न जाने कैसे आ गया। बस वह उत्कीर्ण किए जा रहा है। मेहनत किया है दो महीने तक। उसकी मजदूरी उसे चाहिये। अब उसे आप कलाकृति मान लें या कलाकार, आप जानें। वह तो अब उस अशुभ घड़ी को कोस रहा है, जब वह दल यहाँ आया था। खामखा दो महीने तक आँखें गड़ा-गड़ा कर उस किवाड़ के पीछे खपता रहा है। इतने दिनों और कुछ काम करता तो मेले का खर्चा भी निकल ही आता। पंडोले जी की स्थिति काफी खराब हो गयी है। आते-जाते वह उन्हें कोसता है और पंडोलेजी मुझे। क्योंकि पंडोलेजी के नाम उस दल को चिट्ठी मैंने ही दी थी, उनकी सहायता के लिये।
बड़ा महँगा पड़ता है भोपाल-दिल्ली वालों की मदद करना। यहाँ यह उल्लेख करना असंगत न होगा कि भाई जयदेव बघेल का इस मामले में चुप्पी साध लेना कम से कम आदिवासी और लोक कलाकारों के लिये हितकर नहीं है। जयदेव भाई बस्तर के भाग्य से मध्यप्रदेश आदिवासी एवं लोक कला परिषद् की कार्यकारिणी समिति के सदस्य होने के साथ ही साथ भारत के शीर्षस्थ कलाकारों में से हैं। इस नाते उनका कत्र्तव्य था कि वे इस मामले में हस्तक्षेप कर रामसिंह की कलाकृति को रूपंकर के हवाले कर उसे उसका मेहनताना दिलवाते। परन्तु अफ़सोस! अपने-आप को लोक कलाकारों का सबसे बड़ा हितैषी बताने वाला यह समर्थ कलाकार भी केवल इसलिये चुप्पी साध गया क्योंकि उक्त संग्राहक दल के एक सदस्य को कलाकृति की कीमत बारह सौ रुपये बहुत अधिक लग रही थी। भाई जयदेव मेरे मित्र हैं, घनिष्ठ मित्रों में से हैं; किन्तु क्या केवल इसी बात से मैं उनसे यह नहीं पूछ सकता कि क्या वे माटी के वो पुतले हैं जिन पर कोई भी आकर कोई सा भी रंग डाल देगा तो ये उस रंग को अपना लेंगे? कमोबेश शायद यही बात सच हो।
इन्हीं सब बातों को देखते हुए अब बस्तर के "बस्तर जिला आदिवासी-हरिजन नवयुवक संघ" ने आदिवासी कलाओं के सार्वजिक प्रदर्शन पर रोक लगा दी है। प्रदर्शन के लिये इस संघ से अनुमति लेना आवश्यक है। संघ यदि पाता है कि प्रदर्शन से किसी प्रकार का कोई आक्षेप आदिवासी-हरिजनों की संस्कृति पर नहीं आता, तभी वह अनुमति देगा। इस बात की जानकारी हमें शासकीय उपाधि महाविद्यालय, जगदलपुर में एम. ए. अन्तिम वर्ष की छात्रा सीमा सोरी ने दी। उन्होंने बड़े ही आक्रोश से कहा, ""माफ कीजिएगा, हमें ज्यादा खो कर कम पाना नहीं है। लोगों ने बस्तर की संस्कृति के प्रदर्शन को व्यापार बना लिया है। और इसे प्रश्रय दिया है हमारे अपने राजनेताओं ने अपने स्वार्थ के लिये। ये लोग जान-बूझ कर अनजान बने अपने व्यक्तिगत स्वार्थों में लिप्त हैं। वरना आज किसी में हिम्मत होती कि वह हमारी माँ-बहिनों के अद्र्धनग्न चित्र पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कर पाता? कोई यदि अपने समाज और संस्कृति की बात करता है, तो उस पर राजनीतिक दलों आदि का लेबल लगा कर उसे बदनाम कर दिया जाता है। उसके रास्ते बन्द कर दिए जाते हैं। जहाँ समाज-संस्कृति और अधिकारों की बात आती है, वहाँ व्यक्ति चाहे वह विद्यार्थी हो या राजनेता, कृषक अथवा मजदूर, स्त्री हो या पुरुष; समाज का सदस्य होने के नाते अपने समाज के संदर्भ में चिंतन उसका कत्र्तव्य है। और फिर संस्कृति तो प्रत्येक समाज की अमूल्य निधि है। उसे जीवित रखना और उसकी सुरक्षा करना प्रत्येक सदस्य का महत्त्वपूर्ण दायित्व है।"
नारायणपुर में एक लोक कलाकार रहा करते थे, बलदाऊ प्रसाद पात्र। फिल्म्स डिवीज़न वालों ने अपने एक वृत्त चित्र में उनसे नायक की भूमिका करवा कर महज दस-बारह रुपये दैनिक मजदूरी दी। जब उनसे तंग आकर श्री पात्र यहाँ-वहाँ छिप जाते तो उन्हें येन-केन-प्रकारेण खोज निकाला जाता और फिर वृत्त चित्र के निर्देशक को पुरस्कार दिलाने के लिये बेचारे पात्र को खटना पड़ता। जबकि जहाँ वे अस्थायी तौर पर काम कर रहे थे, वहाँ उन्हें आठ-दस रुपये दैनिक मजदूरी मिल जाती थी। इसी तरह हल्बी के वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामसिंह ठाकुर (नारायणपुर) ने अपनी व्यथा बतायी। हल्बी रामचरितमानस का पुस्तकाकार प्रकाशन मानस चतुश्शताब्दी समारोह समिति द्वारा तय कर लिया गया था। वे समारोह में भी आमन्त्रित थे। किन्तु आज नौ-दस बरस से ऊपर हो गये, प्रकाशन नहीं हो पाया है। आकाशवाणी से कुछ दिनों तक उसका सस्वर पाठ होता रहा। फिर पता नहीं कैसे वह भी रुक गया। आकाशवाणी को पाण्डुलिपि भेजने की पहल उन्होंने नहीं की थी। केन्द्र निदेशक स्वत: उनके पास गये थे और ससम्मान उन्होंने हल्बी मानस की पाण्डुलिपि उनसे माँगी थी। इस बात का आश्वासन पा लेने के बाद कि मानस को उचित सम्मान दिया जाएगा, उन्होंने आकाशवाणी को पाण्डुलिपि दे दी थी। और मजेदार बात यह कि उनके लिखे मानस और बनाए हल्बी व्याकरण की प्रतियाँ उन्हीं से दोस्ती गाँठ कर प्राप्त करने वाले एक सज्जन ने घर बैठे अपनी पत्नी को "हल्बी" में डॉक्टरेट दिलवा दी। बस्तर के सुप्रसिद्ध एवं वरिष्ठतम साहित्यकार श्री लाला जगदलपुरी के अभिनन्दन का प्रस्ताव था मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् में आज से कई साल पहले। बेचारे लालाजी तो जहाँ के तहाँ रह गये, बाजी मार ले गया कोई और। इनका भी कोई गुट होता या साहित्य की राजनीति के दाँव-पेंच इन्हें मालूम होते तो शायद अभिनन्दन हो जाता। किन्तु धन्य है बस्तर की माटी! जिसने अपने लाल को यह सब प्रपंच नहीं सिखाया। अभी हाल ही में पता लगा, उनके हल्बी पंचतन्त्र का प्रकाशन दूसरे प्रान्त के किसी सज्जन ने अपने शुभ नाम से कर लिया है। क्षेत्रीय बोलियों को लोक-भाषा का दर्जा दिये जाने के संदर्भ में भी हल्बी को ठगा गया है। बेचारी हल्बी, जो बस्तर सम्भाग की सम्पर्क भाषा है, जिसका लोक एवं लिखित साहित्य-भण्डार भरा-पूरा है; साहित्य की राजनीति की मार से आज तक लोक-भाषा का दर्जा हासिल नहीं कर सकी है। 

(नवभारत, 29 अक्टूबर 1982 अंक में प्रकाशित।)

टीप : बाद में हल्बी रामचरित मानस का प्रकाशन वर्ष 1991 में मानस चतुश्शताब्दी समारोह समिति, भोपाल द्वारा किया गया।

Saturday, 23 June 2012

संस्कार धानी कोंडागाँव



कोंडानार से अपना सफर शुरु करने वाला और आगे चल कर कोंडागाँव नाम से अभिहित बस्तर सम्भाग की संस्कार धानी के नाम से जाना जाने वाला यह कस्बा अब नगराता जा रहा है। यह कहा जाये कि शहरीकरण के इस दानवी दौर में अपने संस्कार खोती जा रही 26898 (वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार) की आबादी वाली इस संस्कार धानी की आत्मा चीत्कार कर रही है तो कदाचित् अनुचित नहीं होगा। तथाकथित आधुनिकता और विकास की राह पर चल पड़ी इस संवेदनशील नगरी से संवेदनशीलता गधे के सिर से सींग की तरह गायब होती जा रही है। दादा-भैया जैसे आत्मीय सम्बोधन के साथ लोगों से बातें करने वाले कोंडागाँव के जन अब नयी पीढ़ी को इस आत्मीय सम्बोधन को भूलते देख गहरे विषाद से भर उठे हैं। इसकी जगह अब "सर", "हैलो" और "हाय" ने ले ली है। कभी अकूत भूमि के स्वामी रहे वनवासी अपनी भूमि कौड़ियों के मोल बेच कर हाशिये पर चले गये हैं। दिनोंदिन बढ़ती आबादी और यातायात के दबाव के चलते बन्धा तालाब के पास स्थित शिव मन्दिर से ले कर श्रीराम मन्दिर तालाब (बड़े तरई) तक मुख्य मार्ग के दोनों ओर खड़े रसीले और मीठे आमों के कई पेड़ जो कभी इस कस्बे की शोभा रहे, आज सौंदर्यीकरण की भेंट चढ़ चुके हैं। इन पेड़ों के कट जाने की पीड़ा मुझे भीतर तक सालती है और आजीवन सालती रहेगी। कारण, अपनी किशोरावस्था में इन पेड़ों से टपकते मीठे-रसीले आम बीनने के लिये सुबह 4.00 बजे जाग जाना मुझे अभी भी याद है। सड़क पर आने की देर नहीं और प्रत्येक पेड़ के नीचे आम के ढेर दिखलायी दे जाते। इन आमों पर किसी का कोई अधिकार नहीं होता था। जिसने बीन लिये आम उसके। इस तरह का एक आपसी समझौता हुआ करता था। कोई वाद-विवाद नहीं। किन्तु आज न तो आम के वे पेड़ हैं, न उनकी शीतल और गहरी छाँव और न उस तरह की आपसी समझदारी और सौहाद्र्र का कोई संस्कार और वातावरण! इसमें दोष किसी का नहीं है। यान्त्रिकता और अतिभौतिकता की ओर निरंकुश और तेजी से बढ़ते हमारे अनियन्त्रित कदमों के चलते यह तो होना ही था। संवेदनशीलता की भरी गगरी को रीतना ही था। 
यह नगरी न केवल संस्कारधानी के रूप में ख्यात रही है अपितु इस नगर की जलवायु भी आरम्भ से ही बस्तर सम्भाग के अन्य नगरों की तुलना में बिल्कुल भिन्न और स्वास्थ्यवद्र्धक रही है। शुक्र है कि आज भी जंगलों के लगातार कटते जाने के बावजूद इस नगर के तापमान में अन्य जगहों की अपेक्षा नरमाहट का अहसास होता है। 
इस गाँव के नामकरण और इतिहास को ले कर गोंडी और हल्बी भाषियों के बीच मतान्तर है। 
गोंडी भाषी श्री रमेश चन्द्र दुग्गा के अनुसार इस गाँव का नाम गोंडी जनभाषा के शब्द "कोंडा" और "नार" से मिल कर बना था। "कोंडा" अर्थात् आँख और "नार" यानी गाँव। उनका कहना है कि अन्य स्थानों की तरह "कोंडानार" का नाम भी समय के साथ "कोंडागाँव" हो गया। बस्तर के कई गाँवों के नाम मूल गोंडी और हल्बी से अब परिवर्तित हो गये हैं। उदाहरण के लिये नगुर से नारायणपुर, जगतूगुड़ा से जगदलपुर, पाड़ेक् से पालकी, कड़ावेडा से केरलापाल और सँदोड़ार से संधारा आदि। किन्तु हल्बी भाषी स्व. चमरु सिरहा (सरगीपाल पारा, कोंडागाँव) के अनुसार धान की महीन भूसी जिसे कोंडा कहा जाता है, के आधार पर इस गाँव का नाम कोंडागाँव हुआ था। वे एक किम्वदन्ती का हवाला देते हुए बताते थे कि गाँडा जाति (सरगीपाल पारा की रहवासी और छेरकिन डोकरी के नाम से जानी जाने वाली स्व. घिनई कोराम पति सकरु कोराम तथा इसी मोहल्ले के स्व. मँगतू कोराम के अनुसार गोंड जाति) की कोई एक बुढ़िया थी, जो प्राय: दूसरों के लिये धान कूटने का काम करती थी। धान कूटने के इस काम को काँडा ले जाना कहा जाता है। काँडा का नियम होता है 20 पायली धान कूट कर 9 पायली चावल वापस करना और शेष चावल तथा कोंडा (भूसी) मेहनताना के रूप में स्वयं रख लेना। किन्तु वह बुढ़िया इस नियम के विपरीत सारा चावल चाहे वह 10 पायली हो या 11, वापस कर दिया करती और केवल भूसी अपने लिये रख लेती। वही उसका मेहनताना होता। दुनिया की नजरों में उसके इसी ऊटपटाँग किन्तु उस बुढ़िया के हिसाब से युक्तियुक्त नियम के कारण उस बुढ़िया का नाम कोंडा डोकरी और बसाहट का नाम कोंडागाँव प्रचलित हो गया। बाद में (सुकालू राम, ग्राम कोटवार एवं गोपाल पटेल, ग्राम पटेल के अनुसार) बस्तर रियासत के तत्कालीन दीवान मिस्टर मिचेल के सुझाव पर इसका नामकरण कोंडानार से कोंडागाँव किया गया। 
दूसरी किम्वदंती (दुर्योधन मरकाम) के अनुसार नारंगी नदी में बोद मछली जिसे गोंडी में "कोण्डा मीन" कहा जाता है, बहुतायत से मिला करती थी। गोंडी में कोण्डा का अर्थ आँख और मीन का अर्थ मछली है। बोद मछली कानी होती है इसीलिये इसे हल्बी परिवेश में "कानी मछरी" भी कहा जाता है। कहा जाता है कि इस "कोण्डा मीन" की बहुतायत से उपलब्धता ही इस बसाहट के नामकरण का आधार बना और यह बस्ती "कोण्डानार" प्रचलित हो गयी। उल्लेखनीय है कि नार का अर्थ गोंडी में गाँव होता है। बोद मछली का सम्बन्ध (रमेश चन्द्र दुग्गा एवं दुर्योधन मरकाम के अनुसार) गोंड जनजाति की धार्मिक आस्था एवं विश्वास से जुड़ता है। 
       तीसरी किम्वदंती (मनोज कुर्रे) के अनुसार कोई मरार (पनारा) परिवार बाहर से चल कर इधर आ रहा था तब उसकी गाड़ी के पहिये वर्तमान हिंगलाजिन मन्दिर के आसपास कान्दा (कन्द) की नार (बेल) से लिपट कर बाधित हो गये और गाड़ी वहाँ से आगे नहीं बढ़ सकी। तब वह परिवार विवशता में वहीं ठहर गया। रात में परिवार के मुखिया को स्वप्न में बड़ी-बड़ी आँख वाली किसी देवी ने दर्शन दिये और उससे उसी जगह पर अपना ठिकाना बनाने को कहा। वह व्यक्ति सुबह उठा और आसपास के लोगों से उस स्वप्न की बात कही और उस देवी के विषय में बताया। तब उसे बताया गया कि उस देवी का नाम हिंगलाजिन है और उनकी बड़ी-बड़ी आँखों के कारण उन्हें "कोण्डा देवी" भी कहा जाता है। इस तरह "कोण्डा" शब्द से इस बस्ती का नाम कोण्डानार हुआ। यानी कोण्डा देवी का गाँव, कोण्डानार जो आगे चल कर कोण्डागाँव कहा जाने लगा।
        कोंडागाँव के एक पुराने निवासी श्री महादेव यादव स्व. चमरु सिरहा, स्व. छेरकिन डोकरी और स्व. मँगतू राम कोराम द्वारा बतायी गयी किम्वदन्ती से अनभिज्ञ हैं किन्तु इसकी सत्यता पर प्रश्न चिन्ह भी नहीं लगाते। वे कोंडागाँव में जंगली जानवरों के आतंक के विषय में बताते हैं कि आज से लगभग 60-65 वर्ष पूर्व जब वे किशोर थे, उस समय शेर और जंगली सुअर कोंडागाँव बस्ती से होते हुए पूर्व दिशा की पहाड़ियों की ओर जाया-आया करते थे। तहसीलपारा में स्थित उनके घर के पीछे पेटफोड़ी (चीर घर) हुआ करता था। इसी चीर-घर के आसपास जंगली जानवर मँडराया करते थे। बड़ा खौफ था उन दिनों। 
मेरे पिता शासकीय सेवा में थे और जगदलपुर से स्थानान्तरण पर 1968 के मई-जून महीने में हम कोंडागाँव आये थे। उस समय यह दरअसल एक गाँव ही था। आबादी थी यही कोई 7 से 10 हजार के बीच। जगदलपुर-रायपुर राष्ट्रीय राजमार्ग के दोनों ओर लम्बवत् बसाहट थी। गाँव के पूर्व दिशा में मुख्य मार्ग से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर दण्डकारण्य परियोजना का कार्यालय, कर्मचारियों के निवास और एक चिकित्सालय। तब इस रविन्द्रनाथ टैगोर (आरएनटी) चिकित्सालय का नाम, जिसे स्थानीय लोग डीएनके अस्पताल के नाम से जानते हैं, बहुत प्रसिद्ध हुआ करता था। चिकित्सा और चिकित्सा-सुविधाओं के लिहाज से लोग जिला मुख्यालय जगदलपुर के महारानी अस्पताल की बजाय इस अस्पताल को ज्यादा तवज्जो दिया करते थे। किन्तु इस अंचल में दण्डकारण्य परियोजना की समाप्ति के साथ ही स्थानीय जनता के पुरजोर विरोध के बावजूद राजनैतिक उदासीनता के चलते इस चिकित्सालय पर से केन्द्र शासन का नियन्त्रण समाप्त हो गया। इसके साथ ही इस अस्पताल की दुर्दशा के दिन आरम्भ हो गये। इस चिकित्सालय में पदस्थ चिकित्सक डॉ. डी. भन्ज कुशल चिकित्सकों में से थे, जो अब कोंडागाँव के ही हो कर रह गये हैं। मुख्य मार्ग पर ही बस स्टैण्ड था। आज भी उसी जगह पर है किन्तु तब उसके पूर्व दिशा में बसाहट नहीं थी। उधर झाड़ियाँ हुआ करती थीं और सूर्यास्त के साथ ही उस ओर से जाने में लोगो को पसीने छूट जाया करते थे। आज यह इलाका आबाद है और विकास नगर का नाम पा चुका है। सरगीपाल पारा में जब हमने 1970 में मकान बनाया उस समय हमारा मकान अन्तिम सिरे पर था। हमारे घर से लगभग 30 मीटर की दूरी से ही साल का छोटा-सा जंगल लगा हुआ था और इधर भी सूर्यास्त के बाद जाने की हिम्मत नहीं होती थी। कभी यहाँ साल का बड़ा-सा जंगल रहा होगा तभी इस जगह का नाम सरगीपाल हुआ। साल का स्थानीय नाम सरगी (अथवा सरई) है। 
       कोंडागाँव को संस्कार धानी कुछ यो ही नहीं कहा जाता। यह अलग बात है कि आज के बदलते परिवेश में दुर्भाग्यवश यह नाम अपनी सार्थकता खोता चला जा रहा है। बहरहाल, बाँसुरी वादन के लिये स्व. श्यामलाल रवानी, रामचरित मानस, मातासेवा और फाग गायन के लिये स्व. पूरन महाराज (पूरन शर्मा), स्व. रतनसिंह देवांगन और स्व. श्यामदास वैष्णव चर्चित रहे हैं। इसी तरह कस्बे को भागवतमय बनाने के लिये भागवत कथा के आयोजनों में स्व. अयोध्या प्रसाद पाणिग्राही एवं उनका परिवार, श्री जागेश्वर प्रसाद गुप्ता, श्री जगरुप गुप्ता, श्री हरिहर सिंह गौतम और श्री (अब स्व.) मोहन गोलछा की सक्रिय भागीदारी भी उल्लेखनीय रही है। योग को लोकप्रिय बनाने की दिशा में अहर्निश प्रयास कर रहे श्री बीरेन्द्र धर, श्री योगेन्द्र देवांगन, श्रीमती मधुलिका देवांगन, श्री लखनलाल पटेल और उनके साथियों का परिश्रम फल-फूल रहा है। प्रति वर्ष वर्षा ऋतु में जगदलपुर-रायपुर मार्ग पर भँवरदीग (जुगानी) और मार्कण्डेय नदी (काकड़ीघाट) तथा कोंडागाँव-नारायणपुर मार्ग पर भँवरदीग नदी (किबई कोकोड़ी) और छेरीबेड़ा नदी में आयी बाढ़ में फँसे सैकड़ों यात्रियों की नि:स्वार्थ सेवा के लिये कोंडागाँव भली प्रकार जाना जाता रहा है। चाहे वह व्यवसायी हो, अधिकारी या कर्मचारी अथवा राजनीतिक-गैर राजनीतिक या फिर युवा या बच्चे और बूढ़े; सभी बाढ़ में फँसे यात्रियों की तन-मन-धन से सेवा में यथाशक्ति लगे रहे हैं। 
       नवयुवक सामाजिक एवं सांस्कृतिक समिति इस कस्बे की बहुत ही सक्रिय संस्था रही थी। श्री टी. एस. ठाकुर के कुशल मार्गदर्शन में इस संस्था ने वर्षों तक सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के कई कीर्तिमान स्थापित किये। इस संस्था ने कुछ समय तक एक महाविद्यालय का भी संचालन किया था। फिर जैसा कि सृजनधर्मी संस्थाओं के साथ प्राय: होता है, इस संस्था के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ और कुछ वर्षों बाद बिखर गया यह संगठन। किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि सांस्कृतिक गतिविधियों पर विराम लग गया हो।  कुछ ही वर्षों बाद सांस्कृतिक क्षेत्र में नवोन्मेष के साथ फिर से हलचल हुई और एकाएक सांस्कृतिक संस्थाओं की बाढ़-सी आ गयी। "अभिव्यंजना सांस्कृतिक समिति", "गीतांजलि सांस्कृतिक समिति", "जगार सांस्कृतिक समिति" और "बनफूल सांस्कृतिक समिति" का गठन लगभग एक ही समय में हुआ। इनमें से "जगार" और "बनफूल" संस्थाओं ने कोंडागाँव के अतिरिक्त दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्र में भी लोक संस्कृति से ओतप्रोत कार्यक्रम प्रस्तुत किये। लोक भाषा हल्बी में प्रस्तुत इन संस्थाओं के कार्यक्रम बहुत लोकप्रिय हुए थे। विशेषत: मध्यप्रदेश तुलसी अकादमी के आयोजन "जनरंजन" में "जगार सांस्कृतिक समिति" द्वारा प्रस्तुत हल्बी रामायण (सीता हरण प्रसंग) ने ऐसी धूम मचायी थी कि अनेक गाँवों से इसकी प्रस्तुतियों के लिये इस संस्था को आमन्त्रण प्राप्त होते रहे। किन्तु कुछ ही वर्षों बाद ये संस्थाएँ भी केवल नाम को रह गयीं और गतिविधियों पर विराम लग गया। कारण, इन संस्थाओं से जुड़े अधिकांश कलाकार शासकीय सेवक थे और कुछ वर्ष यहाँ रह कर इधर-उधर स्थानान्तरित हो गये। "अभिव्यंजना" और "गीतांजलि" का कार्यकाल सम्भवत: एक या दो वर्षों का ही रहा होगा। इसके काफी समय बाद दो नयी संस्थाओं "वन्दना आर्ट्स" और "नवरंग सांस्कृतिक समिति" का अभ्युदय हुआ जिन्होंने कुछ वर्षों तक सांस्कृतिक गतिविधियों में जान फूँकी। ये दोनों ही संस्थाएँ मुख्यत: रंगमंच से जुड़ी रहीं और बस्तर के बाहर देश के विभिन्न नगरों में भी इनकी नाट्य प्रस्तुतियों ने लोगों का ध्यान बस्तर के रंगमंच की ओर खींचा। किन्तु बुद्धू बक्सा के आने के साथ ही सांस्कृतिक गतिविधियों का टोटा पड़ गया। एक लम्बा समय रिक्तता का था। इस रिक्तता की पूर्ति कुछ वर्षों बाद "गीतांजलि आर्केस्ट्रा", "संस्कृति ग्रुप ऑफ आर्ट्स" और "भारत क्लब जूनियर" ने की है। इनमें से "संस्कृति ग्रुप ऑफ आर्ट्स" सम्भवत: निष्क्रिय हो गयी है जबकि "गीतांजलि" और "भारत क्लब जूनियर" अभी भी सक्रिय हैं। 
        भारत क्लब अधिकारियों के मनोरंजन के लिये स्थापित एक संस्था रही है। इस क्लब के सौजन्य से नगर में सांस्कृतिक गतिविधियाँ भी संचालित होती रही हैं। इन दिनों क्लब का अस्तित्व तो नहीं रहा किन्तु इसके भवन तथा नाम का उपयोग नगर के सृजनधर्मियों द्वारा रचनात्मक गतिविधियों के संचालन के लिये किया जा रहा है। इस क्लब में वर्षों पहले एक पुस्तकालय भी हुआ करता था जिसमें महत्वपूर्ण पुस्तकें हुआ करती थीं किन्तु आज वहाँ एक भी पुस्तक नहीं है। जानने वाले बताते हैं कि सारी पुस्तकें इस क्लब से जुड़े कुछ लोगों की व्यक्तिगत सम्पत्ति बन कर रह गयी हैं। संस्कार धानी कहलाने का गौरव हासिल होने के बावजूद इस नगर में आज तक एक पुस्तकालय अथवा वाचनालय तक संचालित नहीं है; यह कमी दिल में काँटे की तरह चुभती रही है। 
        प्रगतिशील लेखक संघ और जनवादी लेखक संघ की इकाइयाँ यहाँ कुछ समय के लिये सक्रिय रहीं फिर इनमें भी बिखराव आ गया। लम्बे समय तक सक्रिय रहने वाली एकमात्र संस्था थी "प्रज्ञा साहित्य समिति"। किन्तु इसका भी वही हश्र हुआ। फिर कुछेक संस्थाएँ जन्मीं, कुछ दिनों तक पलीं और फिर मृत्यु को प्राप्त हो गयीं। पिछले दिनों श्री चितरंजन रावल के संयोजन में छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य परिषद् की इकाई का गठन हुआ है जिसने फरवरी में एक उल्लेखनीय कार्यक्रम यहाँ आयोजित किया था। इसकी भी बैठकें कुछ दिनों तक नियमित रहीं किन्तु अब यह भी उसी ढर्रे पर चल पड़ी है। कारण है, रचनाकारों और साहित्यप्रेमियों का रुचि न लेना। प्रगतिशील लेखक संघ के गठन के साथ ही यहाँ इप्टा की भी गतिविधियाँ कुछ दिनों तक जारी रहीं और बाद में ठप पड़ गयीं। इप्टा की गतिविधियाँ श्री मनीष श्रीवास्तव और शिशिर श्रीवास्तव तथा उनके साथी संचालित किया करते थे। 
       बस्तर की लोक कलाओं के संरक्षण, विकास और विस्तार तथा लोक कलाकारों के हितों के लिये कार्य करने के उद्देश्यों के साथ जन्मी संस्था "पारम्परिक बस्तर शिल्पी परिवार" कई वर्षों तक सक्रिय रही और इसने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य भी किये। किन्तु आज यह संस्था भी मृतप्राय है। समाज-सेवा के क्षेत्र में "साथी समाज सेवी संस्था" ने उल्लेखनीय कार्य किये और इसकी गतिविधियाँ आज भी निरन्तर चल रही हैं। अन्य संस्थाओं में "विकास मित्र" तथा "धरोहर" के नाम लिये जा सकते हैं। 
     कला-साधकों की बात करें तो सुगम संगीत के क्षेत्र में सर्वश्री सूर्यम, मन्जीत सिंह, दीनदयाल भट्ट, जयलाल देवांगन, स्व. विश्वेश्वर लाल रवानी, स्व. जान वेलेजली मिलाप, चन्द्रकान्त "साहिल", जगदीश चन्द्र कलियारी, जयलाल देवांगन, सुश्री अंजना मिलाप, स्व. प्रदीप मिलाप, सर्वश्री डी. ढाली, खीरेन्द्र यादव, सुश्री नन्दा शील और शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में श्री आर. बी. दीक्षित और श्री गोस्वामी तथा स्व. ठाकुर नूतन सिंह राठौर के नाम उल्लेखनीय रहे हैं। बाँसुरी, तबला, नाल और ढोलक वादन के क्षेत्र में श्री खेम वैष्णव तथा तबला वादन के क्षेत्र में श्री प्रणव चटर्जी और श्री सुबोध के नाम आज भी लोगों की जुबान पर हैं। श्री टंकेश्वर पाणिग्राही लोकगीत गाने के अपने विशिष्ट अंदाज के लिये जाने जाते रहे हैं। नवोदित कलाकारों में सर्वश्री सहदेव साहा, तरुण पाणिग्राही, भूपेश पाणिग्राही, जयेश, अमित दास, सिद्धार्थ वैष्णव, नवनीत, प्रद्युम्न, चोखेन्द्र डाबी, रिक्की और सुश्री डॉली घुड़ैसी आदि के नाम लिये जा सकते हैं। लोक गायकों में गुरुमाय सुकदई कोराम एक ऐसा नाम है जिनके गाये बस्तर की धान्य देवी की कथा "लछमी जगार" का पुस्तकाकार प्रकाशन न केवल आस्ट्रेलियन नेशनल युनीवर्सिटी के सहयोग से हुआ अपितु जिसकी चर्चा राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी हुई है। लोककलाओं के क्षेत्र में इस नगर के सर्वश्री जयदेव बघेल (घड़वा शिल्पी), खेम वैष्णव (लोक चित्रकार), पंचूराम सागर, राजेन्द्र बघेल, भूपेन्द्र बघेल (तीनों घड़वा शिल्पी) आदि ने अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित की है। कला के क्षेत्र में श्री सुशील सखूजा का नाम गिनीज बुक आफ वल्र्ड रिकार्ड में दर्ज होना भी कोंडागाँव की एक बड़ी उपलब्धि कही जायेगी। देश के पाँच राज्यों की लोक कथाओं को हल्बी में एनीमेशन फिल्म के जरिये स्कॉटलैंड की संस्था "वेस्ट हाईलैंड एनीमेशन" के साथ मिल कर अन्तर्राष्ट्रीय दर्शकों तक पहुँचाने में भी कोंडागाँव के कलाकारों का योगदान उल्लेखनीय है। 
       साहित्य के क्षेत्र में कोंडागाँव को अग्रिम पंक्ति में लाने का श्रेय यदि किसी को जाता है तो वे हैं सुपरिचित कवि और व्यंग्यकार श्री सुरेन्द्र रावल। उन दिनों जब मैं रचना-कर्म से जुड़ा तब यहाँ स्व. पी.एल.कनवर, स्व. ओ.पी.शर्मा, श्री सुरेन्द्र रावल और जनाब उमर हयात रज़वी वरिष्ठ कवि और शायर हुआ करते थे। प्राय: प्रत्येक 8-10 दिनों में एक गोष्ठी अवश्य ही हुआ करती थी। गोष्ठी न हो तो पेट में दर्द होने लगता था। इसके ठीक विपरीत गोष्ठी के नाम पर आज पेट में दर्द उठने लगता है। बहरहाल, वरिष्ठ रचनाकारों के आग्रह पर मैं भी अपनी अनगढ़ कविताएँ बड़े ही संकोच के साथ सुना दिया करता था जिन पर वरिष्ठ रचनाकारों की स्वस्थ टिप्पणियाँ प्राप्त होती थीं। गोष्ठियों में स्थायी सुधी श्रोता हुआ करते थे सर्वश्री टी. एस. ठाकुर, हेमसिंह राठौर और स्व. हादी भाई रिज़वी। ये तीनों ही साहित्य-पिपासु, साहित्य-मर्मज्ञ और विद्वान थे और भाषा पर भी इनका गजब का अधिकार था। रचनाकार इन सुधी श्रोताओं से मार्गदर्शन प्राप्त करते रहे हैं। कहते हैं कि खरबूजे को देख कर खरबूजा रंग बदलता है। सो इसी कहावत को चरितार्थ करते हुए इनमें से श्री हेमचन्द्र सिंह सिंह राठौर आगे चल कर स्वयं भी कवि हो गये। श्री टी.एस.ठाकुर आज भी गोष्ठियों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। स्व. हादी भाई रिज़वी की कमी सभी को खलती है। बहरहाल, आगे चल कर सुप्रसिद्ध कथाकार और कवि श्री मनीषराय और बस्तर की जनभाषा हल्बी के वरेण्य कवि श्री सोनसिंह पुजारी के इस नगर में आगमन ने यहाँ की साहित्यिक गतिविधियों की सक्रियता में और भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। श्री पुजारीजी के सान्निध्य में यहाँ के कई रचनाकारों ने लोकभाषा में सृजन आरम्भ किया। यों तो मैं पहले से ही हल्बी जनभाषा में सृजन कर रहा था किन्तु श्री पुजारीजी के सान्निध्य ने मुझे इस ओर गम्भीरता पूर्वक काम करने की प्रेरणा दी। इसके लिये मैं श्री पुजारीजी का हृदय से आभारी हूँ। 1982 में मनीषरायजी के प्रयासों और श्री सोनसिंह पुजारी तथा श्री के. सी. दास के सहयोग से यहाँ "सर्जना 82" नामक एक विराट् सम्मेलन सम्पन्न हुआ जिसमें अखिल भारतीय ख्याति के सुप्रसिद्ध कथाकारों सर्वश्री हरिनारायण ("कथादेश" के सम्पादक), बलराम ("सारिका" के उप सम्पादक), संजीव, अब्दुल बिस्मिल्लाह, पुन्नीसिंह, धीरेन्द्र अस्थाना, रऊफ परवेज़, किरीट दोशी, लक्ष्मीनारायण पयोधि आदि ने भी शिरकत की। कोंडागाँव के साथ-साथ सम्पूर्ण बस्तर अंचल के साहित्य-प्रेमियों के लिये यह एक ऐतिहासिक और अविस्मरणीय आयोजन सिद्ध हुआ। इसी आयोजन में बस्तर पर केन्द्रित महत्वपूर्ण ग्रन्थ "इन्द्रावती" का विमोचन भी हुआ। इस ग्रन्थ के सम्पादक थे स्व. मनीषराय और श्री बलराम। सृजन-यात्रा अविराम चलती रही किन्तु बीच-बीच में कुछ व्यवधान भी उपस्थित हो जाया करते। फिर कुछ दिनों के लिये शून्य की स्थिति निर्मित हो गयी। तभी समकालीन कविता के सुपरिचित हस्ताक्षर श्री संजीव बख्शी जगदलपुर से स्थानान्तरित हो कर कोंडागाँव आये और उनकी पहल पर गोष्ठियों का दौर फिर से चल पड़ा। प्रमुख रचनाकारों में सर्वश्री यशवन्त गौतम, मनोहर सिंह "जख्मी", चन्द्रकान्त "साहिल", अब्दुल करीम, आर.सी.मेरिया, चितरंजन रावल, राजेन्द्र राठौर, ब्रजकिशोर राठौर, महेश पाण्डे, योगेन्द्र देवांगन, रमेश अधीर, जगदीश दास, केशव पटेल, पी.के.राघव, बी.बी.वर्मा, उमेश मण्डावी और स्व. सी.एल.मार्कण्डेय आदि उल्लेखनीय रहे हैं। नवोदित कवियों में सर्वश्री हरेन्द्र यादव और सुश्री बरखा भाटिया के नाम लिये जा सकते हैं। इन दिनों देश ही नहीं अपितु विदेश में भी अपने हर्बल उत्पादों के लिये अपनी विशिष्ट पहचान बना चुके श्री राजाराम त्रिपाठी की संस्था दंतेश्वरी हर्बल एस्टेट यहाँ की साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र बनी हुई है। 
        इस नगरी से "प्रस्तुति", "घुमर" और "ककसाड़" नामक स्तरीय लघु पत्रिकाओं का प्रकाशन भी होता रहा है। किन्तु जैसा कि लघु पत्रिकाओं की नियति होती है, ये पत्रिकाएँ भी अपने शैशव-काल में ही काल-कवलित हो गयीं। "बस्तर सम्भाग हल्बी साहित्य परिघद्" और "ककसाड़ प्रकाशन" को यहाँ से बस्तर के लोक साहित्य सम्बन्धी महत्वपूर्ण ग्रन्थों (बस्तर की मौखिक कथाएँ, लछमी जगार, बस्तर का लोक साहित्य, बस्तर की गीति कथाएँ, धनकुल) और बस्तर सम्बन्धी बाल साहित्य (चलो चलें बस्तर तथा बस्तर के तीज त्यौहार) के प्रकाशन का श्रेय जाता है। श्री चितरंजन रावल का काव्य संग्रह "कुचला हुआ सूरज" और श्री सुरेन्द्र रावल का काव्य संग्रह "काव्य-यात्रा" तथा श्री योगेन्द्र देवांगन के दो व्यंग्य संग्रह "जिसकी लाठी उसकी भैंस" और "बात की बात" एवं एक काव्य संग्रह "दौरों का दौरा" भी प्रकाशित हो चुके हैं। 




Sunday, 3 June 2012

जहाँ पेड़ से भी होती है मित्रता

छत्तीसगढ़, बस्तर अंचल और ओड़िसा में "मीत" यानी मित्र बनाने की सुदीर्घ परम्परा रही है। माहापरसाद (महाप्रसाद), सखी, फूल, तुलसीजल (तुलसीदल), भोजली, गंगाजल, गंगाबारु, बालीफुल, कोदोमाली, जँवारा,गजामुँग आदि विशेषणों से सुशोभित मित्र सम्भवत: इन्हीं अंचलों में बनाये जाते हैं। एक बार जब इन विशेषणों से युक्त मित्र बना लिये गये तो फिर यह मित्रता आजीवन बनी रहती है। कहीं कोई दुराव नहीं, कोई छल नहीं, कोई कपट नहीं। मनसा-वाचा-कर्मणा एक से। मित्रता की ऐसी मिसाल आप कहीं और तो पा ही नहीं सकते। एक बार मित्रता हुई और हुआ जीवन भर का साथ। साथ भी कैसा?  बड़ा ही पवित्र! जीना-मरना साथ-साथ। चाहे वह सुख हो या कि दु:ख! साथ देंगे बराबर। पीढ़ी-दर-पीढ़ी मित्रता का मान रखना सम्भवत: इन्हीं अंचलों के लोग जानते हैं। जाति, धर्म, सम्प्रदाय.....कोई रोक-टोक नहीं। उल्लेखनीय है कि प्राय: उच्च एवं कुलीन वर्ग के लोग निम्न और अछूतों से करते हैं मित्रता। इस मित्रता में जाति-धर्म-सम्प्रदाय.......कुछ भी तो आड़े नहीं आता। है न यह बहुत बड़ी बात! मनुवादी संस्कृति के बीच क्या आप पा सकते हैं ऐसा कोई उदाहरण कहीं और......? बस्तर में निम्न और अछूतों से मित्रता की परिपाटी का उद्भव यहाँ प्रचलित और बहुश्रुत लोक महाकाव्य "लछमी जगार" से हुआ माना जाता है। प्रसंग कुछ इस तरह है :
नरायन (नारायण) राजा की इक्कीस रानियों से प्रताड़ित और अन्तत: अपने पति स्वयं नरायन राजा से भी प्रताड़ित नरायन राजा की नयी-नवेली बाईसवीं पत्नी लछमी (लक्ष्मी) जब नरायन राजा का घर छोड़ कर अन्यत्र चली जाती हैं तब नरायन राजा और उनकी इक्कीस रानियाँ निर्धनता झेलने लगती हैं। वे भूख से व्याकुल हो जाती हैं। स्वयं नरायन राजा भी भूखे-प्यासे निढाल हो जाते हैं। तब वे लछमी की खोज में यहाँ-वहाँ भटकने लगते हैं। तभी उन्हें आत्म-ज्ञान होता है कि जब तक वे किसी निम्न वर्ग के व्यक्ति के साथ मित्रता स्थापित कर लछमी की खोज नहीं करेंगे, तब तक उन्हें लछमी की प्राप्ति नहीं होगी। वे तत्क्षण एक अछूत व्यक्ति से मित्रता कर लेते हैं और उस व्यक्ति के साथ लछमी की खोज में निकल पड़ते हैं। दैवयोग से उन्हें लछमी का पता मिल जाता है और वे अपने उसी मित्र द्वारा सुझाये गये उपाय से ही लछमी को पुन: प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं।
बहरहाल, यह तो बात हुई मानव मित्रों की। बस्तर में वनवासी वृक्षों से भी ऐसी ही अभिन्न मित्रता स्थापित करते दिखलायी पड़ते हैं। मित्रता के लिये चुने जाने वाले वृक्षों में ऐसा ही एक पेड़ है कुल्लू। छत्तीसगढ़ी परिवेश में यह कराट के नाम से जाना जाता है और इसका वानस्पतिक नाम है  स्टरकुलिया यूरेन्स। नीचे से ऊपर तक झक् सफेद और एकदम चिकना-लम्बा यह पेड़ प्राय: चट्टानी इलाकों में पाया जाता है। इस पेड़ से निकलने वाला गोंद जिसे हल्बी जनभाषा में "लसा" कहा जाता है, सबसे महँगा एवं प्रथम श्रेणी का होता है और स्वास्थ्य के लिये परम हितकारी। दन्तरक्षक औषधियों एवं सामग्री में इसका उपयोग प्रमुखत: होता है। इतना ही नहीं, बस्तर के वनवासी विभिन्न पूजा आदि में इस गोंद की लाई बना कर प्रसाद रूप में खाते-खिलाते हैं। प्रसूति के बाद प्रसूता महिलाओं को यह गोंद औषधि के रूप में अनिवार्यत: खिलाया जाता है ताकि शीघ्र ही उनका स्वास्थ्य-वर्धन हो सके।
बस्तर के वनवासियों के बीच मान्यता है कि इस वृक्ष से मीत या सखी बदने पर पैरों में बिवाई नहीं होती। एड़ियाँ इसी वृक्ष की तरह स्वच्छ, सुघड़ और चिकनी होती हैं। इसी मान्यता के तहत यहाँ के वनवासी इस वृक्ष से विधि-विधान पूर्वक मित्रता करते हैं। उसे नारियल, फूल, चावल, धूप, कपड़ा आदि भेंट करते हैं तथा उधर से आते-जाते उसे "सीताराम मीत" कह कर नमस्कार करते हैं। इतना ही नहीं, किसी उत्सव विशेष या तीज-त्योहार में भी अपने इस मीत से नियम पूर्वक भेंट करने जाते हैं और नारियल, फूल, चावल, कपड़े आदि उपहार स्वरूप अर्पित करते हैं।



Sunday, 27 May 2012

नन्हें कन्धों पर जीवन का बोझ


आज नवभारत, 26 जुलाई 1984 अंक में प्रकाशित यह रपट : 


आज जब सारे के सारे जंगल काट लिये जा रहे हैं, न केवल बड़े शहरों में बल्कि सुदूर गाँवों में भी ईंधन के लिये लकड़ी की भारी कमी से लोगों को दो-चार होना पड़ रहा है। हालांकि शहरी इलाक़ों में टाल, फ्युल डिपो और निस्तार डिपो आदि की व्यवस्था की गयी है, किन्तु फिर भी यह समस्या मुँह बाए खड़ी है। जंगल के कानून कठोर से कठोरतम हो गये हैं। स्वयं जंगल विभाग के लोगों को भी जलाऊ के लिये काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं यह भी सत्य है कि इस इलाके से आन्ध्रप्रदेश के लिये रोजाना काफी कीमतों पर जलाऊ के ट्रक जा रहे हैं। जिनके पास साधन हैं, उन्हें तो खैर इसकी कोई विशेष चिन्ता नहीं है, किन्तु जो लोग अल्प आय वाले हैं, उन्हें पाँच रुपये (कांकेर में तो दस रुपये) काँवड़ में जलाऊ खरीदना काफी महँगा पड़ रहा है। जलाऊ की किल्लत को देखते हुए लोगों ने प्रेशर कुकर या गोबर गैस संयत्र आदि का प्रयोग करना शुरु कर दिया है। किन्तु यह सुविधा भी हर आदमी नहीं मोल ले पाता और अब उसकी परेशानी निरन्तर बढ़ती जा रही है।
उपभोक्ता की परेशानी तो अपनी जगह है ही, किन्तु उनसे भी अधिक कष्ट है तो लकड़हारों को। विशेषत: उन मासूम लकड़हारों के लिये यह एक जानलेवा समस्या बन गयी है जो कम उम्र के हैं और अभी जिनके खेलने-खाने के दिन हैं। बाहर की बात मैं नहीं जानता, किन्तु यहाँ, बस्तर में, आप देखेंगे आठ-नौ वर्ष की उम्र के बच्चों से ले कर पचास-साठ वर्ष के बूढ़े तक इस व्यवसाय से गहरे जुड़े हैं। यही इनकी आजीविका का प्रमुख साधन है। आदिवासी, जो जंगलों में रहते हैं, अपनी आजीविका के लिये या तो वनोपज संग्रहण करते हैं या फिर जलाऊ बेचने का काम। बहुत से लोगों को यह काम विरासत में ही मिल जाता है। वनोपज-संग्रहण में इनका जितना शोषण हमने किया है, वह इतना स्याह है कि चाह कर भी वे हमें कभी माफ नहीं कर सकते।
बस्तर के कुल आदिवासी-हरिजनों में से लगभग बीस फीसदी लोग जलाऊ इकट्ठा करने से बेचने के काम में लगे हैं। इसमें भी 8 से 15 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों की तथा 45 से 50 वर्ष के लोगों की संख्या ज्यादा है। युवक या तो हमाली या अन्य निर्माण-कार्यों में लगे हुए हैं तथा अधिसंख्य युवतियाँ अन्य विभागीय निर्माण-कार्यों, जैसे लोग निर्माण विभाग, वन विभाग या सिंचाई विभाग के अन्तर्गत कार्य करती हैं। प्रौढ़ एवं वृद्धाएँ सालबीज, महुआ, टोरा आदि वनोपज के संग्रहण में लगी हैं। खेती के काम में भी ये लोग दखल रखते हैं, किन्तु अधिकांश लोगों के पास उनकी खुद की खेती नहीं है। वे दूसरों (अमूमन गैर आदिवासियों) के खेतों में मजूरी करते हैं।
पिछली बार, सम्भवत: 1981-82 में किसी शासकीय योजना के तहत लकड़हारों को अधिकतम लाभ दिलाने के विचार से उन्हें शासकीय काष्ठागारों से 7 रुपये प्रति Ïक्वटल की दर पर बिना चिरी जलाऊ लकड़ी उपलब्ध करायी जा रही थी। योजना यह थी कि लकड़हारे उस लकड़ी को फाड़ कर उपभोक्ताओं को बेचें और शाम को लकड़ी की कीमत 7 रुपये काष्ठागार प्रभारी को अदा कर दें। शेष लाभ लकड़हारों का होगा। किन्तु इस प्रक्रिया से भी लकड़हारों को कोई उल्लेखनीय लाभ, जैसा कि सोचा गया था, नहीं हुआ और लकड़हारे पुन: जंगल से ही लकड़ी ला कर बेचने लगे।
और अब ऐसा नहीं रह गया है कि गाँव के आसपास किसी जंगल से लकड़ियाँ चुनीं और लाकर बेची जा सकें। अब तो लकड़हारों की जान साँसत में पड़ गयी है। आसपास जंगल कहीं नजर ही नहीं आते। साथ में पेज का तुम्बा या बासी भात की पोटली लेकर दूर-दराज के जंगलों में जाना पड़ता है। सुबह जो आदमी जंगल जाता है वह इकट्ठे शाम को ही वापस आ पाता है। जो जल्दी लौट गया वह तो शाम को ही अपनी लकड़ी बेच कर फुरसत पा लेता है, किन्तु जो अँधेरा होने के साथ-साथ या उसके बाद वापस होते हैं, वे दूसरे दिन सुबह ही उसे बेच पाते हैं। फिर सरकारी नुमाइन्दों के उन पर पड़ने वाले दबाव का भय भी उन्हें हमेशा सताता रहता है। कभी काँवड़ की लकड़ी उतार कर घर पर रखवा ली जाती है और कभी कुल्हाड़ी छीन कर उनकी पिटाई तक कर दिये जाने की घटना एक आम बात है। 
आइये, जलाऊ बेचने वाले चंद कम उम्र लकड़हारों से बातचीत करने के बहाने इनकी जिंदगी में झाँकने का प्रयास करें और सोचें कि जब हम इन कम उम्र बच्चों को डरा-धमका कर इनके काँवड़ जबरन उतरवा लेते हैं और उनकी मेहनत के अनुपात में उन्हें कम पैसे थमा कर आत्मतुष्टि महसूसते हैं तब हम कितने मानवीय रह जाते हैं? और तब हमारा सोचना और भी लाजमी हो जाता है जब हमें यह मालूम हो जाए कि ये अधिकांश बच्चे मातृ-हीन या पितृ-हीन हैं और उनके जीवन की एक यही बड़ी भारी कमी ही उन्हें अपनी और अपने परिवार की आजीविका के लिये अपने नन्हें कन्धों पर भारी बोझ ढोने को बाध्य करती है।
संतूराम की उम्र है 12 वर्ष। घर में और तीन भाई तथा एक बहन है। संतूराम के पिता की मृत्यु हो चुकी है। वह तीसरी कक्षा में पढ़ता है। छुट्टी के दिनों में जंगल से लकड़ी ला कर बेचता है। एक काँवड़ जलाऊ की कीमत है पाँच रुपये।
"तुम लकड़ी क्यों बेचते हो?"
"हमारे पास खेती-बाड़ी नहीं है। मेरे पिता भी नहीं हैं। घर का खर्च चलाने के लिये मैं लकड़ी बेचता हूँ।" संतू बतलाता है।
"तुम स्कूल भी जाते हो, तब लकड़ी बेचने के काम से तुम्हारी पढ़ाई नहीं रुकती?"
"नहीं। मैं स्कूल के दिन लकड़ी नहीं बेचता। छुट्टी के दिन जंगल से लकड़ी ला कर बेचता हूँ।"
"अच्छा, लकड़ी लेने वाले मोल-भाव करते हैं या तुम्हारे बताए भाव पर ही लकड़ी ले लेते हैं?"
संतू कहता है, "हमें बच्चा समझ कर भाव कम कराते हैं। लेकिन हमें रुचता नहीं। लोग तो साढ़े तीन-चार रुपये में दो, कहते हैं। कहते हैं कि गट्ठा छोटा है, लकड़ी भी कम है। कई लोग डराते भी हैं। यहाँ तक कि जबरदस्ती काँवड़ खींच कर उतार लेते हैं।" कहते हुए वह रुँआसा हो उठता है।
"तो क्या तुम चुपचाप उन्हें लकड़ी दे देते हो?"
"नहीं, हम वहाँ से हटते ही नहीं। लेकिन ज्यादा डराने पर, वे जितना पैसा दें उसे लेकर चुपचाप चला आना भी पड़ता है।"
"तुम्हारे माँ-बाप तुम्हें लकड़ी बेचने से मना नहीं करते?"
"मना क्यों करेंगे? हम तो उस पैसे को घर में देते हैं। उससे दाल-चावल लिया जाता है न!"
संतूराम गर्मियों और दशहरा-दीपावली आदि की छुट्टियों का पूरा उपयोग लकड़ी बेचने में ही करता है।
तेलंगू नामक एक बालक भी, जिसकी उम्र 10 वर्ष के आसपास है, पितृहीन है। घर में उसकी माँ के अलावा एक भाई और एक बहिन है। वह स्वयं तो पढ़ाई नहीं कर रहा है किन्तु उसका छोटा भाई गाँव के स्कूल में पढ़ने जाता है। वह कहता है कि वह अपने छोटे भाई को "आगे तक" पढ़ाएगा। यह कुछ कम वजन की लकड़ियों का काँवड़ लाता है और चार रुपये में बेचता है।
"तुम जो लकड़ी लाते हो, उसे अपने गाँव में बेचते हो या यहाँ, कोंडागाँव में?"
"वहाँ कौन खरीदेगा लकड़ी? गाँव में तो सभी लोग अपने-अपने लिये खुद ही ले आते हैं। इसलिये हमें यहीं कोंडागाँव में ही बेचने के लिये आना पड़ता है।"
"तो आराम से बिक जाती है या काफी घुमाना-फिराना पड़ता है?"
"नहीं। ज्यादा घूमना नहीं पड़ता। लेकिन सही भाव न मिलने पर किसी-किसी रोज बहुत भटकना पड़ता है।"
"तुम पढ़ने क्यों नहीं जाते...तुम्हारे गाँव में तो स्कूल है न?"
"हाँ, स्कूल तो है। मेरे एक-दो साथी पढ़ते भी हैं। परन्तु मैं नहीं पढ़ता।"
"क्यों?"
"घर वाले गाली देते हैं। हमारे पास खेती-बाड़ी भी नहीं है।"
"कितने साल से यह काम कर रहे हो?"
"दो साल हो गये।"
"रोज लाते हो?"
"हाँ, रोज लाता हूँ तभी तो घर का खर्च चलता है।"
सुदूराम के साथ भी यही समस्या है। उसके भी पिता नहीं हैं। दो वर्ष पहले उनकी मृत्यु हो गयी। तब से वह लकड़ी बेचने का काम कर रहा है। माँ और एक भाई है। वह पढ़ रहा है। दूसरी कक्षा में है। लेकिन वर्ष में आधे से अधिक दिनों तक वह स्कूल जा ही नहीं पाता। जलाऊ के काँवड़ लिये कोंडागाँव आना उसकी विवशता है। वह बतलाता है कि पहले वह छुट्टी के दिनों में ही लकड़ी बेचा करता था। किन्तु जब उसके घर की आर्थिक स्थिति काफी प्रतिकूल हो गयी तब उसे स्कूल से भाग कर भी जलाऊ बेचने के लिये विवश होना पड़ा।
"क्या तुम्हारी माँ कोई काम नहीं करती?"
"करती तो है। मजदूरी करती है। लेकिन उससे क्या होता है?" वह कहता है।
"तुम स्कूल से भाग कर लकड़ी बेचते हो। गुरुजी तुम्हें डाँटते नहीं?" प्रश्न सुन कर वह चुप हो जाता है। उसकी चुप्पी का स्पष्ट अर्थ है, उसकी स्वीकृति। किन्तु डाँट के भय से पेट की भूख न भाग सकती है और न भगाई ही जा सकती। वह कहता है कि ज्यादा गाली-वाली देने पर स्कूल कभी नहीं जाएगा और पढ़ाई छोड़ देगा। केवल पढ़ाई-लिखाई से ही तो काम नहीं चलेगा। पेट भी तो भरना है, न!
फूलचंद की उम्र है 9-10 वर्ष के आसपास। यानी इन सभी बच्चों में सब से कम उम्र का है यह। छोटा भाई पढ़ता है परन्तु वह स्वयं पढ़ाई नहीं कर रहा है। लकड़ी बेचना इसका रोज का काम है।
"तुम्हारा छोटा भाई पढ़ता है। तुम क्यों नहीं पढ़ते?"
"घर वाले मना करते हैं। कहते हैं, दो-दो जने पढ़ कर क्या करोगे? तुम लकड़ी बेचो।"
"तुम्हारे पिता तो काम करते होंगे न?"
"नहीं। वो कोई काम नहीं करते। बस, शराब पी कर झगड़ते हैं खूब। माँ काम पर जाती है। एक बार गाँव के लोग पिताजी को खूब डाँटे तब पिछली बार वो ईंट बनाने का काम कर रहे थे। लेकिन वह भी कुछ दिनों तक ही।"
"तुम यह काम कब से कर रहे हो?"
"एक साल से।"
"तो पूरा पैसा तुम घर में ही दे देते हो?"
"हाँ। कभी-कभी दवाई वगैरह भी खरीद कर ले जाना पड़ता है। अभी भी आठ आने की दवाई ले जाना है। किसी-किसी रोज दो-चार आने की मिठाई भी खा लेता हूँ।"
"कौन सी मिठाई खाते हो?"
"चना-लाई या फिर बिस्कुट-पिपरमेंट।"
"कभी खेलते-वेलते भी हो या नहीं?"
"खेलते हैं न। खो-खो, कबड्डी या गिल्ली-डंडा वगैरह खेल लेते हैं।"
पीलाराम के माता-पिता दोनों हैं। एक भाई भी है। वह अपने पिता के रहते हुए भी लकड़ी बेचता है। इसकी उम्र है लगभग 12 वर्ष। वह बतलाता है कि उसे लकड़ी बेचने में खुशी होती है और वजन ढोना भी अच्छा लगता है। पढ़ाई में न उसकी रुचि है और न उसके घरवालों की। उसके यहाँ पाँच एकड़ खेती है और वह स्वयं भी हल चला लेता है। खाने को तो उनकी खेती और माँ-बाप की कमाई से पूरा पड़ जाता है किन्तु कपड़ों के लिये उसका काम करना ज़रूरी है। इसलिये वह इस काम में लगा हुआ है।
सरादू की उम्र है दस साल। वह अपने पाँच भाई-बहनों और माँ-बाप के साथ रहता है। उसके सभी भाई मजदूरी करते हैं। माँ और बहनें भी करती हैं किन्तु पिता कोई काम नहीं करता। वह बतलाता है कि लकड़ी बेच कर पैसा कमाना उसके लिये इसलिये ज़रूरी है क्योंकि उसके घरवाले कहते हैं कि इतना बड़ा लड़का क्या बिना काम किए, बैठे-बैठे खाएगा? भाई लोग जो कमाते हैं, वह उनके अपने लिये ही पूरा नहीं पड़ता। हालांकि वह पूरे वर्ष भर लकड़ी नहीं बेचता, स्कूल में पढ़ता भी है। तीसरी कक्षा में है। छुट्टी के दिनों में लकड़ी बेचता है।
वह कहता है, "जंगल से लकड़ी लाने पर नाकेदार लोग डराते हैं। टँगिया (कुल्हाड़ी) छीन लेते हैं। मुफ्त में लकड़ी देने को कहते हैं।" 
इसी तरह बारह वर्षीय रैसिंग भी पढ़ाई करने के साथ-साथ छुट्टी के दिनों में यह काम करता है। इस साल वह तीसरी कक्षा में पढ़ रहा है। उसके माँ-बाप तो हैं ही, दो भाई भी हैं। एक घर पर रह कर मजदूरी करता है और दूसरा काष्ठागार में हमाली। 
ये सभी बाल लकड़हारे कोंडागाँव के पास सम्बलपुर नामक गाँव के हैं। सम्बलपुर से कोंडागाँव तक 5-6 किलोमीटर की दूरी अपने नन्हें कन्धों पर भारी वजन लिये तय करते हैं और अपनी, अपने परिवार की आजीविका जुटाते हैं। चाहे कड़कड़ाती ठण्ड हो, चिलचिलाती धूप या घनघोर बरसात, इनका यह काम निरन्तर जारी है और शायद ये आजीवन यही काम करते रहेंगे। इस काम से केवल सरादू, रैसिंग, फूलचंद, पीलाराम, सुदू, तेलंगु या संतूराम ही नहीं जुड़े हैं, बल्कि और भी कई बच्चे हैं जो लगभग इन्हीं की आयु-वर्ग के हैं। ये बच्चे हैं लखमू, मंगतू, चंदरु, मंगिया, सोनधर, कमलू, चैतन और बहुत सारे अन्य लोग। लगभग सभी के साथ एक सी समस्या है। अधिकांश बच्चों के माता-पिता में से कोई एक नहीं है और कई बच्चों के तो न माँ है न पिता। कितनी बड़ी त्रासदी से गुजर रहे हैं ये बालधन! एक दिन में केवल एक काँवड़ जलाऊ बेच कर चार से पाँच रुपये तक प्रति दिन कमाते हैं और अपने परिवार के भरण-पोषण में किसी प्रौढ़ की तरह जी-जान से जुटे हुए हैं। इस उम्र में इतनी प्रौढ़ता इन्हीं विपरीत परिस्थितियों ने ही पैदा की है जो कम से कम हमारे बच्चों में, जो अनेक सुविधाओं के जाल में अँटे पड़े हैं; कभी भी नहीं आ सकती। किन्तु यह भी सत्य है कि बाल-सुलभ चंचलता और हँसमुखता का इस तरह लोप हो जाना भी इन कामकाजी बच्चों के भविष्य के प्रति आशंकाएँ ही पैदा करता है। तब प्रश्न यह पैदा होता है कि आदिवासियों के विकास के लिये जी-जान से जुटी सरकार को क्या पहले इन आदिवासी बच्चों के लिये नहीं सोचना चाहिये? क्या यह एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा नहीं है? और यह भी कि अन्तर्राष्ट्रीय बाल-वर्ष ने इन्हें क्या सौगात दी.....? 

Saturday, 19 May 2012

सोनू


इस बार प्रस्तुत है यह कहानी : 


सोनू बड़ा परेशान था।  इधर पाठशाला के लगने का समय होता जा रहा था और उसकी माँ थी कि अभी तक ऊपर पारा से धान कूट कर लौटी ही नहीं।  कभी-कभी उसे अपने ऊपर बहुत खीझ हो आती।  यह भी कोई ज़िन्दगी है कि एक ढेकी तक नहीं है घर में।  धान कूटना हो तो कोस भर दूर अपनी ही जाति के दूसरे किसी व्यक्ति के घर जाना विवशता ही है।  गाँव के दूसरे ऊँची जात वाले लोगों के घर तो वो लोग जा ही नहीं सकते।  कोई पीछे से आ रहा हो तो अपने को उनके लिए रास्ता छोड़ देना पड़ता है।  पीने के लिये पानी दो कोस से भी अधिक दूरी पर बहती नदी से लाओ या फिर गाँव के गन्दे तालाब का पानी पियो।  वह सोचता; क्या ऐसा नहीं हो सकता कभी कि उसके घर में भी ढेकी लगा ली जाए?  परन्तु यह कैसे होगा!  उसके बाबा गाँव के मुखिया और पटेल-सरपंच के लिए जब जंगल से गाड़ी भर-भर कर लकड़ी ला कर देते हैं तब तो नहीं पकड़ते ये पाइक लोग उन्हें। ...और अपने घर के लिए एकाध लकड़ी ले आएँ तो भला क्यों इन्कार?  लेकिन नहीं!  बाबा तो मानते ही नहीं।  कहते हैं, पाइक लोगों को तुम नहीं जानते।  गाँव के सब बड़े लोग उन्हें बहुत मानते हैं, इसलिए पाइक लोग भी इनका कोई काम नहीं रुकने देते।  हम छोटे लोग हैं बेटा, करम से भी और धरम से भी।  
ऐसे में सोनू को अपने से बड़ी चिढ़-सी हो आती।  तब उसे अनायास ही अपने बोड़ू की याद आ जाती।  भीमकाय देह, जैसे सागौन का भरा-पूरा पेड़।  कन्धे पर हमेशा झूलता हुआ टँगिया और लाल-लाल आँखें; जैसे फरसा का फूल।  गाँव तो गाँव, आली-पाली के लोग तक उनसे दबते थे।  इसी पाठशाला की बात लें।  कितनी उठा-पटक की थी गाँव के तथाकथित मुखियों ने।  कमर कस ली थी पाठशाला के विरोध में।  कहते थे, गाँव के बच्चों को ये गुरुजी लोग बिगाड़ डालेंगे।  कामकाजी बच्चों को सारा दिन पाठशाला में बन्द कर रखने से हमारा भारी नुकसान होगा।  उनकी देखा-देखी गाँव के अन्य लोग भी ऐसी ही बातें करने लगे थे।  गुरुजी को मारपीट कर गाँव से भगाने की पूरी साज़िश भी रच डाली गयी थी।  लेकिन ऐन वक़्त पर उसके बोड़ू सामने आ गये थे।  सन् दस में हुए भुम्काल में सक्रिय रूप से भाग ले चुके थे।  लाल बाबा के ख़ास आदमियों में से थे।  उन्होंने दुनिया देखी थी।  काफ़ी अनुभव था उनको।  उन्होंने लोगों को समझाया था।  उस दिन की एक धुँधली सी याद अभी भी है उसके मस्तिष्क में :


       "क्यों दादा, पढ़ाई-लिखाई से क्या हो जाएगा भला?"  सरपंच ने तब यथा सम्भव विनम्र होते हुए उनसे पूछा था। 
"गियान मिलेगा।  अपना नँगत-गिनहा बिचारने लायक दिमाक बनेगा।"  बोड़ू ने कहा था। फिर ज़्यादा बहस न करते हुए अपना निर्णय सुना दिया था : "यहीं, थानागुड़ी के पास ही बनेगा इस्कुल।  गाँव वाले मिल कर इस्कुल के लिए झोपड़ी बनाएँगे।"  और वे बैठक से उठ गए थे।  किसी में भी हिम्मत नहीं थी कि उनकी बात काट देता।  आख़िर गाँव वालों को इस्कुल के लिए झोपड़ी बनानी ही पड़ी।  गुरुजी के रहने के लिए बोड़ू ने अपने घर पर ही एक खोली दे दी थी।  जब तक वे ज़िन्दा थे, गाँव में सुमता बना रहा।  गाँव के किसी कमज़ोर आदमी के साथ न तो कोई मनमानी कर सकता था और न उनसे बेग़ारी करा पाने का किसी में साहस ही था।  उनकी असमय मृत्यु के साथ ही गाँव की एकता भी बिखर गयी।  गाँव के सम्पन्न लोगों और तथाकथित मुखियों को मनमानी करने की खुली छूट मिल गयी।  बोड़ू ने अपने जीवन-काल में घर का सारा धान-पान समाज-सेवा में लगा दिया था।  अन्याय तो वे पल भर को भी बर्दाश्त नहीं कर सकते थे।  उनसे किसी का दु:ख नहीं देखा जाता था।  जहाँ उसके बोड़ू निर्भीक और साहसी थे, वहीं उसके बाबा हद दर्ज़े तक दब्बू और असहाय क़िस्म के व्यक्ति।


उसने अतीत की यादों को एक झटका दिया और बाहर निकल कर आकाश की ओर ताका।  सूरज ऊपर चढ़ रहा था।  उसने चढ़ते सूरज से यह भाँप लिया था कि अब पाठशाला की पहली घण्टी बजने ही वाली है।  बाबा को यों अकेले कराहते छोड़ कर जाने का वह मन नहीं बना पा रहा था।  फिर उसने अपने-आप को सान्त्वना दी, "सिरहा तो अभी-अभी झाड़-फूँक कर गया है। थोड़ी-सी राहत तो मिल ही गयी होगी बाबा को।  आया भी अब आती ही होगी।  चलो, चल कर बाबा को समझा दूँ और पाठशाला चला चलूँ।  देर होगी तो पाठ निकल जाएगा।"  नहीं, नहीं वह एक भी पाठ नहीं छोड़ना चाहता।  उसे पूरी लगन के साथ पढ़ना है।  उसके बोड़ू और बाबा के सपने को साकार करना है।  
वह भीतर आ गया।  पिता के पास पहुँच कर उनका हाथ थाम लिया और धीरे से बोला : "बाबा, मैं पाठशाला जा रहा हूँ।  बहुत देर हो गयी है।" 
"हाँ बेटा, जा।  अभी तक क्यों नहीं गया?"  पिता ने अस्फुट-से स्वर में कहा।  तभी बाहर से कोटवार की आवाज़ सुनायी पड़ी
"कौन है?"  कहता वह बाहर निकल आया।
"तेरा बाप है, रे?"  कोटवार लगभग चीख़ा।
"हाँ, हैं।"
"ज़रा बुला तो बाहर।"
"उन्हें तीन रोज़ से बुख़ार है।  डसना में पड़े हैं।  उठ नहीं पाते।"  वह जल्दी-जल्दी बोला था।  
लेकिन कोटवार ने जैसे सुना ही न हो।  उसे परे धकेलते स्वयं ही झोपड़ी के भीतर घुस आया था।  "क्यों? बहाना बना रहा है!  चल उठ!  बड़े साहेब का सामान दूसरे गाँव तक पहुँचाना है।"  एक ही साँस में वह बोल गया था।
कथरी में से सिर निकाल कर उसके बाबा ने पहले तो उसे ताका, पहचाना, फिर मरी हुई आवाज़ में कहा : "तीन दिन से जर के मारे डसना पकड़े पड़ा हूँ।  जाँगर में ताकत नहीं रह गयी है।  नहीं चल पाऊँगा, कोटवार।" 
"देख रे! यह बहाना फिर कभी बनाना।  आज तो चलना ही पड़ेगा।"  कोटवार हुज्जत पर उतर आया था।  
"चाहो तो मार डालो, पर मैं नहीं जा पाऊँगा।  माट्टी किरिया कोटवार।  जाँगर थक गया है, एकदम।"  उसके बाबा ने असहाय हो कर कह दिया।
"मैं अच्छी तरह जानता हूँ, तेरे बहाने को।  किरिया खाने में तो ओस्ताज है रे तू।"  कोटवार का स्वर विषैला प्रतीत हो रहा था।  
सोनू देहरी पर खड़ा-खड़ा सोच रहा था। ये वही लोग हैं जिन्हें उसके बोड़ू के रहते उनके सामने मुँह तक खोलने की हिम्मत नहीं होती थी। और आज कैसे बाघ बने दहाड़ रहे हैं...।  सच! समय बदलते देर नहीं लगती।  
"अच्छा, अच्छा ठीक है। ऐसा कर, तू न सही तेरे इस लेका को भेज दे।  थोड़ा-सा ही तो सामान है।  पहुँचा देगा।"  कोटवार कह रहा था।
"वह, वह तो पढ़ने जा रहा है।"  मरी हुई आवाज़ में उसके बाबा बोले।
"पढ़ने जा रहा है...?"  शब्दों को चबाते हुए व्यंग्य पूर्वक बोला था कोटवार : "पढ़-लिख कर लाट साहब बनेगा क्या...?  और फिर आज एक दिन के लिए इस्कुल नहीं भी गया तो क्या डोंगरी गिर जाएगा उसके ऊपर?"  
उसके बाबा ने उसकी ओर असहाय दृष्टि से देखा।  उसने हाथ में रखी स्लेट दीवार से सटा कर रख दी और कोटवार के साथ जाने को तैयार हो गया।  कातर आँखों से ताकते उसके बाबा के मुँह से घरघराती आवाज़ निकली थी : "रहम करो कोटवार।  यह नन्हा-सा लेका कैसे उठा पाएगा बड़े साहेब के सामान का बोझ...?"
कोटवार ने सुना तो बमक उठा : "क्यों बकवास कर रहा है, डोकरा?  न ख़ुद जाने को तैयार है, न लड़के को जाने दे रहा है।  यहाँ कौन तेरा बाप बैठा है, जो आएगा?"  और उसे लगभग घसीटते हुए ले कर बाहर निकल गया।  तब उसे लगा था, काश! वह थोड़ा बड़ा होता।  बिल्कुल अपने बोड़ू की तरह फरसा उठा कर दौड़ पड़ता कोटवार के सिर पर।  उसे अपने बाबा पर भी क्रोध आ रहा था।  बोड़ू-सी मर्दानगी उनमें तिल भर भी नहीं थी।  निरे कायर हो कर ही तो रह गए थे वे। सायगोन और सरगी की तरह छाती तान कर खड़े होने की बजाय लाजकुड़िन की तरह अपने आप में सिमट जाने का लिजलिजापन ही तो समा गया था उनमें।
रास्ते भर चुपचाप चलता रहा।  थानागुड़ी पहुँच कर देखा, बड़े साहेब खाट पर बैठे सल्फी पी रहे थे।  पटेल-सरपंच हाथ बाँधे एक ओर खड़े थे।  मँगतू मामा की जवान लड़की सायती भीतर भोजन राँध रही थी।  बड़े साहब रह-रह कर उधर ताक लेते और जाने कैसे-कैसे इशारे भी कर देते।
कोटवार ने उसे धकियाते हुए भीतर पहुँचा दिया और झापी की ओर इशारा करते हुए कहा : "वो देख, काँवड़ रखा हुआ है।  सज कर और आगे-आगे निकल चल।  नदी उस पार वाले गाँव में पहुँचाना है।  सीधे थानागुड़ी में ही पहुँचाना।  समझे?"  वह सामान देख कर चौंक गया।  किंतु कोटवार को इसका अहसास न होने दिया।  ऊपर से कहा, "ठीक है।"
कोटवार बाहर आँगन में चला गया।
उसने काफी जोर लगा कर झापियाँ उठायी और काँवड़ सज कर लिया।  लेकिन काँवड़ उठा पाना उसके लिए सम्भव नहीं हो पा रहा था।  काफी जोर आजमाईश के बाद भी काँवड़ उससे न उठा।  उसके नन्हे चेहरे पर सावन के महीने में भी पसीने की बूँदें छलछला आयीं।  विवशता और आतंक के कारण उसकी आँखें भी भर आयी थीं।  वह जानता था, कोटवार से कुछ कहने का कोई मतलब ही न होता।  तभी कोटवार ने उसे पुकारा।  वह काँवड़ वहीं छोड़ कर आँगन में निकल आया।  बड़े साहब सल्फी के नशे में उससे पूछने लगे थे :
       "क्या नाम है रे, तेरा?"
       "ज् ज् ज् जी सोनू।"  वह हकलाता हुआ बोला।
       "तेरा बाप क्यों नहीं आया रे.....?"  साहब ने कड़े स्वर में पूछा था।
       "जी, वो बीमार हैं।"  उसने हकलाते हुए, दीन स्वर में जवाब दिया।
       "क्यों, क्या हो गया है?" साहब ने सल्फी का गिलास खाली करते हुए लापरवाही से पूछा।
       "बुखार है साहब, तीन दिन से।"  उसका स्वर रुआँसा हो गया था।
       "तू उठा पाएगा काँवड़.....?"  साहब ने मुर्गे की टँगड़ी चबाते, अविश्वास से पलकें झपकाते हुए पूछा था।
       ".............."  वह सिर नीचा कर चुप हो गया।  कुछ बोलते नहीं बना उससे।
       "अरे, बोलता क्यों नहीं।  गूँगा है क्या.....?"  बड़ी तीखी आवाज थी साहब की।  इसके पहले कि सोनू कुछ बोलता, कोटवार बोल उठा था, "उठा लेगा साहब।  यही काम करते चले आ रहे हैं ये लोग।"
       सरपंच को सोनू के बोड़ू की याद आ गयी थी।  व्यंग्य से बोला था : "यह तो साहब बनने के सपने देख रहा है, हजूर।  इस्कुल में पढ़ता है....। इसके बोड़ू ने बनवाया था न।"
       उसे लगा था, सरपंच के मन में बरसों से जमा मैल बाहर निकल रहा है।
       "अच्छा.....! पढ़ता है.....?"  साहब भी व्यंग्य से मुस्कराए थे, "क्या करेगा रे पढ़ कर.....?"
       "तसिलदार बनूँगा।"  उसके मुँह से जाने कैसे यकायक निकल गया।  सभी ही-ही करके हँसने लगे।  उसे लगा, वह गलत बोल गया है।  उसके बोड़ू उससे यही कहा करते थे, "तुझे पढ़ा-लिखा कर तसिलदार बनाऊँगा।"  शायद उसके अवचेतन में रह गयी वही बात आज फूट पड़ी थी।  वह उन्हें हँसता देख वहाँ से हट गया था।  तब से लगातार सोचता रहा और मन ही मन दुहराता रहा, "मैं तसिलदार बनूँगा।" 
       "अब वहाँ खड़ा-खड़ा क्या मुँह ताक रहा है?  चल जल्दी से काँवड़ उठा और भाग।"  कोटवार उसकी ओर बाज की तरह झपटा था।
        वह कमरे में वापस पहुँचा तो वही भारी-भरकम बोझ सामने था।  जानता था, "नहीं" कहा और कोटवार उसके देव-धामी तक को नहीं छोड़ेगा।  थोड़ी देर खड़ा रहा, फिर पिछला दरवाजा धीरे से खोल कर घर की राह भाग लिया।  वहाँ से भागा तो जरूर लेकिन उसका डर बढ़ गया था कि कोटवार उसे और प्रताड़ित करेगा।  हुआ भी वही।  अभी उसे घर पहुँचे कुछ ही पल बीते थे, कि कोटवार डण्डा फटकारता उसके घर पहुँच गया था।  वह धान-ढुसी के पीछे जा छिपा था।  उसने वहीं से सुना, कोटवार गरिया रहा था : "अरे ठगों की औलाद!  हुकुम उदूली करने की हिम्मत कहाँ से पा गये?  बाहर निकल रे।"
       उत्तर में उसके बाबा की घरघराती आवाज़ सुनायी दी थी : "क्या बात है कोटवार, किसलिए नाराज हो रहे हो?"
      "कामचोर! पूछता है, नाराज क्यों हो रहा हूँ?  तेरा लेका सामान छोड़ कर थानागुड़ी से भाग गया.....नहीं जानता क्या?  चल उठ, सीधे से सामान अमरा दे।  नहीं तो आज...!" कहते कोटवार फड़की ठेल कर भीतर आ गया था और डण्डे से उसके बाबा के शरीर को कोंच रहा था।  उसके बाबा से तो उठा नहीं जा रहा था।  नहीं उठ सके तो कोटवार ने कस कर उनकी पिटाई कर दी और हाँफते-गरियाते हुए बाहर निकल गया।
       सोनू ने जब देखा कि कोटवार अब जा चुका है, तो वह भीतर से निकल कर अपने बाबा के पास आया।  देखा, सारे शरीर पर डण्डे के निशान उभरे हुए थे और बाबा अचेत-से हो गये थे।  वह किंकत्र्तव्यविमूढ़-सा हो गया था।  अपने बाबा से चिपट कर रोता रहा।  रोते-रोते उसे कब नींद आ गयी, पता ही नहीं चला। उसकी नींद तब टूटी जब उसकी आया ने उसे जगाया।  उसने देखा, उसकी आया बाबा की सिंकाई कर रही थी और सिसक-सिसक कर कोटवार को सरापती भी जा रही थी।  उसके मन में संकल्प भर उठा था, "बदला लूँगा।  बोड़ू जैसा ही बनूँगा...बोड़ू जैसा ही बनूँगा।"  वह बुदबुदाने लगा था, "बोड़ू! मुझे आशीर्वाद दो, मुझे ताक़त दो बोड़ू अपनी तरह।  मुझे शक्ति दो....मुझे शक्ति दो....मुझे शक्ति दो।"  और उसकी निगाह छत पर खोंस कर रखे गये बोड़ू के पैने टँगिये की ओर स्वत: ही उठ गयी।  लगा, एक और भुम्काल का बीज बो दिया गया है। 


टिप्पणी : 

ढेकी : धान कूटने का ग्रामीण संयन्त्र।
पाइक : सरकारी मुलाज़िम।
बोड़ू : ताऊ।
टँगिया : कुल्हाड़ी।
फरसा : पलाश।
आली-पाली : आसपास।
भुम्काल : जनक्रान्ति।
लाल बाबा : बस्तर में सन् 1910 में हुई जन-क्रान्ति के सूत्रधारों में से एक और राज परिवार से सम्बद्ध लाल कालेन्द्रसिंह (कालीन्द्र सिंह)।
नँगत-गिनहा : अच्छा-बुरा।
सुमता : सुमति।
सिरहा : वह व्यक्ति जिस पर देवी आती है।
आया : माँ।
डसना : बिस्तर।
जर : ज्वर।
जाँगर देह।
माट्टी कीरिया : माटी की सौगंध।
ओस्ताज : उस्ताद।
लेका : लड़का।
डोंगरी : पहाड़।
डोकरा : बूढ़ा।
फरसा : परशु।
सायगोन-सरगी : सागौन और साल के पेड़।
लाजकुड़िन : लाजवन्ती।
काँवड़ : काँवर।
सल्फी : ताड़ प्रजाति के सल्फी नामक पेड़ से निकलने वाला मादक रस।
झापी : बाँस से बना गोल और बड़ा सा सन्दूक।
सज : तैयार।
धान-ढुसी : धान भण्डारण के लिये पैरा (पुआल) से बनी रस्सी को गोल-गोल लपेट कर बनाया गया पात्र।
तसिलदार : तहसीलदार। 
फड़की : बाँस से बना दरवाजा।
अमरा : पहुँचा। 
सरापती : शाप देती (सराप : शाप)। 

Saturday, 12 May 2012

लोगों को ढोते लोग



इस बार अमृत संदेश, 30 अक्तूबर 1984 अंक में प्रकाशित यह रपट : 


छोटे शहरों और शहराते हुए कस्बों में, जहाँ अभी टैक्सियों, आटोरिक्शों या ताँगों का प्रचलन (ताँगे तो वैसे भी इने-गिने शहरों में ही चल रहे हैं और उनके दिन भी अब लद गये हैं) शुरु नहीं हुआ है, स्थानीय ठिकानों तक जाने-आने के लिये रिक्शे ही आम साधन के रूप में इस्तेमाल किये जा रहे हैं। टैक्सी आज भी ऊँचे तबके के लोगों के लिये ही सुलभ है, जबकि रिक्शा हर आम-ओ-खास के लिये समान रूप से। 
रायपुर में अधिकांश रिक्शा-चालक ओड़िसा प्रान्त या सीमावर्ती इलाक़ों से आये लोग ही हैं। कम से कम पन्द्रह और उधर अधिकतम आयु-सीमा 50 वर्ष तक के लोग रिक्शा चला कर अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं। रिक्शा वालों के विषय में यह आम धारणा है कि वे सवारियों से, विशेषत: नयी सवारियों से ज्यादा पैसे ऐंठते हैं और अपने पारिश्रमिक के मामले को लेकर झगड़ते भी हैं। लेकिन इसके पीछे सच क्या है, इस पर विचार करने की कोशिश हम नहीं करते।
रायपुर की एक घटना याद आती है। मुझे जिलाधीश कार्यालय से न्यू शांतिनगर (नंदा दीप के पास) अपने एक सम्बन्धी के यहाँ जाना था। वैसे भी मेरा रायपुर जाना कभी-कभार ही हो पाता है, इससे वहाँ के रिक्शों की दर के विषय में कुछ मालूमात नहीं थी मुझे। बहरहाल, मैंने एक रिक्शेवाले से पूछा तो वह बोला, बहुत दूर है साहब। चार रुपये लगेंगे। मैं बैठ गया। वहाँ पहुँच कर उसे मैंने पाँच का नोट थमाया तो वह अपने चार रुपये काट कर एक रुपया मुझे वापस देने लगा। मैंने कहा, रख लो भाई। चाय पी लेना। वह हतप्रभ हो उठा। उसकी निगाहें झुक गयीं। वह धीमे से बोला, "साब माफ कीजिये, मैं आपसे ज्यादा पैसे ले रहा था। मुझे आप केवल दो रुपये दे दीजिये।" अब मैं चकित! "क्यों भाई, अभी तो तुमने चार रुपये कहा था। अब अचानक दो रुपये कम कैसे बोल रहे हो?"
वह बोला, "क्या करें साहब, कई किस्म के लोगों से पाला पड़ता है। लोग चार-चार आने तक के लिये चिक-चिक करते हैं। रुपया बताओ तो आठ आना बोलते हैं। इसलिये हम सही रेट से कुछ ज्यादा ही बताते हैं। तब जाकर लोग हमारे सही रेट का पैसा देते हैं। और यदि हम सही रेट बताएँ तो हमें तो उसका आधा भी नहीं मिलेगा शायद। मैंने सोचा कि आप भी मोल-भाव करके दो-ढाई रुपया थमाओगे, इसलिये चार बोलना पड़ा था।"
मेरे काफी जिद करने पर भी उस रिक्शा-चालक ने दो रुपये से एक भी पैसा अधिक लेना मंजूर नहीं किया। वह एक युवक था। ओड़िसा से रोजी-रोटी की खोज में आया हुआ। मेरी उससे अधिक बातचीत भी नहीं हो पायी और मैं उस भले आदमी का नाम तक न पूछ सका। अब यह अलग बात है कि उतनी दूरी के लिये शायद निर्धारित दर उससे भी कम हो या उतनी ही। 
अब प्रश्न उठता है कि क्या उस रिक्शा-चालक का कथन सही नहीं है? हम अपने भीतर झाँकें तो मालूम होगा कि वाकई उसका कहना एकदम ठीक है। दरअसल हम जरूरत से ज्यादा अव्यावहारिक हो चुके हैं। इतना ही नहीं, हमने अपना विश्वास भी खो दिया है। दूसरों पर आसानी से हम विश्वास भी नहीं करना चाहते। अब इसके पीछे कोई कारण नहीं है, ऐसी बात भी नहीं।
ठीक है कि हम पैसा देते हैं, इसलिये सवारी तो करना ही है। लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि मानवीय दृष्टिकोण को हम एकदम ताक पर रख दें। ऐसी कई बातें इनके साथ होती हैं, जब सोचने पर विवश होना पड़ता है कि क्या ये लोग इन्सान नहीं? या कि हमारी ही इन्सानियत कहीं गहरे कूप में खो गयी है? कड़ाके की सर्दियों में भी ये लोग केवल एक-एक कपड़े में लिपटे रात में रिक्शा खींच रहे होते हैं, बरसात में छाता या रैनकोट के बगैर भी अपना काम कर लेते हैं। गर्मियों में जब हम-आप पंखे या कूलर की ठण्डी हवा ले रहे होते हैं, ये देह का पसीना भी नहीं पोंछ पाते और हमारा-आपका बोझ ढोने में लगे होते हैं। रात में भी चैन नहीं; कभी फुरसत नहीं। और फिर फुरसत या आराम का मतलब है खाने में उस दिन नागा होना। कौन चाहेगा ऐसी फुरसत जो उसे भूखा-प्यासा रखे? बस.....इसलिये युवक तो युवक, वृद्ध भी दिन-रात की चिन्ता किये बगैर लोगों का बोझ ढोने में लगे हैं। 
अभी उस रोज का दृश्य मेरी आँखों के सामने उभर आया है.....
कोंडागाँव की बात है। एक सज्जन काफी भारी डील-डौल के थे और जंगल विभाग के किसी नीलाम में जा रहे थे। एक काफी बूढ़ा रिक्शा-चालक उनके भारी शरीर को लिये उसे चढ़ाव की ओर नहीं खींच पा रहा था। पानी काफी जोरों से बरस रहा था। उन सज्जन के पास छाता तो था, किन्तु वे उसे न तो रिक्शा-चालक को दे रहे थे न स्वयं नीचे उतर रहे थे। हार कर बूढ़े रिक्शा-चालक ने उनसे विनती की कि वे थोड़ी देर के लिये रिक्शे से उतर जायें, तब तक बरसात भी थोड़ी थम जाएगी और वह भी जरा देर सुस्ता लेगा। किन्तु यह देख कर आश्चर्य हुआ कि वे सज्जन (?) उस बूढ़े पर बिगड़ पड़े। उल्टी-सीधी गाली दी और बोले, "पैसा हराम का देते हैं क्या हम? जब रिक्शा नहीं चलाया जाता तो छोड़ क्यों नहीं देते यह काम?" बूढ़ा कुछ न बोला। उसके दयनीय चेहरे पर गजब की करुणा उभर आयी थी। अचानक पता नहीं उसमें कहाँ से इतनी ताकत आ गयी कि वह पूरा जोर लगाता, पानी में भीगता रिक्शा खींचने लगा। लेकिन अपनी पूरी कोशिशों के बावजूद वह उसे अधिक दूर न खींच सका तो वह महाशय उतरे और उसे पैसे दिये बगैर ही चलने लगे। बूढ़ा चिल्लाने लगा। हमने रिक्शे वाले का पक्ष लिया तो वे धर्मावतार पहले तो हम पर बिगड़े, फिर बड़ी मुश्किल से एक रुपये का नोट सड़क पर फेंक कर आगे बढ़ गये। यह है हमारी इन्सानियत.....! और मजे की बात ये कि ये लोग इस किस्म के शोषण की शिकायत भी नहीं कर सकते। और करें भी तो किससे? पुलिस से.....? उस पुलिस से, जिसके पास आम आदमी की समस्याओं को दूर करना तो दूर की बात है, सुनने की भी फुरसत नहीं। रिक्शे वालों की शिकायत है कि रिक्शे की सवारी करके, बाद में पैसे न देना, गाली-गलौज करना और बात-बेबात परेशान करना, नजराना वसूलना एक आम बात है। ये बेचारे रिक्शे वाले, जो अपनी रात-दिन की हाड़तोड़ मेहनत के बाद औसतन पन्द्रह रुपये प्रतिदिन कमा पाते हैं; अपने परिवार का पेट पालें या इन्हें नजराना दें?
पिछले दिसम्बर में एक हवलदार के दुव्र्यवहार को लेकर यहाँ के रिक्शा-चालकों ने एक दिन की हड़ताल कर दी थी। किन्तु नागरिकों और प्रशासन के हस्तक्षेप से यह हड़ताल वापस ले ली गयी। फिर प्रश्न यह भी उठता है कि हड़ताल से स्वयं रिक्शा-चालकों के अलावा और किसका नुकसान हो सकता था भला....?
यहाँ के रिक्शा-चालकों ने अपना एक संघ भी बना लिया है। स्वरोजगार योजना के तहत सहायता प्राप्त सत्रह लोगों ने मुख्य संगठन के नीचे एक शाखा बना ली है। इस शाखा के अध्यक्ष हैं रघुनाथ, जबकि मुख्य संगठन के अध्यक्ष सुरितराम साहू हैं। कोषाध्यक्ष हैं सुकलुराम और सचिव हैं नंदलाल साहू। ये सत्रह लोग जिन्हें उक्त योजना के अन्तर्गत रिक्शा खरीदने के लिये सहायता मिली है, सरकार के प्रति आभारी हैं। उनके विषय में संघ के अध्यक्ष रघुनाथ बतलाते हैंै : हमारे कुछ साथियों को सरकार ने सहायता दी है। इनमें कोदीराम, मोहन, सुरितराम आदि हैं। इनको एक रिक्शा सोलह सौ रुपये में पड़ा। लेकिन रुपये एकमुश्त नहीं देना है, धीरे-धीरे करके चुकाएँगे। यह बड़ी सहूलियत है। जब पूरा पैसा पट जाएगा तब ये रिक्शे इनके खुद के हो जाएँगे। आगे उन्होंने बताया, इस सहायता को प्राप्त करने में थोड़ा समय तो लगा, परेशानियाँ भी आयीं, किन्तु मिल गयी; इसका सन्तोष है।
तुलाराम की उम्र है 15 वर्ष। यह अभी साल भर से ही रिक्शा चला रहा है। पढ़ रहा था। चौथी कक्षा तक पढ़ने के बाद स्कूल जाना बन्द कर दिया। अपना और परिवार का पेट पालने के लिये कोई न कोई काम करना ज़रूरी था ही। किराये का रिक्शा ले कर चलाता है। कुछ ज्यादा कमाई नहीं हो पाती, क्योंकि रिक्शे का किराया भी इसी में से देना पड़ता है। खुद का रिक्शा लेना चाहता है, किन्तु पास में पैसे नहीं हैं और आजकल रिक्शे की कीमत भी काफी हो गयी है। हाँ, सरकार से सहायता मिलने पर जरूर खरीदेगा।
"इतना भारी वजन ढोते तुम्हें तकलीफ नहीं होती?"
"तकलीफ कैसे नहीं होगी? लेकिन क्या करें, पेट के लिये करना ही पड़ता है। नहीं करेंगे तो कौन मुफ्त में खाना-कपड़ा लाकर देगा?"
"क्या रात में भी रिक्शा चलाते हो?"
"हाँ, रात में भी चलाना पड़ता है। जोहन भी चलाता है रात को।"
"आगे भी यही काम करते रहोगे, या कोई दूसरा काम करने का इरादा है?"
"कोई भी काम करो, मतलब तो एक ही है। पेट तो पालना ही है किसी तरह।"
"हफ्ते में किसी दिन छुट्टी मनाते हो कि नहीं?"
"कोई छुट्टी नहीं। रोज कमाते हैं, तब तो खाते हैं। छुट्टी मनाएँगे तो खाएँगे क्या.....?"
रघुनाथ की उम्र है पैंतीस से अड़तीस वर्ष के बीच। वह पिछले 15 वर्षों से रिक्शा चला रहा है। पहले वह किराये का रिक्शा चलाया करता था, फिर लगभग दस-बारह वर्ष पूर्व उसने कोंडागाँव के पास सम्बलपुर नामक गाँव के एक व्यक्ति से सात सौ पचास रुपये में रिक्शा खरीद लिया। वह बतलाता है कि उसे सरकार से कोई सहायता नहीं मिली थी। रिक्शे की कीमत उसने धीरे-धीरे करके अपनी कमाई से ही पैसे बचा कर चुकायी है। रघुनाथ के बाल-बच्चे नहीं हैं। वह और उसकी पत्नी है केवल। वृद्ध पिता और भाई-बहन भी हैं। पिता अभी भी मजदूरी करते हैं। दो भाई, मनीराम और रतन भी उसके साथ रिक्शा चलाने का काम करते हैं। रघुनाथ का कहना है कि वह सुबह 8 बजे से शाम 6-7 बजे तक ही काम करता है। बाद में सीधे घर जाकर आराम करता है। दो ही जने तो हैं कुल मिला कर। "क्या करना है ज्यादा हाय-हाय करके भी?" वह कहता है।
सुकलू की उम्र 55 से 60 के बीच होगी। ये पिछले कई सालों से रिक्शा चला रहे हैं। इन्होंने भी रघुनाथ की ही तरह, किन्तु कम कीमत में, यानी सात सौ रुपये में सात वर्ष पूर्व रिक्शा खरीद लिया था। रुपये धीरे-धीरे करके चुकाये। इनके तीन लड़के हैं। तीनों ही मजदूरी करते हैं। सुबह 8 बजे से शाम पाँच-साढ़े पाँच बजे तक ही ये रिक्शा चलाते हैं। अधिक परेशानी मोल लेना इन्हें भी नहीं रुचता। 
प्रतिदिन की आय के बारे में इन लोगों का कहना है कि वे लोग औसतन पन्द्रह रुपये तो कमा ही लेते हैं। हाँ, कभी-कभी आमद कम होकर दस रुपये तक भी उतर जाती है और बाजार के दिनों में दस से बढ़ कर पचीस तक भी पहुँच जाती है। पन्द्रह रुपये में से दस रुपये तो रोज खर्च हो ही जाते हैं। बड़ा परिवार हुआ तो सारे के सारे रुपये खर्च हो जाते हैं और खाने को भी पूरा नहीं पड़ता। ऐसे में अपने आराम की चिंता किये बगैर रात में भी रिक्शा चलाना पड़ता है। सारा खर्च चलाने के लिये ज़रूरी है। कुछ पैसे कपड़ों के लिये भी बचा कर रखना पड़ता है। कभी कोई सगा-सम्बन्धी आ जाए तो ये पैसे खर्च भी हो जाते हैं। शाम को थकान दूर करने के लिये शराब का सहारा लेना ये अपनी विवशता बताते हैं। 
"क्यों रघु, तुम नहीं जानते कि शराब से कितना नुकसान होता है शरीर को?" मैं यह पिटा-पिटाया प्रश्न करता हूँ रघुनाथ से, तो उत्तर देते हैं सुकलू : "नुकसान तो बाद में होगा, बाबू। सभी जानते हैं यह बात। लेकिन दिन भर की थकान को कैसे मिटाएँ? शाम को थोड़ी सी पी लेते हैं तो बदन का दर्द कम हो जाता है और नींद भी आ जाती है।"
"तो क्या रोज पीते हो?"
"हाँ, रोज ही पीना पड़ता है। लेकिन ऐसा भी नहीं कि इतना पी लें कि आदमी ही न रह जाएँ। नहीं, नहीं ऐसे नशा से भी क्या फायदा? दवा के रूप में थोड़ी सी पी ली.....बस।"
"सवारियों की, विशेषकर बाहर से आने वालों की शिकायत है कि कोंडागाँव के रिक्शा-चालक काफी ज्यादा पैसे लेते हैं। क्या यह सही है?" मैं उनका ध्यान इस ओर खींचता हूँ।
रघुनाथ कहता है : "कहने को तो कुछ भी कह देते हैं लोग। जबकि सही बात यह है कि हम निर्धारित दर ही लेते हैं। और यह जो आप कह रहे हैं न, वो बात हर कोई तो नहीं बोलता। कुछ लोग जरूर ऐसा कहते हैं, क्योंकि वे स्वयं ही निर्धारित दर से भी कम पैसे देते हैं। जब हम दर की बात करते हैं तो उन्हें वह ज्यादा लगती है।"
"अच्छा, और ये झगड़े वाली बात?"
"कौन से झगड़े की?"
"यही कि रिक्शेवाले सवारियों से झगड़ा करते हैं।"
"नहीं। आप गलत कह रहे हैं। झगड़ा हम करते नहीं, करने को मजबूर किये जाते हैं। और बात होती है वही दर की। लेकिन हर कोई झगड़ा नहीं करता। कुछ लोग जो उसी प्रवृत्ति के होते हैं, वे ही परेशान करते हैं। और फिर हमारी मेहनत की सही कीमत हमें न मिले तो क्या हमें बुरा नहीं लगेगा? अच्छा, फिर अगर आपको रिक्शों की दर ही कम कराना है तो पहले जो महँगाई बढ़ गयी है न, उसे तो कम कराइये। चावल-दाल, कपड़ा-लत्ता सब कितने महँगे हो गये हैं....क्या आप लोग नहीं जानते? हमें भी तो जीना-खाना है, बाबू। बड़े-बड़े सेठ-साहूकारों को तो कोई कुछ नहीं कहता, हम छोटे लोगों को डराना सब जानते हैं।" सुकलू का आक्रोश मुखर होता है।