Thursday, 5 April 2018

अन्याय पर न्याय की विजय-गाथा "आठे जगार" विमोचित



प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त हुईं। गुरुमायँ द्वय हीरामनी एवं भानमती द्वारा गाया गया बस्तर का लोक महाकाव्य "आठे जगार" पुस्तक-रूप में साहित्य अकादमी, नयी दिल्ली से प्रकाशित हो गया और अन्तत: उसकी लेखकीय प्रतियाँ भी आज मिल गयीं। इस पुस्तक के साथ एक डीवीडी भी संलग्न है, जिसमें पुजारी पारा, सोनारपाल की उपर्युक्त दोनों गुरुमायों द्वारा 2005 में गाये गये "आठे जगार" के अलावा खुटीगुड़ा की देवला गुरुमायँ द्वारा 2001 में गाये गये "आठे जगार" के भी कुछ अंश आडियो रूप में और कोंडागाँव के नहरपारा तथा कोपाबेड़ा की गुरुमायँ द्वय सोनो और गुरबारी द्वारा 2015 में गाये गये "आठे जगार" के विडियो हैं। हरिहर वैष्णव द्वारा संकलित, सम्पादित और अनूदित 238 पृष्ठीय इस पुस्तक की कीमत 460.00 रुपये है और यह सॉफ्ट कवर में है। डीवीडी नि:शुल्क है। प्राप्ति-स्थल है : साहित्य अकादमी, विक्रय विभाग, "स्वाति" मन्दिर मार्ग, नयी दिल्ली 110001 पुस्तक का विमोचन हरिहर वैष्णव की पत्नी श्रीमती मायावती वैष्णव द्वारा घर पर ही सादगीपूर्ण वातावरण में किया गया। पुस्तक का आवरण चित्र तथा भीतरी रेखांकन अंचल के सुप्रसिद्ध लोकचित्रकार खेम वैष्णव ने तैयार किये हैं।







बस्तर अंचल के हल्बी परिवेश में तीन लोक महाकाव्य "तीजा जगार" या "धनकुल", "लछमी जगार" और "आठे  जगार" तथा भतरी परिवेश में एक लोक महाकाव्य "बाली जगार" प्रचलन में रहे हैं। यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि इन चारों जगारों के केन्द्र में नारी है। नारी द्वारा ही इनका गायन भी किया जाता है, जिन्हें गुरुमायँ कहते हैं। "आठे जगार" श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव तो है ही किन्तु उससे भी कहीं अधिक यह अन्याय पर न्याय की विजय-गाथा है, आततायियों से मानवता को मुक्त कराने की गाथा है; कारण, रैनी (रइनी) बाबी को अबुड़ असुर के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिये यदि रैनी (रइनी) बाबी के गर्भ से कंस का जन्म होता है तो वहीं कंस के उत्पीड़न से देबकी को मुक्ति दिलाने के लिये किरिस्ना का। मातृत्व का एक और रूप इस महागाथा में "उसी" नामक चिड़िया के प्रसंग में भी देखने को मिलता है। यह नारी को उत्पीड़न से उसकी सन्तान द्वारा मुक्ति दिलाने की महागाथा है।
भगवान श्री कृष्ण की कथा के लोक-रूप का गायन इस जगार के अन्तर्गत किया जाता है। कथा लोक-संस्कृति से अनुप्राणित होती है। इसे बच्चों का पर्व माना गया है। बच्चों के साथ-साथ अन्य श्रद्धालु जन भी इस अवसर पर व्रत रखते हैं। इस जगार की प्रमुख गायिका रही हैं बस्तर (जगदलपुर) जिले में खुटीगुड़ा नामक गाँव की गुरुमाय देवला। इन्हीं की शिष्य परम्परा में आने वाली इसी जिले की सोनारपाल (सिवनागुड़ा) निवासी गुरुमायँ हीरामनी और गुरुमायँ भानमती की ननद गुरुमायँ चमेली अभी भी इस जगार का गायन करती हैं। गुरुमायँ भानमती का असामयिक निधन 2013 में हो गया। प्रकाशित "आठे जगार" इन्हीं दोनों गुरुमायों (हीरामनी और भानमती) की प्रस्तुति है।
19 जनवरी 1955 को अविभाजित बस्तर जिले के दन्तेवाड़ा में जन्मे हरिहर वैष्णव अंचल के लोक साहित्य, विशेषत: वाचिक परम्परा के गंभीर अध्येता के रूप में जाने जाते हैं। बस्तर पर केन्द्रित उनकी अब तक 24 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और 7 प्रकाशनाधीन हैं।

Thursday, 8 February 2018

ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो देवता होय


हरिहर वैष्णव



ढाई आखर प्रेम का पढ़ कर पण्डित होने की बात तो सुनी थी किन्तु देवता होने की घटना हमें छत्तीसगढ़ के जनजाति बहुल अंचल बस्तर में ही सुनायी पड़ती है। केवल इतना ही नहीं किन्तु इनकी विधि-विधान पूर्वक पूजा-अर्चना भी होती है। इनमें से एक प्रेमी युगल है "झिटकू-मिटकी" और दूसरे, दो भाई और दो बहनें हैं, "सोमी-दामी" और "रुनकी-झुनकी"। 
इनमें से "झिटकू-मिटकी" की कथा तो बहुचर्चित है किन्तु शेष चारों की प्रेम-कथा बहुश्रुत नहीं है। कारण, इस कथा के नायक जहाँ जनजातीय समुदाय के हैं वहीं नायिकाएँ गैर जनजातीय समुदाय की। इसीलिये इनकी पूजा-अर्चना मुख्यत: इन्हीं दोनों यानी मुरिया जनजाति तथा कलार जाति के परिवारों में होती है। इनकी यह कथा मुझे ग्राम सम्बलपुर के सुग्रीव पोयाम, जो स्वयं मुरिया जनजाति से थे तथा सोनाबाल के कलार जाति के कँवल सिंह बैद ने कई वर्षों पहले सुनायी थी। 
कथा इस तरह है : वर्षों पहले की बात है, बस्तर अंचल के कोंडागाँव जिला मुख्यालय कोंडागाँव से लगभग दो-एक कोस की दूरी पर मुरिया जनजाति का एक परिवार रहा करता था। इस परिवार में दो भाई थे, सोमी और दामी। एक दिन की बात। दोनों कहीं कमाने-धमाने की सोच कर घर से निकल पड़े। चलते-चलते सम्बलपुर गाँव से लगभग पाँच कोस की दूरी पर सोनाबाल नामक गाँव जा पहुँचे। पूछताछ करते-करते दोनों एक कलार जाति के साहूकार के घर पहुँच गये। कलार बहुत धनवान था। उनके आने पर साहूकार ने उनके आने का कारण पूछा। तब उन्होंने कहा, ""हम कहीं नौकरी करके कमाएँगे, सोच कर घर से निकले हैं।"" तब साहूकार ने उन लोगों को अपने घर नौकरी देने की बात कही। दोनों राजी हो गये।



कलार साहूकार की दो बेटियाँ थीं। इनके नाम थे "रुनकी" और "झुनकी"। रुनकी और झुनकी बहुत ही सुन्दर थीं। सोमी और दामी भी वैसे ही सुन्दर थे। एक-दूसरे को देख कर इनमें आपस में प्रेम हो गया। अब देखते-ही-देखते यह बात यहाँ-से-वहाँ होते-होते साहूकार के कानों तक गयी। सुनकर साहूकार बहुत ही क्रोधित हुआ। गाँव भर के लोगों के बीच चर्चा होने लगी। तब साहूकार ने सोमी-दामी और रुनकी-झुनकी को बुलाया और समझाया। लेकिन ये लोग नहीं माने। "जिएँगे तो साथ और मरेंगे तो भी साथ" कहा। तब साहूकार ने सोमी-दामी को मारने की युक्ति सोची। यह बात सोमी-दामी ने सुनी और स्वयं ही धान की "ढुसी" के भीतर कूद कर आत्म-हत्या कर ली। धान रखने के लिये धान के पुआल को ऐंठ कर बनायी गयी रस्सी (बेंट) को लपेट कर बनाया गया भण्डारण-उपकरण "ढुसी" कहलाता है। 
इधर साहूकार उन दोनों को खोजने लगा। खोजते-खोजते इनका शव धान की ढुसी के भीतर मिला। सोमी-दामी की मृत्यु का समाचार रुनकी-झुनकी ने भी सुना। सुन कर उन दोनों ने भी आत्म-हत्या कर ली। इनके मरने के बाद साहूकार के घर में अनहोनी घटनाएँ होने लगीं। गाँव में भी दैवीय प्रकोप होने लगा।
सिरहा (जिस पर देवी की सवारी आती है) ने तन्त्र-मन्त्र से जान कर बताया कि सोमी-दामी मृत्यु के बाद प्रेत बन गए हैं। अब इनकी पूजा करनी पड़ेगी। कहते हैं कि इसी दिन से सोमी-दामी और रुनकी-झुनकी की विधि-विधान पूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है। 
मार्च-अप्रैल 2003 में जब मैं बस्तर के ऐतिहासिक-पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक सर्वेक्षण के लिये निकला तो सोनाबाल ग्राम के दुर्योधन सेठिया और गोवर्धन सेठिया ने भी यही कथा बतायी किन्तु इन दोनों भाइयों की बतायी कथा में भी कहीं-कहीं पर भिन्नता है। दुर्योधन सेठिया के अनुसार सोनाबाल गाँव में सोमी-दामी देवताओं के "जतरा (वार्षिक पूजा)" का आयोजन उन्हीं के परिवार द्वारा किया जाता है, जिसके लिये किसी से कोई आर्थिक सहायता नहीं ली जाती किन्तु उसमें सभी लोग शामिल होते हैं। आज भी सोनाबाल की कलार जाति के साथ-साथ सम्बलपुर की मुरिया जाति के घरों में सोमी-दामी देवताओं की पूजा की जाती है। सोनाबाल गाँव की मँडई (मेला) में सोमी-दामी देवता भी परिक्रमा करते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि सोनाबाल गाँव के खेतों से धान की चोरी नहीं होती। उन्होंने इस सन्दर्भ में एक घटना बतलायी : "कई वर्षों पूर्व कुछ चोर यहाँ के खेतों से धान की खड़ी फसल काट कर ले जा रहे थे किन्तु देवता के प्रताप से वे गाँव की सीमा भी नहीं लाँघ सके और उनकी वहीं पर मृत्यु हो गयी। तब से किसी ने भी चोरी का दुस्साहस नहीं किया है।"
गोंड जनजाति की मुरिया शाखा में देवतेल चढ़ाने के पहले और दूल्हा या दुल्हन को नहलाने के बाद एक रस्म होती है करसा कोंडी भरने की, अर्थात् कलश में धान भरना। यह रस्म पूरी की जाती है गाँयता-पुजारी के द्वारा। कलश भरने के बाद उसे मण्डप के चारों ओर घुमाया जाता है और फिर उसे भीतर ले जा कर रख देते हैं। इस समय महिलाओं द्वारा गाया जाने वाला गीत गोंडी में "करसा पसिह्ना पाटा" और हल्बी में "करसा कोंडी किंदरातो गीत" कहा जाता है। यह गीत जामपदर, कोंडागाँव (बस्तर-छ.ग.) के सोनधर कोराम और झिटकू राम कोराम (दिनांक 08.01.2006 को ध्वन्यांकित) के सौजन्य से (जो मेरी पुस्तक "बस्तर का आदिवासी एवं लोक संगीत", प्रकाशक : राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत, नयी दिल्ली, 2015 में सम्मिलित है) यहाँ प्रस्तुत है :

री रिलो यो रिलो रिलो री रिलो यो रिलो 
री रिलो यो रिला रिला री रिलो यो रिला
री रिलो यो रिला रिला री रिलो यो रेला
सोमी-दामी दुय भाई माँदर मारते एयेत
सोमी-दामी दुय भाई माँदर मारते एयेत
री रिलो यो रिला रिला री रिलो यो रिला
री रिलो यो रिला रिला री रिलो यो रिला।

(री रिलो यो रिलो रिलो री रिलो यो रिलो। सोमी-दामी दो भाई माँदर बजाते आ रहे हैं।)

Wednesday, 14 October 2015

"हल्बी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति" पर 30-31 अक्टूबर को दो दिवसीय आयोजन जगदलपुर में

"हल्बी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति" पर 30-31 अक्टूबर को दो दिवसीय आयोजन जगदलपुर में

30-31 अक्टूबर को "साहित्य अकादेमी", नयी दिल्ली और "बस्तर विश्वविद्यालय", जगदलपुर के सहयोग से "बस्तर विश्वविद्यालय जगदलपुर, धरमपुरा, बस्तर-छत्तीसगढ़" में बस्तर सम्भाग की प्रमुख लोक भाषाओं में द्वितीय स्थान रखने वाली लोक भाषा, जो रियासत-काल में राज-काज की भी भाषा रही है और यहाँ की सम्पर्क भाषा का भी दर्जा प्राप्त "हल्बी" से सम्बन्धित "हल्बी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति" पर केन्द्रित दो दिवसीय संगोष्ठी का गरिमामय आयोजन होने जा रहा है।
इस आयोजन के कार्यक्रम निम्नानुसार हैं :

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

उद्घाटन सत्र : पूर्वाह्न 10.00 बजे - 11.30 बजे
स्वागत : के. श्रीनिवासराव, सचिव, साहित्य अकादेमी
उद्घाटन वक्तव्य : एन. डी. आर. चन्द्रा, कुलपति, बस्तर विश्वविद्यालय
   
पुस्तक लोकार्पण :

हरिहर वैष्णव की पुस्तक "लछमी जगार" (गुरुमाय केलमनी द्वारा प्रस्तुत बस्तर की धान्य-देवी की महागाथा, मूल हल्बी, हिन्दी अनुवाद के साथ)
सोनसिंह पुजारी की पुस्तक "अन्धकार का देश" (हल्बी के अन्यतम कवि की मूल हल्बी कविताएँ हिन्दी अनुवाद के साथ)
(दोनों ही पुस्तकों के प्रकाशक : साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ली)

बीज वक्तव्य : महेंद्र कुमार मिश्र, वाचिक और जनजातीय साहित्य के विद्वान
अध्यक्षीय वक्तव्य : विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, अध्यक्ष, साहित्य अकादेमी
विशिष्ट अतिथि : रामसिंह ठाकुर, सुप्रसिद्ध हल्बी कवि
धन्यवाद ज्ञापन : अन्विता अब्बी, निदेशक, वाचिक और जनजातीय साहित्य केन्द्र, साहित्य अकादेमी

प्रथम सत्र : मध्याह्न 12.00 बजे - 1.30 बजे

अध्यक्ष : हरिहर वैष्णव
आलेख : यशवंत गौतम/हल्बी का लिखित साहित्य : दशा एवं दिशा
विक्रम सोनी/हल्बी का भाषा वैज्ञानिक पक्ष एवं लिपि
शिवकुमार पाण्डेय/हल्बी और छत्तीसगढ़ी में अंतर्संम्बंध
बलदेव पात्र/हल्बी और हल्बा संस्कृति
खेम वैष्णव/हल्बी परिवेश में लोक चित्र-परम्परा

द्वितीय सत्र : अपराह्न 2.30 बजे - 4.30 बजे

अध्यक्ष : महेंद्र कुमार मिश्र
आलेख : सुभाष पाण्डेय/हल्बी रंगमंच : कल, आज और कल
बलबीर सिंह कच्छ/हल्बी लोक संगीत की दशा एवं दिशा
नारायण सिंह बघेल/हल्बी परिवेश के लोक-नृत्य
रुद्रनारायण पाणिग्राही/हल्बी परिवेश के त्यौहार एवं उत्सव
रूपेन्द्र कवि/मानव विज्ञान की दृष्टि में हल्बा जनजाति

तृतीय सत्र : अपराह्न 5.00 बजे - 6.00 बजे
कहानी पाठ : एम. ए. रहीम
शोभाराम नाग

शनिवार, 31 अक्टूबर 2015

चतुर्थ सत्र : पूर्वाह्न 11.00 बजे - 1.30 बजे
कविता पाठ : सोनसिंह पुजारी
जोगेन्द्र महापात्र "जोगी"
शकुंतला तरार
नरेन्द्र पाढ़ी
सिकंदर खान "दादा जोकाल"
अर्जुन नाग
तुलसी राम पाणिग्राही
बालकिशोर पाण्डे
गिरिजानन्द सिंह ठाकुर
घनश्याम सिंह नाग
हरिहर वैष्णव
डी. एस. बघेल

लोक : विविध स्वर : अपराह्न 2.30 बजे - 6.00 बजे
लछमी जगार/मुँडागाँव के कलाकारों की प्रस्तुति
गीति कथा/मारेंगा गाँव के कलाकारों की प्रस्तुत
खेल गीत/सिंगनपुर गाँव के कलाकारों की प्रस्तुति
लोक नृत्य/माता रुक्मणि सेवा संस्था की प्रस्तुति

अत्यन्त विनम्रतापूर्वक निवेदन करना चाहूँगा कि बस्तर की "पहचान" केवल कुछ देशी-विदेशी लेखकों-पत्रकारों-मानवविज्ञानियों या संस्कृतिकर्मियों के अनुसार "घोटुल" ही नहीं है। उस बेतुके पहचान से उबरने और बस्तर की वास्तविक पहचान पाने के लिये आपको इस कार्यक्रम में अवश्य ही शिरकत करना चाहिये, ऐसा मेरा मानना है।
उपर्युक्त कार्यक्रमों पर नज़र डालने पर आप पायेंगे कि "हल्बी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति" पर यह निश्चित ही अपनी तरह का एक अनूठा आयोजन है। मैं इसके लिये साहित्य अकादेमी, विशेष तौर पर इस अकादेमी के "वाचिक एवं जनजातीय साहित्य केन्द्र" की निदेशक प्रख्यात भाषा विज्ञानी और पद्मश्री से अलंकृत आदरणीया प्रो. (श्रीमती) अन्विता अब्बी जी का हृदय से आभारी हूँ। आभारी हूँ शोध-छात्र चिरंजीव श्री अजय कुमार सिंह (लखनऊ) का भी जिनके माध्यम से मैं आदरणीया प्रो. अब्बी जी से जुड़ सका। आभारी हूँ, अकादेमी के सचिव आदरणीय श्री के. श्रीनिवासराव जी और अध्यक्ष आदरणीय श्री विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जी का भी, जिन्होंने इस कार्यक्रम में अपनी सक्रिय सहभागिता दर्ज कराने की स्वप्रेरित इच्छा जतायी और यही कारण है कि यह कार्यक्रम अप्रैल में होते-होते रह गया और अब 30-31 अक्टूबर को इन महानुभावों की गरिमामयी उपस्थिति में होने जा रहा है। आभार बस्तर विश्वविद्यालय के कुलपति आदरणीय श्री एन. डी. आर चन्द्र जी का भी, जिन्होंने इस कार्यक्रम के आयोजन में सहभागिता दर्ज कराने की सहर्ष सहमति अकादेमी को दे कर हम बस्तरवासियों पर उपकार किया है। मुझे आशा है कि अकादेमी और इसका वाचिक एवं जनजातीय साहित्य केन्द्र हल्बी के साथ ही यहाँ की तमाम लोकभाषाओं के प्रति भी ऐसा ही स्नेह बनाये रखेगा और आगे उन पर केन्द्रित कार्यक्रम भी आयोजित करेगा।
उल्लेखनीय है कि पिछले वर्षों में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत, नयी दिल्ली द्वारा इस न्यास में संपादक माननीय श्री पंकज चतुर्वेदी जी के अथक प्रयासों से बस्तर की भतरी, हल्बी, गोंडी और दोरली लोक भाषाओं पर कार्यशालाएँ आयोजित हो चुकी हैं। इनमें से कुछ पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है और कुछ पुस्तकों के प्रकाशन का काम जारी है। मैं ऐसे सभी रचनात्मक आयोजनों का हृदय से स्वागत करता हूँ और सभी के प्रति अपना आभार व्यक्त करता हूँ।
क्या आप नहीं चाहेंगे कि इस कार्यक्रम में, जिसे मैं एक "पवित्र अनुष्ठान" कहना चाहूँगा, अपनी उपस्थिति दर्ज करा कर हल्बी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के बहाने "बस्तर" की आत्मा को बूझें। उसके विषय में जानें, उसे समझें और आत्मसात् करें?


Wednesday, 27 August 2014

बस्तर (छत्तीसगढ़) अंचल के नारी-लोक की महागाथा "तीजा जगार" विमोचित

पूरे दस वर्षों की लम्बी प्रतीक्षा और धैर्य के बाद "तीजा जगार" का प्रकाशन पिछले महीने भारतीय ज्ञानपीठ से हुआ। "तीजा जगार" (गुरुमाय सुकदई द्वारा प्रस्तुत बस्तर, छत्तीसगढ़ अंचल के नारी-लोक की महागाथा) पुस्तक का विमोचन इस महागाथा की गायिका स्वयं गुरुमाय सुकदई कोर्राम के हाथों एक सादे कार्यक्रम में बिना किसी ताम-झाम के कोंडागाँव में सम्पन्न हुआ। पुस्तक का विमोचन करते हुए गुरुमायँ सुकदई भाव-विभोर हो गयीं। उन्होंने कहा कि प्राय: पुस्तकों का विमोचन बड़े-बड़े समारोहों में नामी-गिरामी व्यक्तित्वों के द्वारा किया जाना तो उन्होंने सुन रखा था किन्तु इस अलिखित महागाथा को पुस्तक-रूप में प्रस्तुत करने वाले हरिहर वैष्णव ने बजाय किसी नामी-गिरामी व्यक्तित्व के मुझ जैसी अनपढ़ और ठेठ गँवई-श्रमिक महिला से इसका विमोचन मेरे ही घऱ पर करवा कर मुझे गौरवान्वित किया है। मेरा सम्मान बढ़ाया है। मैं उनके प्रति आभार व्यक्त करती हूँ।


ज्ञात हो कि बस्तर अंचल में चार लोक महाकाव्य वाचिक परम्परा के सहारे पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरित होते आ रहे हैं। इन्हीं चार लोक महाकाव्यों में एक "तीजा जगार" भी है। "आलोचना के अमृत-पुरुष" प्रो. (डॉ.) धनंजय वर्मा जी, जो डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (मध्य प्रदेश) के कुलपति रह चुके हैं, इस पुस्तक के फ्लैप पर लिखते हैं, "वाचिक परम्परा में पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरित  होते आ रहे लोक-महाकाव्य "तीजा जगार" को, नारी के द्वारा, नारी के लिये, नारी की  महागाथा कहना अतिशयोक्ति न होगा। आदिवासी बहुल बस्तर अंचल शुरू से ही मातृ-शक्ति का उपासक रहा है। "तीजा जगार" उसी मातृ-शक्ति की महागाथा है। इसमें नारी का मातृ-रूप ही मुखर है। नारी यहाँ तुलसी का बिरवा रोपती है, सरोवर और बावड़ी खुदवाती है, बाग़-बगीचे लगवाती है तो निष्प्रयोजन नहीं; वह इनके माध्यम से सम्पूर्ण मानवता, जीव-जन्तु और पेड़-पौधों यानि प्राणि-मात्र के लिये अपनी ममता का अक्षय कोष खुले हाथों लुटाती है। वर्षों से पिछड़ा कहे जाने को अभिशप्त बस्तर अंचल के आदिवासियों की नैतिक और सांस्कृतिक समृद्धि का दस्तावेज है, "तीजा जगार"। आदिवासियों की घोटुल जैसी पवित्र संस्था को विकृत रूप में पेश करने वाले विदेशी ही नहीं, देशी नृतत्त्वशास्त्री, साहित्यकार, छायाकार, कलाकार आदि संस्कृति-कर्मियों की दृष्टि से अब तक अछूती "तीजा जगार" महागाथा के माध्यम से हरिहर वैष्णव ने बस्तर की समृद्ध संस्कृति को समग्रता में प्रस्तुत किया है। बस्तर की लोक-संस्कृति और लोक-गाथा को एक नयी रोशनी में उद्घाटित करती उनकी यह शोधपूर्ण प्रस्तुति रचनात्मक अनुसन्धान के नये प्रतिमान भी स्थापित करती है।"
अब थोड़ी-सी बात इस महागाथा के प्रकाशन से पूर्व की। 2003 में प्रकाशित "गुरुमाय सुकदई द्वारा प्रस्तुत बस्तर की धान्य-देवी की कथा : लछमी जगार" की प्रति मैंने अन्य प्रतिष्ठानों के साथ-साथ भारतीय ज्ञानपीठ को भी अवलोकनार्थ भेजी थी। इसे भारतीय ज्ञानपीठ के तत्कालीन निदेशक डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय जी ने गम्भीरता से लिया और 2003 के आखिरी महीने या 2004 के शुरुआती महीने का कोई एक दिन। सवेरे 9 बजे के आसपास उन्होंने मुझे फोन किया। मुझे याद है, उन्होंने फोन पर अपना परिचय देते हुए मुझसे कहा था, "यह आपने क्या कर दिया?"
इतना सुन कर मैं घबरा गया कि मुझसे ऐसा कौन-सा अपराध हो गया कि डॉ. साहब ऐसा कह रहे हैं? मेरा जवाब था, "जी, सर! मैं समझा नहीं।"
वे बोले थे, "आप भारतीय ज्ञानपीठ के विषय में जानते हैं?"
मैंने कहा, "जी सर।"
वे बोले, "आपने अपनी यह पाण्डुलिपि भारतीय ज्ञानपीठ को क्यों नहीं दी?"
मैंने संकोच के साथ कहा था, "सर! मैं इतने बड़े प्रतिष्ठान से छपने का सपना भी नहीं देख सकता।"
फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या इस तरह की और भी गाथाएँ हैं? तब मैंने उन्हें तीन और गाथाओं "तीजा जगार", "बाली जगार" और "आठे जगार के विषय में बताया। इस पर उन्होंने कहा कि मैं इन तीनों महागाथाओं को यथाशीघ्र पूरा कर भारतीय ज्ञानपीठ को भेज दूँ। इनका प्रकाशन वहीं से और एक साथ होगा। और बस! मैं जुट गया इन तीनों ही महागाथाओं के लिप्यन्तरण, संक्षेपीकरण और अनुवाद में। तीनों ही महागाथाएँ भेज दीं और सौभाग्य से तीनों ही महागाथाएँ प्रकाशन हेतु स्वीकृत कर ली गयीं। किन्तु पहले से ही स्वीकृत कई पाण्डुलिपियों के कारण इन महागाथाओं का प्रकाशन विलम्बित होता गया और अन्तत: इस वर्ष इनमें से एक "तीजा जगार" का प्रकाशन हो पाया। शेष दोनों महागाथाओं के प्रकाशन की भी प्रतीक्षा है। उम्मीद है अगले एक-दो वर्षों में इन दोनों महागाथाओं का भी प्रकाशन हो जायेगा।
इस पुस्तक में मूल हल्बी के साथ-साथ हिन्दी अनुवाद भी है, जिससे मूल लोक-भाषा का भी आनन्द आये और अनुवाद का भी। 388 पृष्ठीय इस हार्ड कवर पुस्तक की कीमत 490.00 रुपये है। अंचल के सुप्रसिद्ध लोक चित्रकार और मेरे अनुज खेम वैष्णव के बस्तर की लोक-चित्र-शैली में बने अद्भुत-आकर्षक रेखांकनों एवं उनकी पुत्री, मेरी भतीजी रागिनी के मुख-पृष्ठ से यह पुस्तक सुसज्जित है।