Sunday, 27 May 2012

नन्हें कन्धों पर जीवन का बोझ


आज नवभारत, 26 जुलाई 1984 अंक में प्रकाशित यह रपट : 


आज जब सारे के सारे जंगल काट लिये जा रहे हैं, न केवल बड़े शहरों में बल्कि सुदूर गाँवों में भी ईंधन के लिये लकड़ी की भारी कमी से लोगों को दो-चार होना पड़ रहा है। हालांकि शहरी इलाक़ों में टाल, फ्युल डिपो और निस्तार डिपो आदि की व्यवस्था की गयी है, किन्तु फिर भी यह समस्या मुँह बाए खड़ी है। जंगल के कानून कठोर से कठोरतम हो गये हैं। स्वयं जंगल विभाग के लोगों को भी जलाऊ के लिये काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं यह भी सत्य है कि इस इलाके से आन्ध्रप्रदेश के लिये रोजाना काफी कीमतों पर जलाऊ के ट्रक जा रहे हैं। जिनके पास साधन हैं, उन्हें तो खैर इसकी कोई विशेष चिन्ता नहीं है, किन्तु जो लोग अल्प आय वाले हैं, उन्हें पाँच रुपये (कांकेर में तो दस रुपये) काँवड़ में जलाऊ खरीदना काफी महँगा पड़ रहा है। जलाऊ की किल्लत को देखते हुए लोगों ने प्रेशर कुकर या गोबर गैस संयत्र आदि का प्रयोग करना शुरु कर दिया है। किन्तु यह सुविधा भी हर आदमी नहीं मोल ले पाता और अब उसकी परेशानी निरन्तर बढ़ती जा रही है।
उपभोक्ता की परेशानी तो अपनी जगह है ही, किन्तु उनसे भी अधिक कष्ट है तो लकड़हारों को। विशेषत: उन मासूम लकड़हारों के लिये यह एक जानलेवा समस्या बन गयी है जो कम उम्र के हैं और अभी जिनके खेलने-खाने के दिन हैं। बाहर की बात मैं नहीं जानता, किन्तु यहाँ, बस्तर में, आप देखेंगे आठ-नौ वर्ष की उम्र के बच्चों से ले कर पचास-साठ वर्ष के बूढ़े तक इस व्यवसाय से गहरे जुड़े हैं। यही इनकी आजीविका का प्रमुख साधन है। आदिवासी, जो जंगलों में रहते हैं, अपनी आजीविका के लिये या तो वनोपज संग्रहण करते हैं या फिर जलाऊ बेचने का काम। बहुत से लोगों को यह काम विरासत में ही मिल जाता है। वनोपज-संग्रहण में इनका जितना शोषण हमने किया है, वह इतना स्याह है कि चाह कर भी वे हमें कभी माफ नहीं कर सकते।
बस्तर के कुल आदिवासी-हरिजनों में से लगभग बीस फीसदी लोग जलाऊ इकट्ठा करने से बेचने के काम में लगे हैं। इसमें भी 8 से 15 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों की तथा 45 से 50 वर्ष के लोगों की संख्या ज्यादा है। युवक या तो हमाली या अन्य निर्माण-कार्यों में लगे हुए हैं तथा अधिसंख्य युवतियाँ अन्य विभागीय निर्माण-कार्यों, जैसे लोग निर्माण विभाग, वन विभाग या सिंचाई विभाग के अन्तर्गत कार्य करती हैं। प्रौढ़ एवं वृद्धाएँ सालबीज, महुआ, टोरा आदि वनोपज के संग्रहण में लगी हैं। खेती के काम में भी ये लोग दखल रखते हैं, किन्तु अधिकांश लोगों के पास उनकी खुद की खेती नहीं है। वे दूसरों (अमूमन गैर आदिवासियों) के खेतों में मजूरी करते हैं।
पिछली बार, सम्भवत: 1981-82 में किसी शासकीय योजना के तहत लकड़हारों को अधिकतम लाभ दिलाने के विचार से उन्हें शासकीय काष्ठागारों से 7 रुपये प्रति Ïक्वटल की दर पर बिना चिरी जलाऊ लकड़ी उपलब्ध करायी जा रही थी। योजना यह थी कि लकड़हारे उस लकड़ी को फाड़ कर उपभोक्ताओं को बेचें और शाम को लकड़ी की कीमत 7 रुपये काष्ठागार प्रभारी को अदा कर दें। शेष लाभ लकड़हारों का होगा। किन्तु इस प्रक्रिया से भी लकड़हारों को कोई उल्लेखनीय लाभ, जैसा कि सोचा गया था, नहीं हुआ और लकड़हारे पुन: जंगल से ही लकड़ी ला कर बेचने लगे।
और अब ऐसा नहीं रह गया है कि गाँव के आसपास किसी जंगल से लकड़ियाँ चुनीं और लाकर बेची जा सकें। अब तो लकड़हारों की जान साँसत में पड़ गयी है। आसपास जंगल कहीं नजर ही नहीं आते। साथ में पेज का तुम्बा या बासी भात की पोटली लेकर दूर-दराज के जंगलों में जाना पड़ता है। सुबह जो आदमी जंगल जाता है वह इकट्ठे शाम को ही वापस आ पाता है। जो जल्दी लौट गया वह तो शाम को ही अपनी लकड़ी बेच कर फुरसत पा लेता है, किन्तु जो अँधेरा होने के साथ-साथ या उसके बाद वापस होते हैं, वे दूसरे दिन सुबह ही उसे बेच पाते हैं। फिर सरकारी नुमाइन्दों के उन पर पड़ने वाले दबाव का भय भी उन्हें हमेशा सताता रहता है। कभी काँवड़ की लकड़ी उतार कर घर पर रखवा ली जाती है और कभी कुल्हाड़ी छीन कर उनकी पिटाई तक कर दिये जाने की घटना एक आम बात है। 
आइये, जलाऊ बेचने वाले चंद कम उम्र लकड़हारों से बातचीत करने के बहाने इनकी जिंदगी में झाँकने का प्रयास करें और सोचें कि जब हम इन कम उम्र बच्चों को डरा-धमका कर इनके काँवड़ जबरन उतरवा लेते हैं और उनकी मेहनत के अनुपात में उन्हें कम पैसे थमा कर आत्मतुष्टि महसूसते हैं तब हम कितने मानवीय रह जाते हैं? और तब हमारा सोचना और भी लाजमी हो जाता है जब हमें यह मालूम हो जाए कि ये अधिकांश बच्चे मातृ-हीन या पितृ-हीन हैं और उनके जीवन की एक यही बड़ी भारी कमी ही उन्हें अपनी और अपने परिवार की आजीविका के लिये अपने नन्हें कन्धों पर भारी बोझ ढोने को बाध्य करती है।
संतूराम की उम्र है 12 वर्ष। घर में और तीन भाई तथा एक बहन है। संतूराम के पिता की मृत्यु हो चुकी है। वह तीसरी कक्षा में पढ़ता है। छुट्टी के दिनों में जंगल से लकड़ी ला कर बेचता है। एक काँवड़ जलाऊ की कीमत है पाँच रुपये।
"तुम लकड़ी क्यों बेचते हो?"
"हमारे पास खेती-बाड़ी नहीं है। मेरे पिता भी नहीं हैं। घर का खर्च चलाने के लिये मैं लकड़ी बेचता हूँ।" संतू बतलाता है।
"तुम स्कूल भी जाते हो, तब लकड़ी बेचने के काम से तुम्हारी पढ़ाई नहीं रुकती?"
"नहीं। मैं स्कूल के दिन लकड़ी नहीं बेचता। छुट्टी के दिन जंगल से लकड़ी ला कर बेचता हूँ।"
"अच्छा, लकड़ी लेने वाले मोल-भाव करते हैं या तुम्हारे बताए भाव पर ही लकड़ी ले लेते हैं?"
संतू कहता है, "हमें बच्चा समझ कर भाव कम कराते हैं। लेकिन हमें रुचता नहीं। लोग तो साढ़े तीन-चार रुपये में दो, कहते हैं। कहते हैं कि गट्ठा छोटा है, लकड़ी भी कम है। कई लोग डराते भी हैं। यहाँ तक कि जबरदस्ती काँवड़ खींच कर उतार लेते हैं।" कहते हुए वह रुँआसा हो उठता है।
"तो क्या तुम चुपचाप उन्हें लकड़ी दे देते हो?"
"नहीं, हम वहाँ से हटते ही नहीं। लेकिन ज्यादा डराने पर, वे जितना पैसा दें उसे लेकर चुपचाप चला आना भी पड़ता है।"
"तुम्हारे माँ-बाप तुम्हें लकड़ी बेचने से मना नहीं करते?"
"मना क्यों करेंगे? हम तो उस पैसे को घर में देते हैं। उससे दाल-चावल लिया जाता है न!"
संतूराम गर्मियों और दशहरा-दीपावली आदि की छुट्टियों का पूरा उपयोग लकड़ी बेचने में ही करता है।
तेलंगू नामक एक बालक भी, जिसकी उम्र 10 वर्ष के आसपास है, पितृहीन है। घर में उसकी माँ के अलावा एक भाई और एक बहिन है। वह स्वयं तो पढ़ाई नहीं कर रहा है किन्तु उसका छोटा भाई गाँव के स्कूल में पढ़ने जाता है। वह कहता है कि वह अपने छोटे भाई को "आगे तक" पढ़ाएगा। यह कुछ कम वजन की लकड़ियों का काँवड़ लाता है और चार रुपये में बेचता है।
"तुम जो लकड़ी लाते हो, उसे अपने गाँव में बेचते हो या यहाँ, कोंडागाँव में?"
"वहाँ कौन खरीदेगा लकड़ी? गाँव में तो सभी लोग अपने-अपने लिये खुद ही ले आते हैं। इसलिये हमें यहीं कोंडागाँव में ही बेचने के लिये आना पड़ता है।"
"तो आराम से बिक जाती है या काफी घुमाना-फिराना पड़ता है?"
"नहीं। ज्यादा घूमना नहीं पड़ता। लेकिन सही भाव न मिलने पर किसी-किसी रोज बहुत भटकना पड़ता है।"
"तुम पढ़ने क्यों नहीं जाते...तुम्हारे गाँव में तो स्कूल है न?"
"हाँ, स्कूल तो है। मेरे एक-दो साथी पढ़ते भी हैं। परन्तु मैं नहीं पढ़ता।"
"क्यों?"
"घर वाले गाली देते हैं। हमारे पास खेती-बाड़ी भी नहीं है।"
"कितने साल से यह काम कर रहे हो?"
"दो साल हो गये।"
"रोज लाते हो?"
"हाँ, रोज लाता हूँ तभी तो घर का खर्च चलता है।"
सुदूराम के साथ भी यही समस्या है। उसके भी पिता नहीं हैं। दो वर्ष पहले उनकी मृत्यु हो गयी। तब से वह लकड़ी बेचने का काम कर रहा है। माँ और एक भाई है। वह पढ़ रहा है। दूसरी कक्षा में है। लेकिन वर्ष में आधे से अधिक दिनों तक वह स्कूल जा ही नहीं पाता। जलाऊ के काँवड़ लिये कोंडागाँव आना उसकी विवशता है। वह बतलाता है कि पहले वह छुट्टी के दिनों में ही लकड़ी बेचा करता था। किन्तु जब उसके घर की आर्थिक स्थिति काफी प्रतिकूल हो गयी तब उसे स्कूल से भाग कर भी जलाऊ बेचने के लिये विवश होना पड़ा।
"क्या तुम्हारी माँ कोई काम नहीं करती?"
"करती तो है। मजदूरी करती है। लेकिन उससे क्या होता है?" वह कहता है।
"तुम स्कूल से भाग कर लकड़ी बेचते हो। गुरुजी तुम्हें डाँटते नहीं?" प्रश्न सुन कर वह चुप हो जाता है। उसकी चुप्पी का स्पष्ट अर्थ है, उसकी स्वीकृति। किन्तु डाँट के भय से पेट की भूख न भाग सकती है और न भगाई ही जा सकती। वह कहता है कि ज्यादा गाली-वाली देने पर स्कूल कभी नहीं जाएगा और पढ़ाई छोड़ देगा। केवल पढ़ाई-लिखाई से ही तो काम नहीं चलेगा। पेट भी तो भरना है, न!
फूलचंद की उम्र है 9-10 वर्ष के आसपास। यानी इन सभी बच्चों में सब से कम उम्र का है यह। छोटा भाई पढ़ता है परन्तु वह स्वयं पढ़ाई नहीं कर रहा है। लकड़ी बेचना इसका रोज का काम है।
"तुम्हारा छोटा भाई पढ़ता है। तुम क्यों नहीं पढ़ते?"
"घर वाले मना करते हैं। कहते हैं, दो-दो जने पढ़ कर क्या करोगे? तुम लकड़ी बेचो।"
"तुम्हारे पिता तो काम करते होंगे न?"
"नहीं। वो कोई काम नहीं करते। बस, शराब पी कर झगड़ते हैं खूब। माँ काम पर जाती है। एक बार गाँव के लोग पिताजी को खूब डाँटे तब पिछली बार वो ईंट बनाने का काम कर रहे थे। लेकिन वह भी कुछ दिनों तक ही।"
"तुम यह काम कब से कर रहे हो?"
"एक साल से।"
"तो पूरा पैसा तुम घर में ही दे देते हो?"
"हाँ। कभी-कभी दवाई वगैरह भी खरीद कर ले जाना पड़ता है। अभी भी आठ आने की दवाई ले जाना है। किसी-किसी रोज दो-चार आने की मिठाई भी खा लेता हूँ।"
"कौन सी मिठाई खाते हो?"
"चना-लाई या फिर बिस्कुट-पिपरमेंट।"
"कभी खेलते-वेलते भी हो या नहीं?"
"खेलते हैं न। खो-खो, कबड्डी या गिल्ली-डंडा वगैरह खेल लेते हैं।"
पीलाराम के माता-पिता दोनों हैं। एक भाई भी है। वह अपने पिता के रहते हुए भी लकड़ी बेचता है। इसकी उम्र है लगभग 12 वर्ष। वह बतलाता है कि उसे लकड़ी बेचने में खुशी होती है और वजन ढोना भी अच्छा लगता है। पढ़ाई में न उसकी रुचि है और न उसके घरवालों की। उसके यहाँ पाँच एकड़ खेती है और वह स्वयं भी हल चला लेता है। खाने को तो उनकी खेती और माँ-बाप की कमाई से पूरा पड़ जाता है किन्तु कपड़ों के लिये उसका काम करना ज़रूरी है। इसलिये वह इस काम में लगा हुआ है।
सरादू की उम्र है दस साल। वह अपने पाँच भाई-बहनों और माँ-बाप के साथ रहता है। उसके सभी भाई मजदूरी करते हैं। माँ और बहनें भी करती हैं किन्तु पिता कोई काम नहीं करता। वह बतलाता है कि लकड़ी बेच कर पैसा कमाना उसके लिये इसलिये ज़रूरी है क्योंकि उसके घरवाले कहते हैं कि इतना बड़ा लड़का क्या बिना काम किए, बैठे-बैठे खाएगा? भाई लोग जो कमाते हैं, वह उनके अपने लिये ही पूरा नहीं पड़ता। हालांकि वह पूरे वर्ष भर लकड़ी नहीं बेचता, स्कूल में पढ़ता भी है। तीसरी कक्षा में है। छुट्टी के दिनों में लकड़ी बेचता है।
वह कहता है, "जंगल से लकड़ी लाने पर नाकेदार लोग डराते हैं। टँगिया (कुल्हाड़ी) छीन लेते हैं। मुफ्त में लकड़ी देने को कहते हैं।" 
इसी तरह बारह वर्षीय रैसिंग भी पढ़ाई करने के साथ-साथ छुट्टी के दिनों में यह काम करता है। इस साल वह तीसरी कक्षा में पढ़ रहा है। उसके माँ-बाप तो हैं ही, दो भाई भी हैं। एक घर पर रह कर मजदूरी करता है और दूसरा काष्ठागार में हमाली। 
ये सभी बाल लकड़हारे कोंडागाँव के पास सम्बलपुर नामक गाँव के हैं। सम्बलपुर से कोंडागाँव तक 5-6 किलोमीटर की दूरी अपने नन्हें कन्धों पर भारी वजन लिये तय करते हैं और अपनी, अपने परिवार की आजीविका जुटाते हैं। चाहे कड़कड़ाती ठण्ड हो, चिलचिलाती धूप या घनघोर बरसात, इनका यह काम निरन्तर जारी है और शायद ये आजीवन यही काम करते रहेंगे। इस काम से केवल सरादू, रैसिंग, फूलचंद, पीलाराम, सुदू, तेलंगु या संतूराम ही नहीं जुड़े हैं, बल्कि और भी कई बच्चे हैं जो लगभग इन्हीं की आयु-वर्ग के हैं। ये बच्चे हैं लखमू, मंगतू, चंदरु, मंगिया, सोनधर, कमलू, चैतन और बहुत सारे अन्य लोग। लगभग सभी के साथ एक सी समस्या है। अधिकांश बच्चों के माता-पिता में से कोई एक नहीं है और कई बच्चों के तो न माँ है न पिता। कितनी बड़ी त्रासदी से गुजर रहे हैं ये बालधन! एक दिन में केवल एक काँवड़ जलाऊ बेच कर चार से पाँच रुपये तक प्रति दिन कमाते हैं और अपने परिवार के भरण-पोषण में किसी प्रौढ़ की तरह जी-जान से जुटे हुए हैं। इस उम्र में इतनी प्रौढ़ता इन्हीं विपरीत परिस्थितियों ने ही पैदा की है जो कम से कम हमारे बच्चों में, जो अनेक सुविधाओं के जाल में अँटे पड़े हैं; कभी भी नहीं आ सकती। किन्तु यह भी सत्य है कि बाल-सुलभ चंचलता और हँसमुखता का इस तरह लोप हो जाना भी इन कामकाजी बच्चों के भविष्य के प्रति आशंकाएँ ही पैदा करता है। तब प्रश्न यह पैदा होता है कि आदिवासियों के विकास के लिये जी-जान से जुटी सरकार को क्या पहले इन आदिवासी बच्चों के लिये नहीं सोचना चाहिये? क्या यह एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा नहीं है? और यह भी कि अन्तर्राष्ट्रीय बाल-वर्ष ने इन्हें क्या सौगात दी.....? 

Saturday, 19 May 2012

सोनू


इस बार प्रस्तुत है यह कहानी : 


सोनू बड़ा परेशान था।  इधर पाठशाला के लगने का समय होता जा रहा था और उसकी माँ थी कि अभी तक ऊपर पारा से धान कूट कर लौटी ही नहीं।  कभी-कभी उसे अपने ऊपर बहुत खीझ हो आती।  यह भी कोई ज़िन्दगी है कि एक ढेकी तक नहीं है घर में।  धान कूटना हो तो कोस भर दूर अपनी ही जाति के दूसरे किसी व्यक्ति के घर जाना विवशता ही है।  गाँव के दूसरे ऊँची जात वाले लोगों के घर तो वो लोग जा ही नहीं सकते।  कोई पीछे से आ रहा हो तो अपने को उनके लिए रास्ता छोड़ देना पड़ता है।  पीने के लिये पानी दो कोस से भी अधिक दूरी पर बहती नदी से लाओ या फिर गाँव के गन्दे तालाब का पानी पियो।  वह सोचता; क्या ऐसा नहीं हो सकता कभी कि उसके घर में भी ढेकी लगा ली जाए?  परन्तु यह कैसे होगा!  उसके बाबा गाँव के मुखिया और पटेल-सरपंच के लिए जब जंगल से गाड़ी भर-भर कर लकड़ी ला कर देते हैं तब तो नहीं पकड़ते ये पाइक लोग उन्हें। ...और अपने घर के लिए एकाध लकड़ी ले आएँ तो भला क्यों इन्कार?  लेकिन नहीं!  बाबा तो मानते ही नहीं।  कहते हैं, पाइक लोगों को तुम नहीं जानते।  गाँव के सब बड़े लोग उन्हें बहुत मानते हैं, इसलिए पाइक लोग भी इनका कोई काम नहीं रुकने देते।  हम छोटे लोग हैं बेटा, करम से भी और धरम से भी।  
ऐसे में सोनू को अपने से बड़ी चिढ़-सी हो आती।  तब उसे अनायास ही अपने बोड़ू की याद आ जाती।  भीमकाय देह, जैसे सागौन का भरा-पूरा पेड़।  कन्धे पर हमेशा झूलता हुआ टँगिया और लाल-लाल आँखें; जैसे फरसा का फूल।  गाँव तो गाँव, आली-पाली के लोग तक उनसे दबते थे।  इसी पाठशाला की बात लें।  कितनी उठा-पटक की थी गाँव के तथाकथित मुखियों ने।  कमर कस ली थी पाठशाला के विरोध में।  कहते थे, गाँव के बच्चों को ये गुरुजी लोग बिगाड़ डालेंगे।  कामकाजी बच्चों को सारा दिन पाठशाला में बन्द कर रखने से हमारा भारी नुकसान होगा।  उनकी देखा-देखी गाँव के अन्य लोग भी ऐसी ही बातें करने लगे थे।  गुरुजी को मारपीट कर गाँव से भगाने की पूरी साज़िश भी रच डाली गयी थी।  लेकिन ऐन वक़्त पर उसके बोड़ू सामने आ गये थे।  सन् दस में हुए भुम्काल में सक्रिय रूप से भाग ले चुके थे।  लाल बाबा के ख़ास आदमियों में से थे।  उन्होंने दुनिया देखी थी।  काफ़ी अनुभव था उनको।  उन्होंने लोगों को समझाया था।  उस दिन की एक धुँधली सी याद अभी भी है उसके मस्तिष्क में :


       "क्यों दादा, पढ़ाई-लिखाई से क्या हो जाएगा भला?"  सरपंच ने तब यथा सम्भव विनम्र होते हुए उनसे पूछा था। 
"गियान मिलेगा।  अपना नँगत-गिनहा बिचारने लायक दिमाक बनेगा।"  बोड़ू ने कहा था। फिर ज़्यादा बहस न करते हुए अपना निर्णय सुना दिया था : "यहीं, थानागुड़ी के पास ही बनेगा इस्कुल।  गाँव वाले मिल कर इस्कुल के लिए झोपड़ी बनाएँगे।"  और वे बैठक से उठ गए थे।  किसी में भी हिम्मत नहीं थी कि उनकी बात काट देता।  आख़िर गाँव वालों को इस्कुल के लिए झोपड़ी बनानी ही पड़ी।  गुरुजी के रहने के लिए बोड़ू ने अपने घर पर ही एक खोली दे दी थी।  जब तक वे ज़िन्दा थे, गाँव में सुमता बना रहा।  गाँव के किसी कमज़ोर आदमी के साथ न तो कोई मनमानी कर सकता था और न उनसे बेग़ारी करा पाने का किसी में साहस ही था।  उनकी असमय मृत्यु के साथ ही गाँव की एकता भी बिखर गयी।  गाँव के सम्पन्न लोगों और तथाकथित मुखियों को मनमानी करने की खुली छूट मिल गयी।  बोड़ू ने अपने जीवन-काल में घर का सारा धान-पान समाज-सेवा में लगा दिया था।  अन्याय तो वे पल भर को भी बर्दाश्त नहीं कर सकते थे।  उनसे किसी का दु:ख नहीं देखा जाता था।  जहाँ उसके बोड़ू निर्भीक और साहसी थे, वहीं उसके बाबा हद दर्ज़े तक दब्बू और असहाय क़िस्म के व्यक्ति।


उसने अतीत की यादों को एक झटका दिया और बाहर निकल कर आकाश की ओर ताका।  सूरज ऊपर चढ़ रहा था।  उसने चढ़ते सूरज से यह भाँप लिया था कि अब पाठशाला की पहली घण्टी बजने ही वाली है।  बाबा को यों अकेले कराहते छोड़ कर जाने का वह मन नहीं बना पा रहा था।  फिर उसने अपने-आप को सान्त्वना दी, "सिरहा तो अभी-अभी झाड़-फूँक कर गया है। थोड़ी-सी राहत तो मिल ही गयी होगी बाबा को।  आया भी अब आती ही होगी।  चलो, चल कर बाबा को समझा दूँ और पाठशाला चला चलूँ।  देर होगी तो पाठ निकल जाएगा।"  नहीं, नहीं वह एक भी पाठ नहीं छोड़ना चाहता।  उसे पूरी लगन के साथ पढ़ना है।  उसके बोड़ू और बाबा के सपने को साकार करना है।  
वह भीतर आ गया।  पिता के पास पहुँच कर उनका हाथ थाम लिया और धीरे से बोला : "बाबा, मैं पाठशाला जा रहा हूँ।  बहुत देर हो गयी है।" 
"हाँ बेटा, जा।  अभी तक क्यों नहीं गया?"  पिता ने अस्फुट-से स्वर में कहा।  तभी बाहर से कोटवार की आवाज़ सुनायी पड़ी
"कौन है?"  कहता वह बाहर निकल आया।
"तेरा बाप है, रे?"  कोटवार लगभग चीख़ा।
"हाँ, हैं।"
"ज़रा बुला तो बाहर।"
"उन्हें तीन रोज़ से बुख़ार है।  डसना में पड़े हैं।  उठ नहीं पाते।"  वह जल्दी-जल्दी बोला था।  
लेकिन कोटवार ने जैसे सुना ही न हो।  उसे परे धकेलते स्वयं ही झोपड़ी के भीतर घुस आया था।  "क्यों? बहाना बना रहा है!  चल उठ!  बड़े साहेब का सामान दूसरे गाँव तक पहुँचाना है।"  एक ही साँस में वह बोल गया था।
कथरी में से सिर निकाल कर उसके बाबा ने पहले तो उसे ताका, पहचाना, फिर मरी हुई आवाज़ में कहा : "तीन दिन से जर के मारे डसना पकड़े पड़ा हूँ।  जाँगर में ताकत नहीं रह गयी है।  नहीं चल पाऊँगा, कोटवार।" 
"देख रे! यह बहाना फिर कभी बनाना।  आज तो चलना ही पड़ेगा।"  कोटवार हुज्जत पर उतर आया था।  
"चाहो तो मार डालो, पर मैं नहीं जा पाऊँगा।  माट्टी किरिया कोटवार।  जाँगर थक गया है, एकदम।"  उसके बाबा ने असहाय हो कर कह दिया।
"मैं अच्छी तरह जानता हूँ, तेरे बहाने को।  किरिया खाने में तो ओस्ताज है रे तू।"  कोटवार का स्वर विषैला प्रतीत हो रहा था।  
सोनू देहरी पर खड़ा-खड़ा सोच रहा था। ये वही लोग हैं जिन्हें उसके बोड़ू के रहते उनके सामने मुँह तक खोलने की हिम्मत नहीं होती थी। और आज कैसे बाघ बने दहाड़ रहे हैं...।  सच! समय बदलते देर नहीं लगती।  
"अच्छा, अच्छा ठीक है। ऐसा कर, तू न सही तेरे इस लेका को भेज दे।  थोड़ा-सा ही तो सामान है।  पहुँचा देगा।"  कोटवार कह रहा था।
"वह, वह तो पढ़ने जा रहा है।"  मरी हुई आवाज़ में उसके बाबा बोले।
"पढ़ने जा रहा है...?"  शब्दों को चबाते हुए व्यंग्य पूर्वक बोला था कोटवार : "पढ़-लिख कर लाट साहब बनेगा क्या...?  और फिर आज एक दिन के लिए इस्कुल नहीं भी गया तो क्या डोंगरी गिर जाएगा उसके ऊपर?"  
उसके बाबा ने उसकी ओर असहाय दृष्टि से देखा।  उसने हाथ में रखी स्लेट दीवार से सटा कर रख दी और कोटवार के साथ जाने को तैयार हो गया।  कातर आँखों से ताकते उसके बाबा के मुँह से घरघराती आवाज़ निकली थी : "रहम करो कोटवार।  यह नन्हा-सा लेका कैसे उठा पाएगा बड़े साहेब के सामान का बोझ...?"
कोटवार ने सुना तो बमक उठा : "क्यों बकवास कर रहा है, डोकरा?  न ख़ुद जाने को तैयार है, न लड़के को जाने दे रहा है।  यहाँ कौन तेरा बाप बैठा है, जो आएगा?"  और उसे लगभग घसीटते हुए ले कर बाहर निकल गया।  तब उसे लगा था, काश! वह थोड़ा बड़ा होता।  बिल्कुल अपने बोड़ू की तरह फरसा उठा कर दौड़ पड़ता कोटवार के सिर पर।  उसे अपने बाबा पर भी क्रोध आ रहा था।  बोड़ू-सी मर्दानगी उनमें तिल भर भी नहीं थी।  निरे कायर हो कर ही तो रह गए थे वे। सायगोन और सरगी की तरह छाती तान कर खड़े होने की बजाय लाजकुड़िन की तरह अपने आप में सिमट जाने का लिजलिजापन ही तो समा गया था उनमें।
रास्ते भर चुपचाप चलता रहा।  थानागुड़ी पहुँच कर देखा, बड़े साहेब खाट पर बैठे सल्फी पी रहे थे।  पटेल-सरपंच हाथ बाँधे एक ओर खड़े थे।  मँगतू मामा की जवान लड़की सायती भीतर भोजन राँध रही थी।  बड़े साहब रह-रह कर उधर ताक लेते और जाने कैसे-कैसे इशारे भी कर देते।
कोटवार ने उसे धकियाते हुए भीतर पहुँचा दिया और झापी की ओर इशारा करते हुए कहा : "वो देख, काँवड़ रखा हुआ है।  सज कर और आगे-आगे निकल चल।  नदी उस पार वाले गाँव में पहुँचाना है।  सीधे थानागुड़ी में ही पहुँचाना।  समझे?"  वह सामान देख कर चौंक गया।  किंतु कोटवार को इसका अहसास न होने दिया।  ऊपर से कहा, "ठीक है।"
कोटवार बाहर आँगन में चला गया।
उसने काफी जोर लगा कर झापियाँ उठायी और काँवड़ सज कर लिया।  लेकिन काँवड़ उठा पाना उसके लिए सम्भव नहीं हो पा रहा था।  काफी जोर आजमाईश के बाद भी काँवड़ उससे न उठा।  उसके नन्हे चेहरे पर सावन के महीने में भी पसीने की बूँदें छलछला आयीं।  विवशता और आतंक के कारण उसकी आँखें भी भर आयी थीं।  वह जानता था, कोटवार से कुछ कहने का कोई मतलब ही न होता।  तभी कोटवार ने उसे पुकारा।  वह काँवड़ वहीं छोड़ कर आँगन में निकल आया।  बड़े साहब सल्फी के नशे में उससे पूछने लगे थे :
       "क्या नाम है रे, तेरा?"
       "ज् ज् ज् जी सोनू।"  वह हकलाता हुआ बोला।
       "तेरा बाप क्यों नहीं आया रे.....?"  साहब ने कड़े स्वर में पूछा था।
       "जी, वो बीमार हैं।"  उसने हकलाते हुए, दीन स्वर में जवाब दिया।
       "क्यों, क्या हो गया है?" साहब ने सल्फी का गिलास खाली करते हुए लापरवाही से पूछा।
       "बुखार है साहब, तीन दिन से।"  उसका स्वर रुआँसा हो गया था।
       "तू उठा पाएगा काँवड़.....?"  साहब ने मुर्गे की टँगड़ी चबाते, अविश्वास से पलकें झपकाते हुए पूछा था।
       ".............."  वह सिर नीचा कर चुप हो गया।  कुछ बोलते नहीं बना उससे।
       "अरे, बोलता क्यों नहीं।  गूँगा है क्या.....?"  बड़ी तीखी आवाज थी साहब की।  इसके पहले कि सोनू कुछ बोलता, कोटवार बोल उठा था, "उठा लेगा साहब।  यही काम करते चले आ रहे हैं ये लोग।"
       सरपंच को सोनू के बोड़ू की याद आ गयी थी।  व्यंग्य से बोला था : "यह तो साहब बनने के सपने देख रहा है, हजूर।  इस्कुल में पढ़ता है....। इसके बोड़ू ने बनवाया था न।"
       उसे लगा था, सरपंच के मन में बरसों से जमा मैल बाहर निकल रहा है।
       "अच्छा.....! पढ़ता है.....?"  साहब भी व्यंग्य से मुस्कराए थे, "क्या करेगा रे पढ़ कर.....?"
       "तसिलदार बनूँगा।"  उसके मुँह से जाने कैसे यकायक निकल गया।  सभी ही-ही करके हँसने लगे।  उसे लगा, वह गलत बोल गया है।  उसके बोड़ू उससे यही कहा करते थे, "तुझे पढ़ा-लिखा कर तसिलदार बनाऊँगा।"  शायद उसके अवचेतन में रह गयी वही बात आज फूट पड़ी थी।  वह उन्हें हँसता देख वहाँ से हट गया था।  तब से लगातार सोचता रहा और मन ही मन दुहराता रहा, "मैं तसिलदार बनूँगा।" 
       "अब वहाँ खड़ा-खड़ा क्या मुँह ताक रहा है?  चल जल्दी से काँवड़ उठा और भाग।"  कोटवार उसकी ओर बाज की तरह झपटा था।
        वह कमरे में वापस पहुँचा तो वही भारी-भरकम बोझ सामने था।  जानता था, "नहीं" कहा और कोटवार उसके देव-धामी तक को नहीं छोड़ेगा।  थोड़ी देर खड़ा रहा, फिर पिछला दरवाजा धीरे से खोल कर घर की राह भाग लिया।  वहाँ से भागा तो जरूर लेकिन उसका डर बढ़ गया था कि कोटवार उसे और प्रताड़ित करेगा।  हुआ भी वही।  अभी उसे घर पहुँचे कुछ ही पल बीते थे, कि कोटवार डण्डा फटकारता उसके घर पहुँच गया था।  वह धान-ढुसी के पीछे जा छिपा था।  उसने वहीं से सुना, कोटवार गरिया रहा था : "अरे ठगों की औलाद!  हुकुम उदूली करने की हिम्मत कहाँ से पा गये?  बाहर निकल रे।"
       उत्तर में उसके बाबा की घरघराती आवाज़ सुनायी दी थी : "क्या बात है कोटवार, किसलिए नाराज हो रहे हो?"
      "कामचोर! पूछता है, नाराज क्यों हो रहा हूँ?  तेरा लेका सामान छोड़ कर थानागुड़ी से भाग गया.....नहीं जानता क्या?  चल उठ, सीधे से सामान अमरा दे।  नहीं तो आज...!" कहते कोटवार फड़की ठेल कर भीतर आ गया था और डण्डे से उसके बाबा के शरीर को कोंच रहा था।  उसके बाबा से तो उठा नहीं जा रहा था।  नहीं उठ सके तो कोटवार ने कस कर उनकी पिटाई कर दी और हाँफते-गरियाते हुए बाहर निकल गया।
       सोनू ने जब देखा कि कोटवार अब जा चुका है, तो वह भीतर से निकल कर अपने बाबा के पास आया।  देखा, सारे शरीर पर डण्डे के निशान उभरे हुए थे और बाबा अचेत-से हो गये थे।  वह किंकत्र्तव्यविमूढ़-सा हो गया था।  अपने बाबा से चिपट कर रोता रहा।  रोते-रोते उसे कब नींद आ गयी, पता ही नहीं चला। उसकी नींद तब टूटी जब उसकी आया ने उसे जगाया।  उसने देखा, उसकी आया बाबा की सिंकाई कर रही थी और सिसक-सिसक कर कोटवार को सरापती भी जा रही थी।  उसके मन में संकल्प भर उठा था, "बदला लूँगा।  बोड़ू जैसा ही बनूँगा...बोड़ू जैसा ही बनूँगा।"  वह बुदबुदाने लगा था, "बोड़ू! मुझे आशीर्वाद दो, मुझे ताक़त दो बोड़ू अपनी तरह।  मुझे शक्ति दो....मुझे शक्ति दो....मुझे शक्ति दो।"  और उसकी निगाह छत पर खोंस कर रखे गये बोड़ू के पैने टँगिये की ओर स्वत: ही उठ गयी।  लगा, एक और भुम्काल का बीज बो दिया गया है। 


टिप्पणी : 

ढेकी : धान कूटने का ग्रामीण संयन्त्र।
पाइक : सरकारी मुलाज़िम।
बोड़ू : ताऊ।
टँगिया : कुल्हाड़ी।
फरसा : पलाश।
आली-पाली : आसपास।
भुम्काल : जनक्रान्ति।
लाल बाबा : बस्तर में सन् 1910 में हुई जन-क्रान्ति के सूत्रधारों में से एक और राज परिवार से सम्बद्ध लाल कालेन्द्रसिंह (कालीन्द्र सिंह)।
नँगत-गिनहा : अच्छा-बुरा।
सुमता : सुमति।
सिरहा : वह व्यक्ति जिस पर देवी आती है।
आया : माँ।
डसना : बिस्तर।
जर : ज्वर।
जाँगर देह।
माट्टी कीरिया : माटी की सौगंध।
ओस्ताज : उस्ताद।
लेका : लड़का।
डोंगरी : पहाड़।
डोकरा : बूढ़ा।
फरसा : परशु।
सायगोन-सरगी : सागौन और साल के पेड़।
लाजकुड़िन : लाजवन्ती।
काँवड़ : काँवर।
सल्फी : ताड़ प्रजाति के सल्फी नामक पेड़ से निकलने वाला मादक रस।
झापी : बाँस से बना गोल और बड़ा सा सन्दूक।
सज : तैयार।
धान-ढुसी : धान भण्डारण के लिये पैरा (पुआल) से बनी रस्सी को गोल-गोल लपेट कर बनाया गया पात्र।
तसिलदार : तहसीलदार। 
फड़की : बाँस से बना दरवाजा।
अमरा : पहुँचा। 
सरापती : शाप देती (सराप : शाप)। 

Saturday, 12 May 2012

लोगों को ढोते लोग



इस बार अमृत संदेश, 30 अक्तूबर 1984 अंक में प्रकाशित यह रपट : 


छोटे शहरों और शहराते हुए कस्बों में, जहाँ अभी टैक्सियों, आटोरिक्शों या ताँगों का प्रचलन (ताँगे तो वैसे भी इने-गिने शहरों में ही चल रहे हैं और उनके दिन भी अब लद गये हैं) शुरु नहीं हुआ है, स्थानीय ठिकानों तक जाने-आने के लिये रिक्शे ही आम साधन के रूप में इस्तेमाल किये जा रहे हैं। टैक्सी आज भी ऊँचे तबके के लोगों के लिये ही सुलभ है, जबकि रिक्शा हर आम-ओ-खास के लिये समान रूप से। 
रायपुर में अधिकांश रिक्शा-चालक ओड़िसा प्रान्त या सीमावर्ती इलाक़ों से आये लोग ही हैं। कम से कम पन्द्रह और उधर अधिकतम आयु-सीमा 50 वर्ष तक के लोग रिक्शा चला कर अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं। रिक्शा वालों के विषय में यह आम धारणा है कि वे सवारियों से, विशेषत: नयी सवारियों से ज्यादा पैसे ऐंठते हैं और अपने पारिश्रमिक के मामले को लेकर झगड़ते भी हैं। लेकिन इसके पीछे सच क्या है, इस पर विचार करने की कोशिश हम नहीं करते।
रायपुर की एक घटना याद आती है। मुझे जिलाधीश कार्यालय से न्यू शांतिनगर (नंदा दीप के पास) अपने एक सम्बन्धी के यहाँ जाना था। वैसे भी मेरा रायपुर जाना कभी-कभार ही हो पाता है, इससे वहाँ के रिक्शों की दर के विषय में कुछ मालूमात नहीं थी मुझे। बहरहाल, मैंने एक रिक्शेवाले से पूछा तो वह बोला, बहुत दूर है साहब। चार रुपये लगेंगे। मैं बैठ गया। वहाँ पहुँच कर उसे मैंने पाँच का नोट थमाया तो वह अपने चार रुपये काट कर एक रुपया मुझे वापस देने लगा। मैंने कहा, रख लो भाई। चाय पी लेना। वह हतप्रभ हो उठा। उसकी निगाहें झुक गयीं। वह धीमे से बोला, "साब माफ कीजिये, मैं आपसे ज्यादा पैसे ले रहा था। मुझे आप केवल दो रुपये दे दीजिये।" अब मैं चकित! "क्यों भाई, अभी तो तुमने चार रुपये कहा था। अब अचानक दो रुपये कम कैसे बोल रहे हो?"
वह बोला, "क्या करें साहब, कई किस्म के लोगों से पाला पड़ता है। लोग चार-चार आने तक के लिये चिक-चिक करते हैं। रुपया बताओ तो आठ आना बोलते हैं। इसलिये हम सही रेट से कुछ ज्यादा ही बताते हैं। तब जाकर लोग हमारे सही रेट का पैसा देते हैं। और यदि हम सही रेट बताएँ तो हमें तो उसका आधा भी नहीं मिलेगा शायद। मैंने सोचा कि आप भी मोल-भाव करके दो-ढाई रुपया थमाओगे, इसलिये चार बोलना पड़ा था।"
मेरे काफी जिद करने पर भी उस रिक्शा-चालक ने दो रुपये से एक भी पैसा अधिक लेना मंजूर नहीं किया। वह एक युवक था। ओड़िसा से रोजी-रोटी की खोज में आया हुआ। मेरी उससे अधिक बातचीत भी नहीं हो पायी और मैं उस भले आदमी का नाम तक न पूछ सका। अब यह अलग बात है कि उतनी दूरी के लिये शायद निर्धारित दर उससे भी कम हो या उतनी ही। 
अब प्रश्न उठता है कि क्या उस रिक्शा-चालक का कथन सही नहीं है? हम अपने भीतर झाँकें तो मालूम होगा कि वाकई उसका कहना एकदम ठीक है। दरअसल हम जरूरत से ज्यादा अव्यावहारिक हो चुके हैं। इतना ही नहीं, हमने अपना विश्वास भी खो दिया है। दूसरों पर आसानी से हम विश्वास भी नहीं करना चाहते। अब इसके पीछे कोई कारण नहीं है, ऐसी बात भी नहीं।
ठीक है कि हम पैसा देते हैं, इसलिये सवारी तो करना ही है। लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि मानवीय दृष्टिकोण को हम एकदम ताक पर रख दें। ऐसी कई बातें इनके साथ होती हैं, जब सोचने पर विवश होना पड़ता है कि क्या ये लोग इन्सान नहीं? या कि हमारी ही इन्सानियत कहीं गहरे कूप में खो गयी है? कड़ाके की सर्दियों में भी ये लोग केवल एक-एक कपड़े में लिपटे रात में रिक्शा खींच रहे होते हैं, बरसात में छाता या रैनकोट के बगैर भी अपना काम कर लेते हैं। गर्मियों में जब हम-आप पंखे या कूलर की ठण्डी हवा ले रहे होते हैं, ये देह का पसीना भी नहीं पोंछ पाते और हमारा-आपका बोझ ढोने में लगे होते हैं। रात में भी चैन नहीं; कभी फुरसत नहीं। और फिर फुरसत या आराम का मतलब है खाने में उस दिन नागा होना। कौन चाहेगा ऐसी फुरसत जो उसे भूखा-प्यासा रखे? बस.....इसलिये युवक तो युवक, वृद्ध भी दिन-रात की चिन्ता किये बगैर लोगों का बोझ ढोने में लगे हैं। 
अभी उस रोज का दृश्य मेरी आँखों के सामने उभर आया है.....
कोंडागाँव की बात है। एक सज्जन काफी भारी डील-डौल के थे और जंगल विभाग के किसी नीलाम में जा रहे थे। एक काफी बूढ़ा रिक्शा-चालक उनके भारी शरीर को लिये उसे चढ़ाव की ओर नहीं खींच पा रहा था। पानी काफी जोरों से बरस रहा था। उन सज्जन के पास छाता तो था, किन्तु वे उसे न तो रिक्शा-चालक को दे रहे थे न स्वयं नीचे उतर रहे थे। हार कर बूढ़े रिक्शा-चालक ने उनसे विनती की कि वे थोड़ी देर के लिये रिक्शे से उतर जायें, तब तक बरसात भी थोड़ी थम जाएगी और वह भी जरा देर सुस्ता लेगा। किन्तु यह देख कर आश्चर्य हुआ कि वे सज्जन (?) उस बूढ़े पर बिगड़ पड़े। उल्टी-सीधी गाली दी और बोले, "पैसा हराम का देते हैं क्या हम? जब रिक्शा नहीं चलाया जाता तो छोड़ क्यों नहीं देते यह काम?" बूढ़ा कुछ न बोला। उसके दयनीय चेहरे पर गजब की करुणा उभर आयी थी। अचानक पता नहीं उसमें कहाँ से इतनी ताकत आ गयी कि वह पूरा जोर लगाता, पानी में भीगता रिक्शा खींचने लगा। लेकिन अपनी पूरी कोशिशों के बावजूद वह उसे अधिक दूर न खींच सका तो वह महाशय उतरे और उसे पैसे दिये बगैर ही चलने लगे। बूढ़ा चिल्लाने लगा। हमने रिक्शे वाले का पक्ष लिया तो वे धर्मावतार पहले तो हम पर बिगड़े, फिर बड़ी मुश्किल से एक रुपये का नोट सड़क पर फेंक कर आगे बढ़ गये। यह है हमारी इन्सानियत.....! और मजे की बात ये कि ये लोग इस किस्म के शोषण की शिकायत भी नहीं कर सकते। और करें भी तो किससे? पुलिस से.....? उस पुलिस से, जिसके पास आम आदमी की समस्याओं को दूर करना तो दूर की बात है, सुनने की भी फुरसत नहीं। रिक्शे वालों की शिकायत है कि रिक्शे की सवारी करके, बाद में पैसे न देना, गाली-गलौज करना और बात-बेबात परेशान करना, नजराना वसूलना एक आम बात है। ये बेचारे रिक्शे वाले, जो अपनी रात-दिन की हाड़तोड़ मेहनत के बाद औसतन पन्द्रह रुपये प्रतिदिन कमा पाते हैं; अपने परिवार का पेट पालें या इन्हें नजराना दें?
पिछले दिसम्बर में एक हवलदार के दुव्र्यवहार को लेकर यहाँ के रिक्शा-चालकों ने एक दिन की हड़ताल कर दी थी। किन्तु नागरिकों और प्रशासन के हस्तक्षेप से यह हड़ताल वापस ले ली गयी। फिर प्रश्न यह भी उठता है कि हड़ताल से स्वयं रिक्शा-चालकों के अलावा और किसका नुकसान हो सकता था भला....?
यहाँ के रिक्शा-चालकों ने अपना एक संघ भी बना लिया है। स्वरोजगार योजना के तहत सहायता प्राप्त सत्रह लोगों ने मुख्य संगठन के नीचे एक शाखा बना ली है। इस शाखा के अध्यक्ष हैं रघुनाथ, जबकि मुख्य संगठन के अध्यक्ष सुरितराम साहू हैं। कोषाध्यक्ष हैं सुकलुराम और सचिव हैं नंदलाल साहू। ये सत्रह लोग जिन्हें उक्त योजना के अन्तर्गत रिक्शा खरीदने के लिये सहायता मिली है, सरकार के प्रति आभारी हैं। उनके विषय में संघ के अध्यक्ष रघुनाथ बतलाते हैंै : हमारे कुछ साथियों को सरकार ने सहायता दी है। इनमें कोदीराम, मोहन, सुरितराम आदि हैं। इनको एक रिक्शा सोलह सौ रुपये में पड़ा। लेकिन रुपये एकमुश्त नहीं देना है, धीरे-धीरे करके चुकाएँगे। यह बड़ी सहूलियत है। जब पूरा पैसा पट जाएगा तब ये रिक्शे इनके खुद के हो जाएँगे। आगे उन्होंने बताया, इस सहायता को प्राप्त करने में थोड़ा समय तो लगा, परेशानियाँ भी आयीं, किन्तु मिल गयी; इसका सन्तोष है।
तुलाराम की उम्र है 15 वर्ष। यह अभी साल भर से ही रिक्शा चला रहा है। पढ़ रहा था। चौथी कक्षा तक पढ़ने के बाद स्कूल जाना बन्द कर दिया। अपना और परिवार का पेट पालने के लिये कोई न कोई काम करना ज़रूरी था ही। किराये का रिक्शा ले कर चलाता है। कुछ ज्यादा कमाई नहीं हो पाती, क्योंकि रिक्शे का किराया भी इसी में से देना पड़ता है। खुद का रिक्शा लेना चाहता है, किन्तु पास में पैसे नहीं हैं और आजकल रिक्शे की कीमत भी काफी हो गयी है। हाँ, सरकार से सहायता मिलने पर जरूर खरीदेगा।
"इतना भारी वजन ढोते तुम्हें तकलीफ नहीं होती?"
"तकलीफ कैसे नहीं होगी? लेकिन क्या करें, पेट के लिये करना ही पड़ता है। नहीं करेंगे तो कौन मुफ्त में खाना-कपड़ा लाकर देगा?"
"क्या रात में भी रिक्शा चलाते हो?"
"हाँ, रात में भी चलाना पड़ता है। जोहन भी चलाता है रात को।"
"आगे भी यही काम करते रहोगे, या कोई दूसरा काम करने का इरादा है?"
"कोई भी काम करो, मतलब तो एक ही है। पेट तो पालना ही है किसी तरह।"
"हफ्ते में किसी दिन छुट्टी मनाते हो कि नहीं?"
"कोई छुट्टी नहीं। रोज कमाते हैं, तब तो खाते हैं। छुट्टी मनाएँगे तो खाएँगे क्या.....?"
रघुनाथ की उम्र है पैंतीस से अड़तीस वर्ष के बीच। वह पिछले 15 वर्षों से रिक्शा चला रहा है। पहले वह किराये का रिक्शा चलाया करता था, फिर लगभग दस-बारह वर्ष पूर्व उसने कोंडागाँव के पास सम्बलपुर नामक गाँव के एक व्यक्ति से सात सौ पचास रुपये में रिक्शा खरीद लिया। वह बतलाता है कि उसे सरकार से कोई सहायता नहीं मिली थी। रिक्शे की कीमत उसने धीरे-धीरे करके अपनी कमाई से ही पैसे बचा कर चुकायी है। रघुनाथ के बाल-बच्चे नहीं हैं। वह और उसकी पत्नी है केवल। वृद्ध पिता और भाई-बहन भी हैं। पिता अभी भी मजदूरी करते हैं। दो भाई, मनीराम और रतन भी उसके साथ रिक्शा चलाने का काम करते हैं। रघुनाथ का कहना है कि वह सुबह 8 बजे से शाम 6-7 बजे तक ही काम करता है। बाद में सीधे घर जाकर आराम करता है। दो ही जने तो हैं कुल मिला कर। "क्या करना है ज्यादा हाय-हाय करके भी?" वह कहता है।
सुकलू की उम्र 55 से 60 के बीच होगी। ये पिछले कई सालों से रिक्शा चला रहे हैं। इन्होंने भी रघुनाथ की ही तरह, किन्तु कम कीमत में, यानी सात सौ रुपये में सात वर्ष पूर्व रिक्शा खरीद लिया था। रुपये धीरे-धीरे करके चुकाये। इनके तीन लड़के हैं। तीनों ही मजदूरी करते हैं। सुबह 8 बजे से शाम पाँच-साढ़े पाँच बजे तक ही ये रिक्शा चलाते हैं। अधिक परेशानी मोल लेना इन्हें भी नहीं रुचता। 
प्रतिदिन की आय के बारे में इन लोगों का कहना है कि वे लोग औसतन पन्द्रह रुपये तो कमा ही लेते हैं। हाँ, कभी-कभी आमद कम होकर दस रुपये तक भी उतर जाती है और बाजार के दिनों में दस से बढ़ कर पचीस तक भी पहुँच जाती है। पन्द्रह रुपये में से दस रुपये तो रोज खर्च हो ही जाते हैं। बड़ा परिवार हुआ तो सारे के सारे रुपये खर्च हो जाते हैं और खाने को भी पूरा नहीं पड़ता। ऐसे में अपने आराम की चिंता किये बगैर रात में भी रिक्शा चलाना पड़ता है। सारा खर्च चलाने के लिये ज़रूरी है। कुछ पैसे कपड़ों के लिये भी बचा कर रखना पड़ता है। कभी कोई सगा-सम्बन्धी आ जाए तो ये पैसे खर्च भी हो जाते हैं। शाम को थकान दूर करने के लिये शराब का सहारा लेना ये अपनी विवशता बताते हैं। 
"क्यों रघु, तुम नहीं जानते कि शराब से कितना नुकसान होता है शरीर को?" मैं यह पिटा-पिटाया प्रश्न करता हूँ रघुनाथ से, तो उत्तर देते हैं सुकलू : "नुकसान तो बाद में होगा, बाबू। सभी जानते हैं यह बात। लेकिन दिन भर की थकान को कैसे मिटाएँ? शाम को थोड़ी सी पी लेते हैं तो बदन का दर्द कम हो जाता है और नींद भी आ जाती है।"
"तो क्या रोज पीते हो?"
"हाँ, रोज ही पीना पड़ता है। लेकिन ऐसा भी नहीं कि इतना पी लें कि आदमी ही न रह जाएँ। नहीं, नहीं ऐसे नशा से भी क्या फायदा? दवा के रूप में थोड़ी सी पी ली.....बस।"
"सवारियों की, विशेषकर बाहर से आने वालों की शिकायत है कि कोंडागाँव के रिक्शा-चालक काफी ज्यादा पैसे लेते हैं। क्या यह सही है?" मैं उनका ध्यान इस ओर खींचता हूँ।
रघुनाथ कहता है : "कहने को तो कुछ भी कह देते हैं लोग। जबकि सही बात यह है कि हम निर्धारित दर ही लेते हैं। और यह जो आप कह रहे हैं न, वो बात हर कोई तो नहीं बोलता। कुछ लोग जरूर ऐसा कहते हैं, क्योंकि वे स्वयं ही निर्धारित दर से भी कम पैसे देते हैं। जब हम दर की बात करते हैं तो उन्हें वह ज्यादा लगती है।"
"अच्छा, और ये झगड़े वाली बात?"
"कौन से झगड़े की?"
"यही कि रिक्शेवाले सवारियों से झगड़ा करते हैं।"
"नहीं। आप गलत कह रहे हैं। झगड़ा हम करते नहीं, करने को मजबूर किये जाते हैं। और बात होती है वही दर की। लेकिन हर कोई झगड़ा नहीं करता। कुछ लोग जो उसी प्रवृत्ति के होते हैं, वे ही परेशान करते हैं। और फिर हमारी मेहनत की सही कीमत हमें न मिले तो क्या हमें बुरा नहीं लगेगा? अच्छा, फिर अगर आपको रिक्शों की दर ही कम कराना है तो पहले जो महँगाई बढ़ गयी है न, उसे तो कम कराइये। चावल-दाल, कपड़ा-लत्ता सब कितने महँगे हो गये हैं....क्या आप लोग नहीं जानते? हमें भी तो जीना-खाना है, बाबू। बड़े-बड़े सेठ-साहूकारों को तो कोई कुछ नहीं कहता, हम छोटे लोगों को डराना सब जानते हैं।" सुकलू का आक्रोश मुखर होता है।

Saturday, 5 May 2012

नारायणपुर : यहाँ आदिवासी नहीं है



और इस बार प्रस्तुत है "नवभारत", 23 फरवरी, 1984 अंक में प्रकाशित यह रपट : 


आपके सामने एक भीमकाय व्यक्ति जो आदिवासी है और निपट ग्रामीण वेश-भूषा में है, चकाचौंध से हतप्रभ भी; उसे एक निपट दुबला-पतला शहरी बिला वजह डाँट देता है और उस आदिवासी के चेहरे पर करुणा उभर आती है। कैसा महसूस करते हैं आप.......?

दो-एक चित्र देखिये। नकारात्मक भी और सकारात्मक भी :

हम बस में बैठे हैं। कोंडागाँव से नारायणपुर के लिये। बस चल पड़ती है। चालक तो रोज ही बदलते हैं बस में। किन्तु एक चेहरा इन वनवासियों का न केवल जाना-पहचाना है, बल्कि किसी बिन्दु पर बेहद आत्मीय भी। आदिवासी इस चेहरे को मिरजा (मिर्ज़ा) के नाम से जानते हैं। 52 किलोमीटर के इस जंगली रास्ते में राह चलता हुआ ऐसा कोई भी आदिवासी नहीं होगा जिसके हाथ मिर्जा भाई को नमस्कार करने के लिये बेहद आत्मीयता से न उठते हों। और भाई मिर्जा भी ऐसे कि बस चालन कर रहे हैं, सामने से कोई दूसरी गाड़ी आ रही है और उसे "साइड" देना हो या फिर पीछे से आती गाड़ी को "ओव्हरटेक" करने देना हो, हर हाल में इन आदिवासियों की नमस्ते का जवाब हाथ उठाकर देंगे ही। एक बात और काबिले गौर। बच्चों को पाठशाला में भर्ती करवाने और उनमें पढ़ाई के प्रति ललक पैदा करने में भी श्री मिर्जा जी का काफी योगदान है। पाठशाला के समय पर रास्ते में आने वाले गाँवों के बच्चों को पाठशाला तक मुफ्त पहुँचाने और पाठशाला छूटने के बाद वापस गाँव पहुँचाने की भी इनकी "रुटिन" रही है। बस में बैठने की लालच में ही सही, आदिवासी बच्चे पाठशाला जाना सीख गये.... यही क्या कम सहयोग है भाई मिर्जा जी का। मैं उन्हें लगातार चौदह-पन्द्रह बरसों से इसी रूप में देखता आ रहा हूँ।
इतनी आत्मीयता उन्हें कैसे मिली.... यह हमारे-आपके लिये उनसे सीखने की चीज है। बड़े-बुजुर्गों को उन्हें नमस्कार करता देख बच्चे भी उनका अनुसरण करते हैं और मिर्जा भाई इन बच्चों को भी उतना ही महत्त्व देते हैं, जितना बड़े-बूढ़े और युवकों को।
लेकिन यही आदिवासी अगले बिन्दु पर धोखा खा जाता है। होता यह है कि वे मिर्जा भाई की ही तरह दूसरे चालकों से भी आत्मीयता का वही रिश्ता कायम करना चाहते हैं, किन्तु भला दूसरे चालकों को इससे क्या मतलब...... या कहें कि उनके लिये इसका क्या महत्त्व? व्यंग्य, घृणा और तिरस्कार पूर्ण दृष्टि उस ओर उठकर वापस आ जाती है। हाथ उठने की बात तो जाने ही दीजिए।
इन बसों में चलने वाले कण्डक्टरों की बात पर भी जरा गौर करें। आदिवासी इनके लिये कभी आदमी नहीं होता; होता है केवल भेड़-बकरी। बस के अंदर सीट खाली हो तो भी ये बदनसीब उन पर नहीं बैठ सकते।
एक चित्र देखें :
मध्यप्रदेश राज्य परिवहन की बस काफी तेज गति से चली जा रही है। इतने में काफी दूरी पर... सड़क के बीचो-बीच एक आदिवासी अपने कन्धे पर एक बच्चे को बिठाए दोनों हाथ फैलाये खड़ा दिखता है। चालक की सीट पर इनका परिचित चेहरा नहीं बल्कि कोई और बैठा है। बस पास पहुँचती है और एक झटके के साथ रुक जाती है। आदिवासी चालक की खिड़की के पास जाता है। चालक उसे फाड़ खाने वाली नज़रों से घूर रहा है....."क्यों बे मामा, मरने को एक मेरी ही गाड़ी थी? कहीं और भी तो जाकर मर सकता है न!"
वह रुँआसा होकर कहता है, "नरानपुर हत्तूर..." यानी "नारायणपुर जाऊँगा।"
"तो साले उधर से आकर बैठता क्यों नहीं? माथा क्यों खराब कर रहा है?" चालक इतनी जोर से चीखता है कि वह वनवासी भय से इधर-उधर देखने लगता है, मानो वापस जंगल के भीतर भाग जाना चाहता हो। 
आप कहेंगे, गलती उसी की थी जो वह सड़क के बीचो-बीच आ खड़ा हुआ था। किन्तु इस तथ्य की ओर भी ध्यान दें कि आखिर उसे ऐसा क्यों करना पड़ा?
दरअसल होता यह है कि मध्यप्रदेश राज्य परिवहन की बसें प्राय: नहीं रुका करतीं। यह बात केवल कोंडागाँव-नारायणपुर मार्ग के साथ ही हो, ऐसी बात नहीं। आप चाहे कोंडागाँव से जगदलपुर मार्ग पर जाएँ या फिर जगदलपुर से उधर कोन्टा-सुकमा या बैलाडिला अथवा भोपालपटनम्। बस्तर के प्रत्येक मार्ग पर यही कहानी दुहरायी जाती है।
बहरहाल, उस आदिवासी का बच्चा बीमार है। उसे वह चिकित्सा के लिये नारायणपुर के अस्पताल लिये जा रहा है। वह बस में सवार होता है। सामने की कई सीटों में शहरी लोग या तो अकेले-अकेले बैठे हैं या फिर दो-दो जन। आदिवासी उनमें से किसी एक पर बैठना चाहता है, तब उन शहरियों का चेहरा घृणा से भर जाता है और वे बिदक उठते हैं, "अबे! पीछे खाली पड़ी है सीट....। उधर क्यों नहीं जाता.....?" और अन्तत: वह किंकत्र्तव्यविमूढ़ हो कर बस की फर्श पर ही उकड़ूँ बैठ जाता है।
भीतर बस में सवारियों की आवाज़ें उभरती हैं......."सरकार इनके पीछे लाखों रुपये खर्च कर चुकी, लेकिन रह गये साले जहाँ के तहाँ।" तभी कन्डक्टर आ कर पैसे वसूल कर लेता है। टिकट नहीं देता। कहता है "टिकट का क्या करेगा रे.....टी.ए. बनाएगा क्या.....?" उसके कहने के साथ ही सवारियाँ खिलखिला कर हँस पड़ती हैं। बस में बैठा हुआ कोई भी व्यक्ति प्रतिरोध नहीं कर पाता। मैं स्वयं भी नहीं।
रास्ते में कई गाँव आते हैं......जोंदरापदर, बुनागाँव, कोकोड़ी, किबईबालेंगा, छेरीबेड़ा, बेनूर, रेमावंड और देवगाँव। इन सारे गाँवों को पार कर बस पहुँचती है नारायणपुर।
नारायणपुर का विशेष आकर्षण है बाहरी लोगों के लिये.....यहाँ प्रति वर्ष भरने वाली मँडई (मेला) के कारण। इसके साथ ही अबूझमाड़ का प्रवेश-द्वार भी है यह क़स्बा। इस शहराते हुए क़स्बे की आबादी अमूमन बारह हज़ार है। क़स्बे के गौरव के रूप में यहाँ एक आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय है। सम्पूर्ण बस्तर सम्भाग में ऐसे आदर्श विद्यालय केवल दो स्थानों में हैं। एक यहाँ और दूसरा फरसगाँव में। इस आदर्श विद्यालय के बारे में इसी विद्यालय के एक ज़िम्मेदार कर्मचारी का कथन है, "शिक्षक गण अध्यापन-कार्य में कम दिलचस्पी लेते हैं। यही इस विद्यालय का आदर्श है।" मनोरंजन के लिये एक "ओपन एयर थियेटर" यानी "टूरिंग टाकीज़" और तीन-तीन "वीडियो-हॉल हैं।
बाहर से एकदम नया आने वाला व्यक्ति तो इस भ्रम में होता है कि यहाँ केवल आदिवासी रहते होंगे। और उसकी निगाह इस क़स्बे में आदिवासियों की खोज में भटकने लगती है। किन्तु तब उसे निराशा होती है, जब उसे वह आदिवासी दिखलायी नहीं पड़ता, जिसका काल्पनिक चित्र उसके दिमाग़ में भरा होता है। अलबत्ता यदि वह रविवार का दिन हुआ या कि मँडई का.....तब उसका चित्र साकार होता देखा जा सकता है, अन्यथा नहीं।
यदि मैं कहूँ कि आदिवासी नारायणपुर में नहीं रहता तो आप और बहुत से जानकार लोग चौंक जाएँगे और मुझे सिरफिरा कहने लग जाएँगे। किन्तु सच यही है कि नारायणपुर में आदिवासी नहीं रहता। रहता था किसी ज़माने में। तब, जब यह क़स्बा निपट गाँव हुआ करता था और इसका नाम हुआ करता था, नगुर। तब यहाँ केवल आदिवासी रहा करते थे और अब केवल आदिवासी नहीं रहता, बाकी सभी रहते हैं।
आदिवासियों के विकास के लिये छोटे से ले कर बड़े तक सभी चिंतित हैं। सरकार आये दिनों सैकड़ों विकास-योजनाएँ बना रही है। बावजूद इसके कोई ठोस परिणाम आज तक सामने नहीं आ सके हैं। एक आदिवासी नेता और बीस सूत्री कमेटी के सदस्य के अनुसार, "कार्यक्रमों का सही क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है। इससे विकास की दिशा नज़र नहीं आ पा रही है"। एक बुज़ुर्ग से चर्चा करने पर वे कहने लगे, "आदिवासियों के विकास के लिये बनायी गयी सरकारी नीतियों का सही ढंग से क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है। इसीलिये ये लोग और भी पिछड़ते जा रहे हैं। शराब बनाने की जो छूट आदिवासियों को मिली है, इससे उनका और भी नुकसान हो रहा है। नशे में धुत् रह कर विकास की दिशा खोज पाना तो कभी सम्भव हो ही नहीं सकता। रही बात आपको यहाँ आदिवासी के नज़र न आने की, सो ऐसी बात नहीं है कि यहाँ आदिवासी नहीं है। है वह। किन्तु उसके पहनाव-ओढ़ाव में फर्क आ गया है। इसी वजह से आप उसे नहीं पहचान पा रहे हैं। और फिर सवाल उठता है कि जब हम जीवन में निरन्तर आधुनिकता को स्थान दे रहे हैं, तो फिर आदिवासी ही भला क्यों इन रूढ़ियों में बँधा रहे......?"
मैं कहता हूँ, "नारायणपुर में आदिवासी नहीं रहता, इस प्रश्न से मेरा तात्पर्य उसके अस्तित्व से है। मुझे यहाँ उसका अस्तित्व नज़र नहीं आता। .....एक वृहद् संदर्भ में.....आदिवासियों की अस्मिता अब नहीं रह गयी है यहाँ.....। मुझे यहाँ बाहरी लोग ही ज्यादा नज़र आते हैं। सम्पन्न वे ही हैं।"
इस प्रश्न के जवाब में उन्होंने कहा, "कारण यह है कि यहाँ के लोग अपने को राजा ही मान कर चल रहे हैं। जबकि बाहर से आया व्यक्ति परिश्रम करता है रात-दिन। शासन से प्राप्त सहायता के कारण आदिवासी निष्क्रिय हो गया है। अब देखिये, जो बैल छह-सात सौ रुपये में मिला करता था, आज उसी की कीमत दो हज़ार रुपये हो गयी है। क्योंकि सब जानते हैं कि आदिवासियों को बैल-जोड़ी खरीदने के लिये सरकार दो हज़ार रुपये दे रही है। इसमें पचास प्रतिशत और माड़ क्षेत्र में तो नब्बे प्रतिशत अनुग्रह-राशि ही होती है, जिसे उन्हें लौटाना नहीं पड़ता। हश्र यह हुआ कि बिचौलियों की बन आयी है और वे उसी छह-सात सौ रुपयों के बैलों को दो हज़ार रुपये में आदिवासियों को बेच रहे हैं। आदिवासी इसलिये आराम से ख़रीद रहा है क्योंकि यह अनुग्रह-राशि है। दो हज़ार रुपयों का बन्दरबाँट से वारा-न्यारा किया जा रहा है और सरकार तथा आदिवासियों को खुले आम ठगा जा रहा है। इधर इस क़िस्म के दलाल काफ़ी संख्या में पनप रहे हैं।"
अभी हम बातचीत कर ही रहे थे कि कुछेक वनवासी वहाँ आ पहुँचे। पूछने पर पता लगा कि वे कोंगे गाँव से बैलों के लिये ऋण के सम्बन्ध में आये हैं।
"निया बाता पोरोय् (क्या नाम है तुम्हारा)?"
"मोड़ाराम।" एक व्यक्ति अपना नाम बतलाता है।
"निया पोरोय् वेह्हा....(तुम्हारा नाम बताओ)।" आये हुए सभी लोगों के नाम बताने के लिये कहता हूँ मैं।
एक-एक कर सब अपना नाम बताने लगते हैं : डाँडो, पेका, बुडँगा, पाँडरा, राजो।
"बदनार टा.....(किस गाँव के हो)?" मैं फिर पूछता हूँ।
"कोंगे।" मोड़ाराम बतलाता है।
"निया नार बच्चोक धूर मन्ता......(तुम्हारा गाँव कितनी दूर है)?" मैं पूछता हूँ।
"उन्दी एटा हर.....(एक दिन का रास्ता है)।" पेका बतलाता है।
"इगा वारातो बात्तोर....(यहाँ क्यों आये हो)?"
मेरा प्रश्न सुन कर मोड़ाराम हिन्दी बोलने की कोशिश करता हुआ बोलता है, "क्या पूचना.....? अम बताएँगे सीदा-सीदा.....(क्या पूछना चाहते हैं आप.....? हम बताएँगे सीधे-सीधे)।"
वह बतलाता है कि वे लोग बैल खरीदने के लिये ऋण-प्राप्ति हेतु यहाँ आये हैं। मैंने पूछा, "बैंक आये थे तो क्या बातचीत हुई? पैसे देंगे या बैल?"
"देको ए, अबी फोटो खींचने के लिये आया था। फेर खबर देयगा ना गरामसेउक, तब फेर आयेगा (देखो, हम अभी फोटो खिंचवाने के लिये आये हुए थे। ग्रामसेवक सूचना देगा तब दुबारा आयेंगे)।"
"अच्छा तो ग्रामसेवक खबर करेगा तब फिर आओगे?"
"हाँ, पयसा वाला को पयसा देयगा, बयला वाला को बयला देयगा (हाँ, जिन्हें रुपये चाहिये उन्हें रुपये और जिन्हें बैल चाहिये उन्हें बैल दिये जाएँगे)।"
"अच्छा, तो क्या पैसा वापस भी करना पड़ेगा?"
"अयसी तो नइँ बोलता है। लेकिन आदा पयसा आपस करना पड़ेगा। दो सौ....(नहीं, ऐसा तो नहीं कहा है। किन्तु आधे पैसे वापस करने पड़ेंगे। शायद दो सौ रुपये...)।"
"ऐसा क्यों?"
"नइँ जानता (नहीं जानता)।"
"कितने पैसे मिलने की बात है?"
"वो तो डेढ़ हजार।" फिर उसने सुधार कर कहा, "डेढ़ नइँ, दो हजार मिलेगा। उसमें से दो सौ आपस करना।"
"अभी तक कितने लोगों को मिले हैं, बैल?"
"दो-तीन गाँव का मिला है। बयला भी देका है, बयँसा भी देका है। बड़या है। तुरुत नाँगेर-ऊँगेर, गाड़ी-ऊड़ी, बयला गाड़ी ले जाता है।"
मोड़ाराम नाम का यह व्यक्ति परलकोट इलाके के कोंगे गाँव का सरपंच है। पढ़ा-लिखा नहीं है। ये लोग नारायणपुर कई बार आ चुके हैं। कोंगे से नारायणपुर की दूरी इनके अनुसार एक दिन की है। सायकिल से सुबह कोंगे से निकलने पर दोपहर तक नारायणपुर पहुँच जाते हैं। यह गाँव पखांजूर थाने और नारायणपुर तहसील के अन्तर्गत आता है। ये लोग खेती करते हैं। धान के अलावा कोसरा, उड़द वगैरह भी बो लेते हैं।
पाँडरा कहता है, "दुनिया में जितना चीज होता है, वो सब बोता है हम।" सब बड़े हँसमुख और विनोदी स्वभाव से परिपूर्ण। सभी ने अपना नाम बताया था किन्तु एक व्यक्ति ने कहा, "मेरा नाम नहीं है।" सब हँस पड़े।
"क्या बिना नाम के हो?" मैंने मुस्करा कर पूछा।
राजो बोलता है, "उसका नाम कुछ नहीं।" एक बार फिर सब के सब हँस पड़ते हैं। मानो झरना गा उठा हो।
"फिर क्या नाम लिखाओगे, आफिस में?"
"आदमी, आदमी नाम लिखता है।" पाँडरा मुस्कराते हुए बोल पड़ता है और सब के सब खिलखिला कर हँस पड़ते हैं। मुक्त हास्य.......।
आदिम समुदाय के सर्वांगीण विकास के लिये एकीकृत आदिवासी विकास परियोजना, आदिवासी विकास परिषद्, विकास खण्ड कार्यालय, जंगलात के आला अफसरों के कार्यालय, जिला संयोजक और इसी प्रकार कई सरकारी-गैर सरकारी संस्थान यहाँ भरे पड़े हैं......किन्तु प्रगति की दौड़ में आदिम समुदाय के कितने सदस्य आ पाये हैं.....अभी इसके सही आँकड़े खोज पाना व्यर्थ है। ईसाई मिशनरियों की विशेष कृपादृष्टि है इस क्षेत्र में। पास्टर का एक बंगला काफी विस्तृत क्षेत्र के भीतर खड़ा है। इनका अस्पताल भी है। इसके साथ ही एक और संस्था यहाँ क्रियाशील है, "ग्रामीण सहजीवन संस्था"। इस संस्था का मुख्यालय बम्बई में और शाखा नारायणपुर में है। आदिवासियों के विकास में ये संस्थाएँ कहाँ तक साथ हैं.........इस पर चर्चा फिर कभी।
अबूझमाड़ के अबूझमाड़ियों को अपेक्षाकृत अधिक पिछड़े हुए मान कर उनके विकास की दृष्टि से 1974-75 में एक अबूझमाड़ विकास अभिकरण की स्थापना की गयी। इसी तरह अबूझमाड़ विकास खण्ड भी विशेष रूप से बनाया गया। नारायणपुर तहसील के 189, बीजापुर तहसील के 39 और दन्तेवाड़ा तहसील के 8 ग्राम अबूझमाड़ के अन्तर्गत आते हैं। इन में से कुल 23 गाँव आबादी विहीन हैं। 4000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले राजस्व एवं वन कानूनों से अछूते इस भू-भाग में रहने वाली जनसंख्या 19 से 20 हजार के बीच है। इस क्षेत्र में निवास करने वाले अबूझमाड़ियों के पास भू-स्वामित्व के अधिकार नहीं हैं।
इस अभिकरण के लिये काफी महत्त्वपूर्ण उद्देश्य निर्धारित किए गये थे। क्षेत्र में नि:शुल्क नमक एवं कपड़ों का वितरण, आश्रम शालाओं की स्थापना, मलेरिया उन्मूलन, पहुँच-मार्गों का निर्माण, सेटलमेन्ट सर्वे, निस्तारी तालाबों का निर्माण, सहकारी उपभोक्ता भण्डारों की स्थापना, पेय-जल के लिये कुँओं का निर्माण और फलदार वृक्षारोपण इसके प्रमुख कार्य निर्धारित किए गये थे।
वर्ष 74-75 से आज तक यानी कुल मिला कर दस वर्षों में विकास की गति का अंदाजा निम्न आँकड़ों से लग जाता है। पेयजल के लिये कुँए एवं हैण्डपम्प : 14, निस्तारी तालाब : 5, आश्रम शालाएँ : 9, प्राथमिक शालाएँ : 56, पूर्व माध्यमिक शालाएँ : 9, उपभोक्ता भण्डार : कोहकामेटा, आदेर और कच्चापाल। ये तीनों ही उपभोक्ता भण्डार फिलहाल बन्द पड़े हैं। लैम्प्स की शाखाएँ : कोहकामेटा और गारपा। ये दोनों भी बन्द पड़ी हैं। फिलहाल केवल ओरछा में आदिम जाति सहकारी समिति और हान्दावाड़ा में स्थापित उपभोक्ता भण्डार क्रियाशील हैं।
इसी तरह प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की स्थापना ओरछा, कुतुल, लंका एवं हान्दावाड़ा में की गयी है। इनमें से ओरछा, कोहकामेटा और कुतुल के स्वास्थ्य केन्द्र क्रियाशील हैं, जबकि हान्दावाड़ा और लंका में चिकित्सकों की अभी तक कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की जा सकी है। पूर्व में यहाँ पदस्थ चिकित्सकों ने बाहर कहीं अपने स्थानान्तरण करवा लिये।
जानकार लोगों का कहना है कि इस वर्ष एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम के तहत, बल्कि जब से यह कार्यक्रम लागू हुआ है, तब से पहली दफा आदिवासियों को इतनी बड़ी तादाद में ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है। बताया जाता है कि अकेले वर्ष 82-83 में ही लगभग तेरह सौ प्रकरण बनाए गये हैं, जिनमें से आधे से अधिक प्रकरणों की स्वीकृति भी दी जा चुकी है। किन्तु सवाल यही उठता है कि क्या इनका सही लाभ उन्हें मिल पाएगा जिनके लिये यह सब किया जा रहा है........?
यहाँ मुझे उन बुजुर्गवार की बात याद आ जाती है, "दलाल काफी पनप रहे हैं इधर, जो आदिवासियों के विकास के नाम पर अपनी रोटी सेंकने में मसरूफ़ हैं।" निश्चित रूप से ठगी रोकने के लिये सबसे अहम बात है कि लोग शिक्षित हों। ऐसी बात नहीं है कि पाठशालाएँ नहीं खोली गयी हैं। गाँव-गाँव में पाठशालाएँ हैं। एक शिक्षक बन्धु सरकार की इस नीति से बड़े क्षुब्ध हैं। कहते हैं, "सरकार का क्या जाता है? खोल रही है गाँव-गाँव में पाठशालाएँ। हमारी सुख-सुविधा का तो तिल भर भी ख्याल नहीं है.......।"
वही बुजुर्ग फिर कह उठते हैं, "अब भइया, ऐसा है कि मास्टर अब या तो शराब बना कर बेच रहा है या फिर खेती या दूसरा कोई व्यापार कर रहा है। पाठशाला में पढ़ाना तो उसका "पार्ट टाइम जॉब" हो गया है। चाहे तो पाठशाला जाए, चाहे तो न जाए....। कोई बन्दिश नहीं है।"
शिक्षण संस्थाओं की स्थिति जानने के लिये उनका वृहद् सर्वेक्षण ज़रूरी है। वैसे तो सरकार ने अधिकारियों की नियुक्ति की है कि समय-समय पर, जब उन्हें फुरसत मिले, प्रत्येक पाठशाला का निरीक्षण करें। किन्तु कौन देखता है यह सब? अफसर को प्रसन्न करने के बाद भला ऐसा कौन सा काम रह जाता है अपने देश में जो ठीक-ठाक न हो सकता हो? गाँव वालों में यदि इतनी चेतना होती तो फिर बात ही क्या थी.....। बहरहाल, बावजूद इन सारी बातों के, सारे के सारे लोग आदिम समुदाय के विकास की चिन्ता में घुले जा रहे हैं। यह सच है। हाँ, अभी हाल ही में यहाँ, नारायणपुर में एक सिविल अस्पताल खुला है; मध्यप्रदेश शासन के स्वास्थ्य विभाग के अधीन। इससे कितनी चिकित्सा-सुविधाएँ मिलेंगी उस आदिम जन समुदाय को, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। 

Sunday, 29 April 2012

जूठी प्लेट और खुरचन


इस बार प्रस्तुत है, "नवभारत", दिनांक 5 जुलाई 1984 अंक में प्रकाशित यह रपट : 


अभी-अभी हमने अन्तर्राष्ट्रीय बाल-वर्ष बड़े ही धूम-धाम के साथ मनाया है और विभिन्न आँकड़ों के माध्यम से न केवल हमने यह साबित करने की कोशिश की है, बल्कि आश्वस्त भी हो गये हैं कि हमारे बच्चों का विकास, शारीरिक और मानसिक, दोनों ही स्तरों पर काफी हद तक हुआ है। हमने उनके समुचित विकास के लिये करोड़ों रुपये की सार्थक (?) योजनाएँ बनायी हैं और हम सदैव इसके लिये कृत-संकल्प भी हैं।
     लेकिन क्या ये आँकड़े तथ्यों पर आधारित हैं? यदि हाँ, तो आज भी सौ में से बीस बच्चे यह कहने को क्यों विवश हैं कि हमारे भाग्य में तो जूठे कप-प्लेट उठाना, और बाकी बची खुरचन खाना ही लिखा है....। आखिर क्यों...? बच्चे आज कुपोषण के शिकार होकर अकाल मृत्यु को क्यों प्राप्त हो रहे हैं? उनमें आपराधिक भावनाएँ क्यों घर कर रही हैं और क्यों उनका शारीरिक-बौद्धिक विकास न केवल रुका है, अपितु कुन्द भी पड़ता जा रहा है? तो इन सारे प्रश्नों के उत्तर में केवल आर्थिक मुद्दा ही उभर कर सामने आता है। दरअसल जब तक हम अपने आर्थिक ढाँचे को बदल कर सुदृढ़ नहीं कर लेते, तब तक ऐसी किसी भी समस्या का समाधान खोज पाना मुश्किल ही है।
     किसी बच्चे को किसी होटल में जूठी प्लेट उठाते, जलाऊ लकड़ी बेचते या अखबार बाँटते देख कर यह कहना कि बच्चा संघर्षशील है और यह भी कि संघर्ष ही जीवन है, केवल अपने दिल को बहला लेने के अलावा और कुछ नहीं हो सकता। निश्चित ही ऐसी सोच तमाम ज्वलंत समस्याओं से मुँह फेर लेना ही होगा। और ऐसा कर हम अपनी जिम्मेदारियों से कतई मुक्त नहीं हो सकते। हाँ, इसके लिये न केवल सरकार को काम करना है, बल्कि हम सभी को, हमारी अन्यानेक समाज-सेवी संस्थाओं को भी इसके लिये पहल, सार्थक पहल, करनी होगी।
     हालाँकि सरकार ने कानूनन बारह वर्ष से कम उम्र के बच्चों से काम लेने पर रोक लगा रखी है, किन्तु वस्तुत: कितने लोग इस कानून का पालन करते हैं? और सरकार कानून का उल्लंघन करने वाले ऐसे कितने लोगों को सजा दे पाती है, यह भी एक प्रश्न है। किन्तु उससे भी बड़ा सवाल यह है कि यदि ये बच्चे काम न करें तो खाएँगे क्या? और यदि इन्हें काम पर लेने से रोक भी दिया जाता है, तो ये निश्चित ही भीख माँगने लग जाते हैं और आपराधिक वृत्तियों में भी संलग्न हो जाते हैं।
     इनकी इन विवशताओं का लाभ असामाजिक एवं आपराधिक तत्व उठाते हैं। वे अपने सुगठित गैंग बना कर भिक्षावृत्ति के धंधे से इन्हें लगा देते हैं या जेब काटने, चोरी करने जैसे अन्य अनेक अपराधों के लिये इनका न केवल उपयोग करते हैं, बल्कि उनका भरपूर आर्थिक-शारीरिक शोषण भी। और यह आर्थिक-शारीरिक शोषण होटल-मालिकों या अन्य प्रतिष्ठानों द्वारा भी भरपूर किया जाता है। इस तरह ये बच्चे कहीं भी, किसी भी स्थिति में न तो सुरक्षित हैं और न ही स्वतन्त्र।
आइये, ऐसे चंद कामकाजी बच्चों से आपकी मुलाकात कराएँ और उन्हें समझने की कोशिश करें। जानें कि किन परिस्थितियों के अधीन उन्हें जूठी प्लेट उठाने और बाकी बची खुरचन खाने को विवश होना पड़ता है। अपने शरीर के अनुपात से अधिक वजन की काँवड़ उठाना जिनकी नियति है और धूप-शीत-बरसात की परवाह किए बगैर आपकी सुख-सुविधा के साधन जुटाना जिनकी मजबूरी.....! आइए उनसे करें एक मुलाकात :
     परभूदास एक टपरीनुमा होटल में काम करने वाला नौ-दस साल का हरिजन बालक है। एकदम चीकट सनी एक शर्ट और काफी हद तक फट कर चीथड़ा हुआ जा रहा पैन्ट पहने वह बड़ी ही तत्परता से ग्राहकों को चाय-पानी दे रहा था। आँखों में एक विशेष किस्म की चमक, शरीर में स्फूर्ति और ग्राहकों से बात करने का उसका तरीका..........।
     यह सब देख कर लगता ही नहीं कि वह नौ-दस साल का बच्चा है। लेकिन जब हम उससे उसका नाम पूछते हैं तो पहले तो वह सहमी हुई आवाज में उत्तर देता है, फिर ढाढ़स बँधाने पर सामान्य हो जाता है और निर्भीक हो कर हमारे प्रश्नों के उत्तर देता है :
     "क्या नाम बताया तुमने अपना?"
     "परभूदास।"
     "तुम्हारे पिता का नाम?"
     "फगनूदास।"
     परभू नहरपारा, कोंडागाँव का रहने वाला है।
     "यह होटल किसका है?"
     "दयालू दादा का।"
     "तो क्या वह तुम्हारा सगा भाई है?"
     "नहीं। दूसरे पिताजी का, दूसरी माँ का है।"
     दरअसल वह स्पष्ट नहीं कर पा रहा था, लेकिन उसके कहने का मतलब यह था कि यों ही, पारा-पड़ोस में रहने के कारण उस होटल-मालिक से भाई का रिश्ता बन गया है।
     "तो तुम यहाँ काम करते हो?"
     "हाँ," उसका संक्षिप्त-सा उत्तर।
     "बदले में पैसे देता होगा?"
     "नहीं।" नकार में उसका सिर हिलता है। तभी पास में बैठा एक व्यक्ति उससे कहता है, "देता है, बोल न बे।"       और हम उसे टोक देते हैं, "आप चुप रहिए भाई। वह जो कह रहा है, उसे कहने दीजिये।"
     "हाँ परभूदास, बताओ पैसा-वैसा देता है, काम करने का न?" हम दुबारा उससे मुखातिब होते हैं।
     "नहीं, ऐसे ही खाना-पीना देता है।" बोलते हुए वह सकपका जाता है।
     "तुम पढ़ने क्यों नहीं जाते?" हमारा प्रश्न हमारा ही मुँह चिढ़ा रहा था। किन्तु फिर भी, शायद औपचारिकता   के सामने वास्तविकता को हमेशा नकारने की हमारी आदत हमें यह प्रश्न करने को उकसा रही थी।
    "पढ़ रहा था। तीसरी कक्षा तक पढ़ा।" एक पल के लिये उसकी आँखों में तेजी से एक चमक उभरी फिर यथावत् : "बाद में छोड़ दिया।"
     "क्यों?"
     "गुरुजी ने छुड़ा दिया। साटीफिकट लाने को बोला था, मैं नहीं लाया।" 
     परभूदास बाँसकोट नामक गाँव में रहता था और वहीं पढ़ रहा था। जब वे लोग कोंडागाँव आये तो बाँसकोट स्कूल से शाला स्थानान्तरण प्रमाण-पत्र नहीं ला पाए। इससे उसे यहाँ के स्कूल में प्रवेश नहीं दिया गया।      "बाँसकोट बहुत दूर है।" वह बतलाता है और खामोश हो जाता है।
     "तुम्हारे घर में कितने लोग हैं? "
     "मेरी बहनें, मेरे माँ-बाप, सब हैं। मुझे मिला कर कुल छह लोग।" वह बिना गिने ही जवाब देता है।
     "काम कौन-कौन करते हैं?"
     "मैं करता हूँ। मेरी माँ और बहनें भी करती हैं। मेरा बाप काम नहीं करता। उसके पैर नहीं चलते और हाथ भी। तीन साल हो गये।" उसके मुख पर पीड़ा की एक गहरी परछाईं उभर आती है और आँखें तरल हो उठती हैं। फिर वह बताता है, "पहले तो अच्छे थे, लेकिन ऐसा कैसे हो गया पता नहीं।"
     "तुम यहाँ काम क्यों करते हो?" तथाकथित सभ्य और बुद्धिजीवी कहलाने का खोखला वहम फिर से यह प्रश्न करता है।
     "यहाँ खाना मिलता है, न। हमारे घर में बहुत लोग हैं, इसलिये खाना पूरा नहीं पड़ता।"
परभू सुबह सात बजे से रात नौ बजे तक काम करता है। दोपहर और रात का खाना वहीं होटल में खाता है। बस, यही उसका मेहनताना है। उसका कहना है कि यदि सर्टिफिकेट मिल जाए तो वह भी पाठशाला जाने को तैयार है और पाठशाला से आने के बाद होटल में काम भी करेगा। लेकिन प्रश्न यह है कि उसे कौन दिलायेगा उसका शाला स्थानान्तरण प्रमाण-पत्र?
     इधर, अपेक्षाकृत एक बड़े होटल में काम करता है, सुकमन। सुकमन मालाकोट गाँव का रहने वाला है। कोंडागाँव से 15-20 किलोमीटर के फासले पर है उसका गाँव मालाकोट। वह एक आदिवासी बालक है। वह अपनी उम्र पन्द्रह वर्ष बताता है। पाठशाला कभी नहीं गया।
     "तुम अपना घर छोड़कर यहाँ क्यों आये?"
     "कमाने आया। हमारे गाँव में काम नहीं मिलता।"" फिर उसने बताया, "घर पर मेरी माँ है और दो भाई भी। मेरे पिता नहीं हैं। उनकी मृत्यु हो गयी है। हमारी दो एकड़ खेती है। लेकिन अभी बँटवारा नहीं हुआ है, इसलिये मैं कोंडागाँव आया। कमाने के लिये।"
     "तुम पढ़े क्यों नहीं?"
     "घर वालों ने नहीं पढ़ाया। और फिर हमारे गाँव में पाठशाला भी नहीं है। बहुत दूरी पर है, बड़े पारा में। घर वालों ने कहा कि तुम पढ़ कर क्या करोगे? यहाँ कमा कर कौन लायेगा? तो मैं पढ़ने नहीं जा सका।" 
     "यहाँ कितनी रोजी मिलती है, तुमको?"
     "तीन रुपये मिलते हैं।"
     "ये कप-प्लेट, जूठा उठाना, ये सब अच्छा लगता है तुम्हें?"
     "तब और कौन सा काम करेंगे? मुझे तो अच्छा लगता है। मेरा बाप जिन्दा होता तो मैं काम के लिये इतनी दूर मरने को आता?" फिर वह पाठशाला जा रहे बच्चों की ओर इंगित करते हुए कहता है, "अभी आप पूछ रहे थे न कि मैं क्यों पाठशाला नहीं गया? मुझे भी पढ़ाई करने का बहुत मन था। लेकिन मुझे मेरे घर वालों ने ही मना कर दिया। अब भला क्या पढ़ सकता हूँ?" मैं उसकी हसरत भरी नजरों से निगाहें नहीं मिला पाता कि तभी एक और बालक वहाँ आ जाता है। चड्डी-बनियान पहने हुए ही। आते-आते उसने सुकमन की बात सुन ली है, तभी तो वह आते ही बोल पड़ता है, "पढ़ाते नहीं कोई। बोलते हैं, कमा कर लाओ तब खाना मिलेगा।"
     इस बालक का नाम है सुरेश। लगभग परभूदास की ही उम्र का सुरेश जामकोटपारा, कोंडागाँव का रहने वाला है। यह बालक भी एक भोजनालय में काम करता है। कस्बाई क्षेत्र का रहने वाला होने के कारण बातचीत में काफी चुस्त और उसकी भाषा में भी उस परिवेश का काफी प्रभाव है।
     "तुम भी कहीं काम करते हो?" हम उसकी ओर मुखातिब होते हैं, तभी सुकमन को उसका होटल-मालिक पुकारता है और हम उसे रोक नहीं पाते। वह चला जाता है।
     "हाँ, इस दूसरे होटल में।" सुरेश कहता है।
     "क्या काम करते हो, वहाँ?"
     "हम वहाँ प्लेट धोते हैं।" सुरेश इतनी तीव्रता से और लगभग प्रसन्नता में चीखने जैसी आवाज में बोलता है कि सुन कर मैं भीतर तक काँप उठता हूँ। कितना आतंकित कर देने वाला स्वर है उसका; यानी एक आठ-दस बरस के बच्चे का! इतनी सरलता से बोल पाना हमारे लिये कितना कठिन होता है, जितनी सरलता से, सहज हो कर उसने कहा था। दरअसल उसकी सरलता ही तो भीतर तक बेधने वाली और उस बच्चे, उस जैसे कई बच्चों के भविष्य के प्रति चिंतित नहीं, बल्कि विचलित कर देने के लिये काफी थी। मतलब यह कि उसे अपने काम से कोई शिकवा नहीं। अपने अस्तित्व के प्रति कोई चिंता नहीं। जैसे उसे अच्छी तरह मालूम हो कि उसका भविष्य एकदम निश्चित है, वह हमेशा जूठी प्लेटें ही धोता रहेगा, और उसी में उसके जीवन की सार्थकता है; कि उसका जन्म ही जूठी प्लेटें धोने के लिये हुआ है। कितनी बड़ी त्रासदी है! मुझे बाद में सुरेश पर काफी गुस्सा आ रहा था कि क्यों उसने इस तरह उद्वेलित और भयभीत कर देने वाला जवाब दिया? क्यों नहीं उसके मन में स्थितियों के प्रति असन्तोष उभरा और क्यों नहीं वह अपने-आपको उससे मुक्त करना चाहता? और यह भी कि आखिर उसने इतनी स्वाभाविकता से क्यों उसे स्वीकार कर लिया कि वह प्लेट धोने के काम में ही खुश है? क्यों.....? लेकिन मैं उससे यह प्रश्न कर भी न सका.....क्योंकि मुझमें न तो प्रश्न करने का नैतिक साहस रह गया था और न उसके उत्तर को सुन पाने या उत्तर में किए गये प्रति-प्रश्न का उत्तर दे पाने की मुझमें हिम्मत रह गयी थी........। आज भी वह साहस नहीं जुटा पाया हूँ मैं। क्योंकि मैं जानता हूँ कि उसका उत्तर क्या होगा? होगा एक प्रति-प्रश्न.......बल्कि कई प्रश्न कि आखिर मैं यह काम न करूँ तो क्या भूखा मरूँ? क्या तुम मुझे खाना-कपड़ा दोगे....? ......क्या कर सकोगे तुम लिखने-पढ़ने वाले लोग......? जब हमारे भाग्य में ही जूठी प्लेटें उठाना और बाकी बची खुरचन ही खाना लिखा है, तो क्या तुम्हारे कहने से यह सब बदल जाएगा? और....और पता नहीं क्या-क्या? फिर भला मैं मधुमक्खी के छत्ते को छेड़ कर क्यों मुसीबत मोल लूँ? है न सही बात?
     "तुम्हें मेहनताना क्या मिलता है यहाँ?" मैंने भयग्रस्त हो चट् से बात बदल ली। 
     "दस रुपये हफ्ता और खाना-पीना।" उसके मुस्कराते होंठ हिलते हैं और मेरी दहशत फिर बढ़ जाती है।
     "घर में कौन-कौन हैं?"
     "पिताजी हैं केवल। वो गद्दा-रजाई सीने का काम करते हैं। माँ नहीं है। पिछले साल मर गयी।" कहते हुए भी सुरेश का चेहरा न तो कुम्हलाया और न आँखें ही पनियल हुईं। यानी सब-कुछ मेरी आशाओं के विपरीत.....।
     "पढ़ते नहीं?"
     "नहीं।" सपाट उत्तर, "पढ़ने की इच्छा ही नहीं होती। और फिर घरवाले भी तो नहीं पढ़ाते।"
     मुझे लगता है, लड़का बड़ा ढीठ है। मैं उससे सामान्य होने का प्रयास करता हुआ पूछता हूँ, "और सिनेमा कितना देखते हो?"
     वह मुस्कराता है, "महीने में एक बार।"
     "पैसे का क्या करते हो?"
     "पिताजी को देते हैं। वे उससे चावल-दाल लेते हैं।" बड़ी ही तत्परता से, लेकिन एक जवाबदार व्यक्ति की तरह उसका जवाब है। मैं महसूसने लगता हूँ कि लड़का आठ-दस बरस का नहीं, एक प्रौढ़ व्यक्ति है......तमाम अनुभवों से गुज़र कर पका हुआ आदमी। और मैं स्वीकार करता हूँ कि इस आठ-दस साल के प्रौढ़ के सामने मैं निरा बच्चा हूँ....एक दूध पीता बच्चा!



Sunday, 22 April 2012

पोरटा


पिछले एक पोस्ट में मैंने बस्तर-माटी के अन्यतम हल्बी कवि श्री सोनसिंह पुजारी के विषय में संक्षेप में चर्चा की थी। इस पोस्ट में उनके विषय में विस्तार से चर्चा है और है उनकी कविता "पोरटा"। यह ध्वन्यांकन मैंने 28 अगस्त 2008 को मेरे निवास पर किया था । मेरे अनुरोध पर श्री पुजारी जी ने मुझ पर अत्यन्त कृपा की और अस्वस्थता के बावजूद जगदलपुर से कोंडागाँव पधारे थे, जहाँ मेरी उनसे लम्बी बातचीत हुई थी और उन्होंने अपनी कविताएँ भी ध्वन्यांकित करायीं। इसके लिये मैं उनका आभारी हूँ। दरअसल मैं चाहता था की वे कविताओं का सस्वर पाठ करते किन्तु उनके गले की शल्यक्रिया  होने के कारण ऐसा संभव नहीं हो सका. यहाँ मैं उनके स्वर में ही उनकी कविता प्रस्तुत करना चाहता था किन्तु कुछ तकनीकी कारणों से फिलहाल यह संभव नहीं हो पा रहा है. प्रयास करूंगा कि बहुत जल्द  ऐसा संभव हो सके. 
      श्री पुजारी का जन्म पाठशाला-अभिलेख के अनुसार 01 जुलाई 1942 को बस्तर अंचल के बजावँड नामक गाँव में एक आदिवासी परिवार में हुआ। पिता का नाम था स्व. रामसिंह और माता का नाम था स्व. कौशल्या। किन्तु, जैसा कि वे बताते हैं, यह तिथि वास्तविक नहीं अपितु अनुमानित है। कारण, गाँवों में तब जन्म-तिथि की जानकारी किसी को भी नहीं हुआ करती थी। लोग पढ़े-लिखे नहीं थे। इसीलिये पाठशाला में प्रवेश के दौरान शिक्षक अनुमान से बालक की जन्म-तिथि अंकित कर लिया करते थे। जब इनका जन्म हुआ तब बस्तर की आदिवासी एवं लोक-परम्परा के अनुसार माता-पिता और अन्य सगे-सम्बन्धी इनके अंग-प्रत्यंग में कुछ चिन्ह खोजने लगे जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि किस पूर्वज ने इस बालक के रूप में पुनर्जन्म लिया है। इस खोज से उन्हें पता चला कि इनके एक कान में छेद है। यह छेद श्री पुजारी के कान में आज भी यथावत् है। बहरहाल, उस चिन्ह को देख कर यह निर्धारित कर दिया गया कि यह बालक बन्दीजाऊ का ही पुनर्जन्म है। "बन्दीजाऊ" इनके घराने में एक पूर्व पुरुष थे। उन्हें "बन्दीजाऊ" कहते थे। कारण, उन्हें बन्दी बनाया गया था और जेल की सजा हुई थी। 14 साल की जेल की सजा हुई थी। इसीलिये उनका नाम बाद में "बन्दीजाऊ (बन्दी हो जाना, या जेल जाने वाला)" पड़ गया था। बताते हैं कि, "बन्दीजाऊ" अपनी सजा पूरी करने के बाद जब वापस आये तो वे लाल कालीन्द्र सिंह के सहयोगी बने। जब तक वे जीवित थे, वे लाल कालीन्द्र सिंह के साथ ही बने रहे। "बन्दीजाऊ" अपने कान में बारी (बाली) पहनते थे। इसी बारी का निशान उनके एक कान में था। यही निशान श्री पुजारी के कान में पा कर निर्धारित कर दिया गया कि यह बच्चा "बन्दीजाऊ" का ही पुनर्जन्म है।
      "बन्दीजाऊ" की चर्चा करते हुए श्री पुजारी कहते हैं कि उनके इस पूर्व पुरुष ने बिना किसी अपराध के जेल की सजा काटी थी। उन्हें एक हत्या के प्रकरण में उस समय तत्कालीन "गँवटेया (गाँव का एक समृद्ध् व्यक्ति)" ने झूठे तौर पर फँसाया था। उनके इस पुरखे का कसूर यह था कि वे जिस दिन खरगोश पकड़ने के लिये जंगल गये थे उसी दिन उड़ीसा की किसी औरत का उसी जंगल में खून हो गया। गाँव के गँवटेया ने बन्दीजाऊ को जंगल जाते हुए देखा था। केवल इसी बिनाह पर उसने बन्दीजाऊ को झूठे तौर पर फँसा दिया कि यह हत्या इसी ने की है। चूँकि उस समय गाँव का गँवटेया गाँव में बड़ा आदमी माना जाता था, पुलिस ने उसकी बात पर भरोसा कर लिया। उसने बन्दीजाऊ के विरूद्ध प्रकरण तैयार कर लिया और मामला न्यायालय में चला। मामले में किसी भी चश्मदीद गवाह के बिना ही उसे जेल हो गयी। केवल यह बताया गया कि उसी शाम को यह उसी जंगल में जा रहा था। जबकि वस्तुस्थिति यह थी कि वह खरगोश पकड़ने गया था। बहरहाल, सजा पूरी कर जब वह गाँव आया तो उसने प्रण किया था कि आज के बाद यदि गँवटेया उसके सामने आ गया तो वह उसका गला काट देगा। अपने प्रण के साथ ही बन्दीजाऊ ने फरसा (परशु) को नमक लगा कर तेज कर लिया था। कहते हैं, गँवटेया जब तक जिन्दा था बन्दीजाऊ के सामने कभी नहीं आया। और अन्त में वह गँवटेया कोढ़ रोग से ग्रस्त हो कर मर गया।
       श्री पुजारी के परिवार की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी। अभाव और दरिद्रता में उनका बचपन बीता था। उनके पास 12 एकड़ कृषि भूमि थी किन्तु वह असिंचित थी। इस कारण उससे परिवार का गुजर-बसर नहीं हो पाता था। परिवार में कुल 8-10 लोग थे। उस जमाने में फसल उतनी नहीं हो पाती थी। यही कारण था कि वर्ष में एक या दो बार साहूकार से कर्ज ले कर धान लाना पड़ता था। जब साहूकार के पास कर्ज लेने जाते थे तो उसे प्रसन्न करने के लिये साथ में एक बड़ा-सा मुर्गा और एक बोतल मँद (मदिरा) ले जाना पड़ता था। मुर्गा घर का ही होता था और मदिरा भी। तभी वह साहूकार बात करने को तैयार होता था। और बड़े मान-मनौव्वल के बाद वह एक खण्डी, दो खण्डी या तीन खण्डी धान दिया करता था। फसल आने के बाद उसे ड्योढ़ा वापस करना पड़ता था। 
      श्री पुजारी के पिता और बड़े पिता (ताऊ) चाहते थे, और उनकी दिली इच्छा थी कि उनका बेटा सिरहा (वह व्यक्ति जिस पर देवी की सवारी आती है) बने। और इसके लिये वे तीन जगह (बेड़ागाँव, गिरोला और पाहुरबेल) में हिंगलाजिन माता के मन्दिर में श्री पुजारी को ले कर कई बार आना-जाना किया करते थे। पिता और ताऊ ने बहुत कोशिश की कि बेटे पर देवी की सवारी आये और वह सिरहा बन जाये। इसी ख्याल से श्री पुजारी ने सिरहों की तरह केश भी बढ़ा लिये थे। लेकिन सिरहा बनना शायद उनके प्रारब्ध में नहीं था। फिर हुआ यह कि उन्हें बजावँड से लगभग ढाई-तीन किलोमीटर दूर बगल के गाँव तारापुर की प्राथमिक शाला में भर्ती करा दिया गया। उम्र की बात आयी तो माता-पिता कुछ भी नहीं बता सके, जैसा कि उन दिनों गाँवों में हुआ करता था। तब शिक्षक ने अन्दाज से इनकी जन्म-तिथि अंकित कर ली, 01 जुलाई 1942। उस समय प्राथमिक स्तर पर चार कक्षाएँ हुआ करती थीं। श्री पुजारी ने चौथी कक्षा उत्तीर्ण की और वे अपने परीक्षा-केन्द्र में प्रथम स्थान पर रहे। इसके बाद आया माध्यमिक पाठशाला में भर्ती होने का समय। उस समय माध्यमिक पाठशाला थी बस्तर नामक गाँव में। वहाँ तब छात्रावास की भी सुविधा उपलब्ध थी। चौथी कक्षा उत्तीर्ण करने वाले सभी छात्रों के अभिभावकों ने सर्व सम्मति से तय किया कि बच्चों को बस्तर के माध्यमिक पाठशाला में प्रवेश दिलाया जाये। इस निर्णय के साथ सभी बैलगाड़ी और भैंसागाड़ी में सवार हो कर बस्तर गाँव के लिये रवाना हुए। सारी रात की यात्रा के बाद सवेरे बस्तर पहुँचे। वहाँ तत्कालीन राजनीति में सक्रिय बस्तर निवासी सूर्यपाल तिवारी के सहयोग से पाठशाला के साथ-साथ छात्रावास में भी इन्हें प्रवेश मिल गया। प्रवेश के समय, 1955 में, श्री पुजारी के लम्बे केश काट दिये गये। उस जमाने में छात्रों को दस रुपये मासिक स्कॉलरशिप के रूप में मिला करते थे और उसमें ही छात्रों को गुजारा करना पड़ता था। प्रत्येक छात्र को प्रति माह घर से 9 पायली (लगभग 18 किलोग्राम) चावल अपने लिये लाना पड़ता था। किसी तरह तीन साल बस्तर के माध्यमिक पाठशाला में गुजारे और फिर जब आठवीं की परीक्षा हुई तो श्री पुजारी इस परीक्षा में भी पूरे केन्द्र में प्रथम स्थान पर रहे। आठवीं पास करने के बाद उन्हें लगा कि अब उनका ग्रामसेवक के पद पर नौकरी लगना तय है। फिर ग्रीष्मकालीन अवकाश में वे अपने घर चले गये। वे कल्पनाएँ करते थे कि अब वे ग्रामसेवक बन ही जायेंगे। इसी बीच सूर्यपाल तिवारी ने उस वर्ष आठवीं की परीक्षा में प्रथम स्थान पाने वाले छात्र के विषय में जानकारी ली। उन्हें श्री पुजारी का नाम बताया गया। तब उन्होंने किसी मैसेन्जर को श्री पुजारी के गाँव भेजा और उन्हें अपने पास बुला लिया। जब श्री पुजारी उनके पास पहुँचे तो उन्होंने उनका दाखिला जगदलपुर के हाई स्कूल में करवा दिया। 
      सूर्यपाल तिवारी उस समय एक दल विशेष के एक अच्छे स्थापित नेता थे। बताया जाता है कि बस्तर ग्राम में मिडिल स्कूल और छात्रावास शुरु करने का श्रेय उन्हें ही जाता है। उस जमाने में सन् 1955 तक या 1955 के थोड़ा पहले तक स्वर्गीय आर. सी. व्ही. पी. (रोनाल्ड कार्लटन वर्नन पीडेड) नरोन्हा, (कार्यकाल : 16.01.1949 से 21.01.1955, जो आगे चल कर पद्मभूषण से नवाजे गये) उस समय डिप्टी कमिश्नर हुआ करते थे बस्तर में। उनसे भी सूर्यपाल तिवारी के अच्छे सम्पर्क थे। बस्तर में छात्रावास के लिये स्व. नरोन्हा ने खेत भी तैयार किये थे। स्व. नरोन्हा जापानी ट्रैक्टर से स्वयं खेत तैयार करते थे। उस समय के उसके फोटोग्राफ्स छात्रावास में हुआ करते थे। बहरहाल, श्री तिवारी ने श्री पुजारी को हाई स्कूल में भर्ती कराया। पुस्तक-कॉपी के लिये "नरोन्हा फंड" से व्यवस्था गयी। स्व. नरोन्हा ने बस्तर से जाते-जाते कुछ फंड जमा किये थे गरीब और प्रतिभावान बच्चों के लिये। उसी फंड से पुस्तक-कॉपी की व्यवस्था हुई थी। श्री पुजारी जगदलपुर में भी छात्रावास में ही भर्ती कराये गये थे, जहाँ उन्होंने हाई स्कूल तक की शिक्षा प्राप्त की। 
गुरबत के दिनों की याद करते हुए श्री पुजारी दो घटनाओं का जिक्र करते हैं। सम्भवत: जब वे दसवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। एक दिन ऐसा आया कि उस दिन मेस चार्ज जमा नहीं हुआ और मेस में छात्रों का भोजन भी नहीं बना। पास में सिर्फ 2 आने थे। उस 2 आने से ही पास के एक मद्रासी होटल में उन्होंने दोसा खाया। इस तरह उस दिन के दोपहर के भोजन का तो जुगाड़ हो गया किन्तु रात के भोजन का प्रश्न मुँह बाये खड़ा था। दैवयोग से उसी दिन शाम को जगदलपुर के नयापारा स्थित नेहरू छात्रावास का उद्घाटन हुआ। उद्घाटन किया था तत्कालीन जिलाधीश श्री आर. एस. एस. राव (कार्यकाल : 25.09.60 से 01.05.62) की पत्नी ने। और सभी आदिवासी छात्र उस नये छात्रावास में स्थानान्तरित कर दिये गये। इस तरह रात का भोजन नसीब हुआ वरना पढ़ाई छोड़ कर वापस गाँव जाने की स्थिति बन गयी थी। आगे की पढ़ाई के लिये कुछ खर्च निकले इस गरज से श्री पुजारी को ग्रीष्मकालीन अवकाश में शराब भट्ठी में भी काम करना पड़ा। जगदलपुर-गीदम रोड पर रायकोट नामक गाँव की शराब भट्ठी में उन्होंने गद्दीदार की नौकरी भी की। गद्दीदार, यानी शराब बेचने वाला। इस तरह उनकी हाई स्कूल की शिक्षा पूरी हुई। मैट्रिक की परीक्षा भी श्री पुजारी ने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसके बाद श्री तिवारी ने ही जनपद प्राथमिक पाठशाला, आसना (जगदलपुर) में शिक्षक के पद पर श्री पुजारी को नियुक्ति दिलवायी। श्री पुजारी अपनी सफलताओं के लिये बारम्बार श्री तिवारी को याद करते हैं और उन्हें ही इसका सारा श्रेय भी देते हैं।  
शिक्षक पद पर नियुक्ति दिलवाने के साथ-साथ श्री तिवारी ने श्री पुजारी से कॉलेज में भी प्रवेश लेने के लिये कहा। इस तरह श्री पुजारी ने जगदलपुर के कॉलेज में प्रवेश लिया और प्रात:काल कॉलेज जाया करते और उसके बाद 11 बजे से अपनी नौकरी पर पाठशाला। इस तरह 3 वर्ष तक उनका अध्ययन और अध्यापन साथ-साथ चला। सन् 1965-66 में जब स्नातक की डिग्री मिली तो उन्होंने पी.एस.सी. में भाग्य आजमाया और पी.एस.सी की परीक्षा में नायब तहसीलदार के पद पर उनका चयन हो गया। इस तरह वे सन् 1967 से नायब तहसीलदार के पद पर आये और सन् 2002 में एडीशनल कलेक्टर के रूप में सेवा निवृत्त हुए। आरम्भ से ही श्री पुजारी का जीवन संघर्षों में बीता। उन्होंने गरीबी को बहुत नजदीक से देखा है। वे इसके द्रष्टा ही नहीं बल्कि भोक्ता भी रहे हैं। बस्तर में आदिवासियों का जो शोषण होता रहा है, उसे उन्होंने न केवल देखा है अपितु भोगा भी है। इसीलिये बस्तर के अभाव-ग्रस्त और शोषित-पीड़ित आदिवासियों के सम्बन्ध में वे लगातार चिन्तन करते रहे हैं कि आखिर यह शोषण क्यों? आखिर हमारा आदिवासी समाज कब जागृत होगा? कब और कैसे हम इसके खिलाफ आवाज उठा पाएँगे? और इसी सोच के साथ उनकी सृजन-यात्रा आरम्भ हुई। उनकी सृजन-यात्रा बस्तर के आदिवासियों के शोषण से सरोकार रखती है। उनकी प्रत्येक कविता में बस्तर का यह दर्द मुखर हो कर सामने आता है। "पोरटा" उनकी पहली कविता है। इस कविता के सृजन की पृष्ठभूमि बना 1966 में बस्तर में हुआ जघन्य पुलिसिया हत्याकाण्ड। इस हत्याकाण्ड में बस्तर के सबसे चर्चित और प्रिय महाराजा प्रवीर चन्द्र भंजदेव की अमानुषिक हत्या कर दी गयी थी।  
      इस काण्ड के कुछ दिनों बाद जब श्री पुजारी अपने घर बजावँड गये और उन्होंने अपने पिता को बताया कि गोली काण्ड में बस्तर महाराजा मारे गये तो वे इस पर विश्वास करने को तैयार ही नहीं थे। उनका विश्वास था कि बस्तर-महाराजा मर ही नहीं सकते। कारण, जो भी गोली उनके ऊपर चलेगी वह गोली नहीं होगी बल्कि बन्दूक से गोली की जगह पानी निकलेगा। यह उनके मन में दृढ़ विश्वास था। श्री पुजारी ने कहा कि नहीं, ऐसी बात नहीं है। वे तो गोली काण्ड में मारे गये हैं। इसी बात से उनके पिता उनसे नाराज हो गये और उनसे लड़ बैठे। उन्हें अन्त तक श्री पुजारी किसी भी तरीके से समझा नहीं पाये कि गोली काण्ड हुआ और वे उस गोली काण्ड में मारे गये। उनका तो यही मानना था कि 1910 में हुई सशस्त्र क्रान्ति (भुमकाल) में इस क्रान्ति के महानायक गुंडाधुर के ऊपर चलायी गयी गोलियाँ पानी में परिवर्तित हो गयी थीं। इसी तरह बस्तर-महाराजा पर भी चलायी गयी गोलियाँ पानी में परिवर्तित हो गयी होंगी और वे निश्चित ही जीवित होंगे। वे अपने पिता के मन में घर कर चुके इस अन्धविश्वास को दूर नहीं कर सके। और इसी घटना की परिणति थी उनकी पहली कविता "पोरटा"।
     
     आज प्रस्तुत है उनकी यही कविता हिन्दी अनुवाद के साथ : 

पोरटा


तुय नी गोठयाव 
आपलो दादी-पुरखा चो गोठ के।

सुनतो बिता बाँडा बाग मरलो
जयगोपाल बले सरलो
तुचो लोहू पानी होउन
जसन की बन्दूक ले निकरली
तुचो हात हथेयार होउन
जसन की सरग ले घसरली
तुचो गागतोर-चिचयातोर उआज
ढोल आउर माँदर चो उआज सँगे मिसली
तुचो आँसू झुमका बड़गी चो गुलगुली सँगे बोहली
आउर एदाँय तुचोय दुआर चो 
तुचोय रोपलो बड़ रुक
आपलो अउर गोटोक चेर के
तुचोय राँदा घरे उतराली। 

पाली धरतो काजे मोचो टोडरा सुकली
हात के गाले देउक नीं सकें
काटा गड़लो पाँय ने टेका देउक नीं सकें

तुय पोरटा!
तुचो भुक-पियास के खातो बिता निहाय
तुचो दुख-डँड के पिवतो बिता निहाय

मान्तर दख नू!
केब ले तो उपर पारा चो डोकरी इँदराबती
गाल के माँडी ने देउन 
मने-मने गागेसे
अउर दखेसे टुकुर-टुकुर।




अनाथ


मत करो तुम बातें
अपने दादा-परदादा (और पुरखों) की

मर गया है सुनने वाला बाँडा बाग
समाप्त हो गया है जयगोपाल भी
तुम्हारा लहू पानी बन कर 
जैसे कि निकला बन्दूक से
तुम्हारे हाथ हथियार बन कर 
जैसे कि गिर पड़े स्वर्ग से 
तुम्हारे रोने-चीखने का स्वर
मिल गया ढोल और माँदर के स्वरों में
बह गये तुम्हारे आँसू झुमका बड़गी के घुँघरुओं के सँग
और अब तुम्हारे ही द्वार का
तुम्हारे ही द्वारा रोपा गया वट-वृक्ष
अपनी एक और लट को
उतार चुका है तुम्हारे रसोई-घर में

सूख गया मेरा कण्ठ तुम्हारा साथ देते
नहीं धर सकता गालों पर हाथ
नहीं ले सकता काँटे गड़े पाँवों से सहारा 

तुम अनाथ!
नहीं है कोई तुम्हारी भूख-प्यास को खाने वाला
नहीं है कोई तुम्हारे दु:ख-कष्ट को पीने वाला

किन्तु देखो तो! 
पूर्व दिशा में रहने वाली बूढ़ी इन्द्रावती न जाने कब से 
अपने गालों को घुटनों पर दिये
रो रही है मन ही मन
और देख रही है टुकुर-टुकुर। 




टिप्पणी :

01. बाँडा बाग : रियासत कालीन बस्तर राज्य के एक तोप का नाम। यहाँ दो तोप थे जिनमें से एक का नाम "बाँडा बाग" और दूसरे का नाम "जय गोपाल" था। प्राय: ओड़िसा के जयपुर और बस्तर रियासत के बीच युद्ध हुआ करते थे। इन युद्धों में इन दोनों तोपों की अहम भूमिका रहा करती थी। कहा जाता है कि इनमें से एक तोप जयपुर रियासत की किसी पहाड़ी पर आज भी पड़ा हुआ है जबकि दूसरा तोप जगदलपुर में।
02. ढोल और माँदर : दोनों ही गोंडी परिवेश के लोक वाद्य। 
03. झुमका बड़गी : गोंडी परिवेश का एक वाद्य जिसे युवतियाँ बजाती हैं। इसे "गुजरी" और "तिरडुड्डी" भी कहा जाता है।




श्री पुजारी जी का पता है : 


श्री एस. एस. पुजारी
रिटायर्ड एडीशनल कलेक्टर
सिविल लाईन के पीछे
लालबाग
जगदलपुर 494001
बस्तर-छ.ग. 
मोबाईल : 94-060-02484 


दोनों  छायाचित्र : नवनीत वैष्णव


Saturday, 14 April 2012

मर्दापाल की मँडई में


धान की फसल कटी और मँडई-मेलों का दौर बस्तर में शुरु हो जाता है। दिसम्बर-जनवरी से ही जगह-जगह मँडई यानी मेले भरने लगते हैं। अन्तागढ़, घोटपाल, नारायणपुर, मर्दापाल, सकलनारायण, कोंडागाँव, चपका, दन्तेवाड़ा, केसकाल, रामाराम, बारसुर, ओरछा, छोटेडोंगर आदि स्थानों में भरने वाली मँडइयों में से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घोटपाल, रामाराम, सकलनारायण, चपका, नारायणपुर और छोटेडोंगर की मँडइयाँ हैं। चपका की मँडई एक समय काफ़ी मशहूर हुआ करती थी। हालाँकि वहाँ के मन्दिरों में स्थापित देवी-देवताओं (शिव-पार्वती) से आदिवासी जन-जीवन का सीधे कोई सरोकार नहीं है। इस दृष्टि से घोटपाल (गीदम के पास), नारायणपुर तथा रामाराम (कोंटा के पास) की मँडइयाँ आदिवासियों में काफ़ी महत्त्व रखती हैं। इन मेलों में विभिन्न गाँवों की ग्राम-देवियाँ एकत्र होती हैं और आपस में मेल-मुलाक़ात करती हैं।
  इसी तरह आसपास के आबाल-वृद्ध, सारे के सारे लोग इन अवसरों पर जुटते हैं। एक-दूसरे से मेल-मुलाक़ात होती है और ख़रीद-फरोख़्त भी। मेलों का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार होता है। कई चीज़ें इन मेलों में ख़रीदने की योजनाएँ साल भर पहले बना ली जाती हैं।
  मँडई पहले वस्तुत: देवी-देवताओं का समारोह-स्थल ही हुआ करता था। आज की तरह ख़रीद-फरोख़्त का केन्द्र, यानी कोई बाज़ार नहीं।
  आज नारायणपुर की मँडई देशी और विदेशी सभी जिज्ञासुओं और पर्यटकों के लिये अकर्षण का केन्द्र बन गयी है। नारायणपुर नामक यह छोटा सा क़स्बा अब अनजाना नहीं रह गया है। लोग अपने-अपने साधनों से यहाँ की मँडई की तिथि पता कर अपने-अपने साजो-सामान सहित पहुँच जाते हैं।
  मँडई में देवी-देवता आपस में मिलते हैं। दूर-दूर के सगे-सम्बन्धियों की आपस में भेंट-मुलाक़ात होती है। बाज़ार भरता है। ख़रीददार और दुकानदारों का जमघट लगता है। लेकिन नारायणपुर की मँडई में बस्तर के बाहर से ऐसे लोग जो न इन आदिवासियों के सगे-सम्बन्धी होते हैं और न दुकानदार और ख़रीददार, वे क्यों आते हैं.....? क्या मिल जाता है उन्हें यहाँ की मँडई में और कौन लोग होते है वे? इन प्रश्नों के उत्तर पाने के लिये आइये, हम आपको नारायणपुर की मँडई का एक छोटा सा दृश्य दिखायें :
  प्रमुख मँडई के एक दिन पहले से ही सुदूर अबूझमाड़ से अबूझमाड़ियों के दल के दल यहाँ आने लगते हैं। सड़क के एक किनारे, जहाँ तक दृष्टि जाती है, केवल ये ही ये नज़र आते हैं। जहाँ युवक अद्र्ध नग्न हैं, वहीं युवतियाँ भी। कमर में बिल्कुल छोटा सा कपड़ा.....कमर के ऊपर एकदम नंगी देह।
  यह दृश्य देख कर भी यदि आपको ऊपर के प्रश्नों के उत्तर न मिले हों तो हम ही बता देते हैं। इन्हीं दृश्यों को देखने, अपने कैमरों में क़ैद करने के लिये बाहर से आते हैं सैलानी। और अपनी तरह से उन फोटोग्राफ्स का उपयोग भी कर लेते हैं। बस! यही कारण है कि विभिन्न प्रचार माध्यमों से यहाँ के ऐसे चित्र और गढ़ी गयी आधारहीन कहानियों का प्रकाशन-प्रसारण दूर-दूर तक हो गया है और इसी आकर्षण में खिंचे सैलानी दौड़े चले आते हैं। वरना ऐसी कोई विशेष बात नहीं है कि आप सैकड़ों-हज़ारों किलोमीटर की दूरी पार कर यहाँ पहुँच जाएँ।
  शनिवार, 12 फरवरी 1983। मर्दापाल की मँडई। कोंडागाँव से पश्चिम की ओर 33 किलोमीटर दूर मर्दापाल के लिये कोंडागाँव से सुबह नौ बजे निकलते हैं हम। ट्रकें डिपो में लट्ठे खाली कर वापस जंगलों में जा चुकी हैं। वाहन की समस्या आ जाती है। सायकलों से चलना तय होता है। तभी एक ट्रक हमें मेंडपाल तक, यानी मर्दापाल से 7 किलोमीटर इधर तक के लिये मिल जाती है। जंगली रास्ते में ट्रक दौड़ने लगती है और ऊपर बैठे हुए यात्री डोलने लगते हैं। रास्ता बड़ा ही ख़राब है। ड्रायवर अपनी धुन में एक्सलरेटर पर दबाव बढ़ाता चला जा रहा है। रास्ते में और भी लोग ट्रक को रोकते हैं। सारे के सारे लोग मर्दापाल की मँडई देखने जा रहै हैं। सड़क के दोनों ओर आदिवासियों का रेला दिखायी पड़ता है। पैदल, सायकलों ओर बैल-गाड़ियों पर। औरतें सिर पर बोझ और बगल में बच्चों को बाँध कर लिपटाए हुए। पुरुष भी पीछे नहीं हैं। काँवड़ में एक ओर सामान तो दूसरी ओर बच्चों को बिठाए हुए। कुछ लोग सायकलों पर सामने बच्चों को और पीछे पत्नी को बिठाए मस्ती में झूमते हुए। क्या युवा, क्या बूढ़े और क्या बच्चे.....सभी के सभी, समूचा परिवार, गाँव और वह इलाक़ा ही उमंग में भरा बढ़ा चला जा रहा है। सभी को जल्दी है। बाज़ार भरने से पहले, बल्कि काफ़ी पहले पहुँचना होगा, वरना सारी तैयारियों के लिये समय कैसे मिल पाएगा.......! और इधर घने जंगलों के बीच से परम्परागत वेश-भूषा में आवृत्त आदिवासी बालाओं के झुण्ड किलकारियाँ-सी भरते सड़कों पर निकल आते हैं और उनकी चाल तेज़ होती जाती है। बीच में पड़ता है ढोल मँदरी नाम का वह स्थान, जहाँ पिछले नवम्बर-दिसम्बर में अपने-आप को परलकोटिया राजा कहने वाले बिहारी दास समर्थक लछिन-पेदा नामक आदिवासियों ने अपने साथियों के साथ लट्ठों से भरी ट्रकें खाली करवा ली थीं। वाक़ई बड़ा ही डरावना दृश्य है उस स्थान का। घने जंगल वैसे तो ज़रा भीतर जा कर हैं, फिर भी वहाँ की स्थिति कुछ ऐसी है कि एकबारगी मन में भय का समा जाना अस्वाभाविक नहीं लगता। घाटी-सी है वहाँ। सागौन का वृक्षारोपण भी उसी क्षेत्र में लगाया गया है। जंगल देख कर विश्वास करना ही पड़ेगा कि वाक़ई उस जगह आज से पन्द्रह-बीस साल पहले शेर आ निकलता रहा होगा। भाई वेलेज़ली जी इधर रह चुके हैं। वे बताने लगते हैं, "प्राय: आसपास के बाज़ारों के दिन यहाँ शेर घात लगाए बैठा होता था।" अभी भी, हालाँकि खोजने पर भी शेर तो क्या एक खरगोश भी वहाँ नहीं मिलेगा, किन्तु इसके बावज़ूद लोगों के मन में भय बराबर बना हुआ है। दरअसल जंगल वहाँ इतना घना है कि वही बड़ा भयावह लगता है। आते-जाते वनवासी भी उस जगह पहुँच कर थोड़ा-सा ठिठकते ही हैं। रास्ते में पड़ता है मँजुरडोंगर। इस गाँव के पानी के विषय में आज भी यह शिकायत है कि यह विषाक्त-सा हो गया है। कई लोग उस विषाक्त पानी के शिकार होकर काल-कवलित हो चुके हैं।
  बहरहाल, ट्रक चली जा रही है। मेंडपाल अब ज़्यादा दूर नहीं है। इतने में कण्डक्टर ऊपर आता है और किराये के पैसे वसूलने लगता है। वैसे इसके पहले ट्रक का क्लीनर भी आ चुका है। कुछ लोगों से पैसे वसूल कर एक किनारे जा टिका है। हमारी बगल में चार-पाच आदिवासी युवतियाँ खड़ी हैं। कण्डक्टर वहीं पहुँच जाता है। युवतियाँ कह उठती हैं, "अभी तो पैसे दिये हैं, क्या दुबारा लोगे?" तब कण्डक्टर अर्थ-भरी मुस्कराहट के साथ कह उठता है, "तुमसे पैसे किसने माँगे? क्यों दिये तुम लोगों ने पैसे?" युवतियाँ उसकी हँसी का अर्थ समझते हुए उत्तर देती हैं, "किराये के पैसे भला क्यों न देंगी?"
  तब तक कण्डक्टर उनसे सट-सा गया है। युवतियाँ इधर-उधर खिसकने लगती हैं। लेकिन कण्डक्टर का हाथ उनमें से एक लड़की के कन्धे पर पहुँच चुका है और उनका प्रतिरोध.........! ट्रक में सवार हम में से कोई भी, यहाँ तक कि उन आदिवासी युवकों में से भी कोई नहीं बोल पाता कुछ भी। बस, भीतर तक आत्मग्लानि का भाव पैठ जाता है। हम लोगों ने उधर से निगाहें हटा ली हैं और व्यस्त हो गये हैं साहित्य-चर्चा (?) में......।
  चर्चा रुकती है, ट्रक रुकने के साथ। ट्रक रुकी है मर्दापाल से सात किलोमीटर इधर, मेंडपाल जाने के रास्ते में। हम सब उतर पड़ते हैं। युवतियाँ हमसे भी पहले ट्रक से उतर कर सड़क पर बढ़ चली हैं। उनकी गति तेज़ है, मानो अब थोड़ी देरी भी रुकना ख़तरे से ख़ाली न हो।
  अब हमें छह किलोमीटर की दूरी पैदल तय करना है। कन्धे पर टँगा झोला जिसमें टेप रिकार्डर, कैमरा और टिफ़िन हैं, बड़ा भारी लग रहा है। निगाहें सड़क पर किसी परिचित सायकल वाले की तलाश में फिसलती हैं। इतने में भाग्यवश पोलँग गाँव के एक परिचित सायकल से आते हुए दिखते हैं और हम अपने झोले उनकी सायकिल में टाँग देते हैं। वे बेचारे शिष्टता के नाते सायकिल पर से उतर कर हमारे साथ पैदल हो लेते हैं। चार किलोमीटर की दूरी हमने बातचीत करते हुए तय कर ली। तभी कोंडागाँव के एक मित्र मोटरसायकिल से आते नज़र आते हैं और हम उस पर सवार हो गये हैं। और कुछ ही मिनटों में हम पहुँच गये हैं, मर्दापाल।
  अभी हम फ़र्लांग भर इधर हैं कि सड़क के दोनों ओर पेड़ों के नीचे श्रृंगार करती आदिवासी युवतियाँ, युवक, बूढ़े और बच्चे दिखलायी पड़ते हैं। हममें से एक कह उठता है, "मेकअप हो रहा है.......।" उस स्वर में व्यंग्य छिपा है और छिपी है शहरी कामुक मानसिकता.....।
  बहरहाल, आप भी हमारे साथ मर्दापाल की मँडई घूम लीजिए। किन्तु इसके पहले कि आप मर्दापाल की मँडई घूमने चलें, आइए आपको इस गाँव के विषय में थोड़ी सी जानकारी दे दें।
  मर्दापाल गाँव के किनारे से भँवरडिही नाम की नदी बहती है। आगे कुधुर गाँव के पास से डण्डामियों का इलाक़ा शुरु हो जाता है। लोग कहते हैं कि इस इलाक़े में रहने वाले डंडामी माड़ियों का व्यसन है लूट-खसोट। माड़िया, मुरिया आदि जनजातियाँ भी इन डंडामियों से भय खाती हैं। प्रसंगवश यह स्पष्ट करना आवश्यक होगा कि माड़िया-मुरिया-डंडामी माड़िया तथा अबुझमाड़िया आदि कोई अलग-अलग जातियाँ नहीं अपितु गोंड जनजाति की ही उप शाखाएँ हैं।
  आदिवासी विकास खण्ड, कोंडागाँव के अन्तर्गत आने वाले इस मर्दापाल गाँव में विकास-कार्य को रेखांकित करते अस्पताल, मिडिल स्कूल, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, आदिमजाति सेवा सहकारी समिति आदि की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। एक पशु-चिकित्सक भी यहाँ पदस्थ हैं, किन्तु चिकित्सालय के लिये फ़िलहाल भवन उपलब्ध नहीं है। मर्दापाल, गुड़ापदर और कुसमा को मिला कर कुल तीन मुहल्ले जो कि लगभग एक-एक किलोमीटर की दूरी पर हैं, मर्दापाल गाँव कहलाता है। यहाँ की सम्मिलित आबादी लगभग पाँच हज़ार है।
  दूर गाँव से आये देवी-देवता देवगुड़ी में एकत्र हैं। मोहरी, नगाड़ों और तुड़बुड़ी से देवपाड़ की स्वर-लहरी वातावरण में गूँज कर एक अनोखा आल्हादकारी समाँ बाँध रही है। सिरहों पर देवियाँ आरूढ़ हैं और वे अपने-आप से बेख़बर देवगुड़ी के प्रांगण में झूम रहे हैं। नगाड़ों पर पड़ती नँगारची के काड़ों की चोट के साथ सिरहों के नृत्य की गति में तेज़ी आ गयी है। किलकारियाँ भरते हुए अपने ही हाथ से अपने शरीर पर काँटों की लड़ियों का प्रहार, कभी लोहे के नुकीले छड़ अपने गालों के आर-पार करते और बड़े-बड़े काँटों के झूलों में एकबारगी धँसते हुए ये लोग बड़ा ही रोमांचकारी दृश्य उपस्थित कर रहे हैं। दर्शन के लिये आये आदिवासियों के समूह उन पर पुष्प-वर्षा कर रहे हैं और उनके पाँव छू कर मंगल-कामना कर रहे हैं।
  दरअसल मँडई का प्रमुख आकर्षण यही देव-धामी होते हैं। यहाँ आसपास के कई-कई देवी-देवता अपने-अपने प्रतीकों के माध्यम से एकत्र होते हैं। बड़े-बड़े लाट-बैरक (लम्बे बाँसों में विभिन्न रंगों के झण्डे और ऊपरी सिरे पर पीतल का कलश, यही) इन देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। मँडई में काफ़ी भीड़ है। लोग अभी भी दूर गाँव से सपरिवार चले आ रहे हैं। भीड़ अभी बढ़ती ही जाएगी, ऐसा लग रहा है।
  इधर-उधर घूमते वनवासियों के बीच इस साल की मँडई चर्चा का विषय बनी हुई है। सभी को महसूस हो रहा है कि और वर्षों की अपेक्षा इस वर्ष यहाँ की मँडई में काफ़ी रौनक है। लोग अत्यधिक प्रसन्नचित्त नज़र आ रहे हैं।
वस्तुत: किसी भी बाज़ार या मँडई में दिखने वाली रौनक का सीधा-सीधा ताल्लुक उस क्षेत्र की आर्थिक स्थिति से होता है। फसल ठीक रही तो उल्लास भर जाता है। और फसल की हालत कमज़ोर रही तो सारा उल्लास फीका पड़ जाता है।
  हमने कुछेक वनवासियों से इस बाबत चर्चा की तो उन्होंने उमंग के साथ बताया कि और वर्षों की अपेक्षा इस साल फसल अच्छी हुई। इसी वज़ह से मँडई भी काफ़ी अच्छी भरी है।
  हम अब मँडई में प्रवेश कर चुके हैं। इधर बायीं ओर कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिये पुलिस-चौकी बनायी गयी है। जिलाधीश कल यहाँ के दौरे पर आये थे, शायद आज भी आयें। बिल्कुल मुहाने पर गल्लों के पसरे लगे हुए हैं। उड़द, अरहर, इमली, तिल आदि के ढेर उन पसरों में लगे हैं। आदिवासी आ-आ कर अपने साथ लायी उपज व्यापारियों के हाथों सौंप रहे हैं। हर आदिवासी का अपना पहचाना हुआ व्यापारी है। वह बुलाने पर भी दूसरे व्यापारी के पास नहीं जा रहा है। हर्रा की खरीदी वन विभाग द्वारा की जा रही है। हर्रा की क़ीमत तो ख़ैर सही मिल रही है, लेकिन दूसरे उपज की क़ीमत सही मिल रही है या नहीं, आदिवासी इससे बिल्कुल ही बेख़बर हैं।
  आगे बढ़ते हैं तो कपड़ों की दुकान, बर्तनों, आभूषणों और फैन्सी सामानों के दुकान नज़र आते हैं। इन दुकानों पर आदिवासियों की भीड़ लगी है। होटलों में लोग बैठे खा-पी रहे हैं। पान की दुकानों में युवक-युवतियाँ खड़े पान की गिलौरी ले कर एक-दूसरे को खिला रहे हैं।
  साल भर की प्रतीक्षा के बाद तो आती है मँडई। और मँडई आती ही इसीलिये है कि मर-जी कर बचे हुए लोग आपस में मेल-मुलाक़ात कर सकें। आनन्द और उमंग के दो क्षण आपस में मिल कर गुज़ार सकें। कल पता नहीं, कौन कहाँ रहे.....! क्या पता जीते बचते भी हैं या नहीं.....? दूर-दराज़ के सगे-सम्बन्धियों से भी भेंट यहीं होती है। साल भर के दु:ख-सुख का लेखा-जोखा यहीं......किसी पेड़ के नीचे बैठ कर लगाया जाता है। साथ लायी सलफी-शराब और लंदा आपस में मिल-बाँट कर पी जाती है। मुलाक़ात और मधुर क्षणों की स्मृति में गोदने भी तो यहीं गुदवाए जाते हैं। बाँहों में, हथेलियों पर, चेहरे पर। और कंघी, चुनौटी, ककवा भी यहीं एक-दूसरे को भेंट किए जाते हैं।
  हम सोने-चाँदी, पीतल-अल्युमिनियम के आभूषणों की एक दुकान के पास रुक गये हैं। आदिवासियों ने चारों ओर से उस दुकानदार को घेर रखा है। हर किसी को सौदा जल्दी ख़रीद लेने की जल्दी पड़ी है। दुकानदार सभी की बात सुनने का भरसक प्रयास कर रहा है। और चाह रहा है कि कोई भी ग्राहक वहाँ से उठ कर दूसरी जगह न जाने पाए। हमने वहाँ बैठे हुए एक बुज़ुर्ग से बातचीत की :
  "अपना नाम बताएँगे आप?"
  इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने अपने प्रति प्रश्न में दिया, "नाम जान कर क्या करेंगे?"
  हमने दुबारा नाम नहीं पूछा।
  "अच्छा, ठीक है। कौन गाँव से आये हैं, आप?" हमारा अगला प्रश्न था।
  "नवागाँव से।"
  "क्या ख़रीद रहे हैं?"
  "कुछ नहीं।"
  "तब बैठे कैसे हैं?"
  "ऐसे ही। यह तो मेरी रोज़ बैठने की जगह है। पहचान के हैं, इसलिये बैठा हूँ।"
  हमारी बातचीत से दुकानदार को शंका हुई। उसने बातचीत रिकार्ड करते देख कर कारण पूछा था। हमने बताया, हम अख़बार के लिये रपट तैयार कर रहे हैं। तब उनकी मुखाकृति देखने लायक़ हो गयी थी। थोड़ी देर के लिये वह ग्राहकों से बातचीत करना भूल गया था। हम वहाँ से आगे बढ़ तो गये लेकिन प्रश्न घूमता रहा ज़ेहन में कि आख़िर वह बुज़ुर्ग बिना बात वहाँ क्यों बैठा है? तभी हमारे साथ घूम रहे एक स्थानीय मित्र ने बताया कि व्यापारी लोग इसी तरह हर गाँव के प्रभावशाली लोगों से साँठ-गाँठ रखते हैं। और आप देखेंगे कि हर दुकान में, विशेषत: कपड़े, बर्तन और आभूषणों की दुकानों में एक न एक क्षेत्रीय व्यक्ति बिना काम बैठा हुआ मिलेगा। दरअसल, गाँव के लोग जब यह देखते हैं कि उनके क्षेत्र का प्रतिष्ठित व्यक्ति उस दुकान में बैठा है तो वे उधर ही चले जाते हैं------इस आशा से कि वह व्यक्ति उन्हें सस्ते में सौदा दिला देगा। जबकि व्यापारी उनकी इसी मानसिकता का ग़लत फ़ायदा उठाता है। उस प्रतिष्ठित व्यक्ति या ग्राहक को पता भी नहीं चलता और व्यापारी उनसे वस्तु की अधिक क़ीमत वसूल कर लेता है।
  वाकई उनकी बात सच निकली। प्राय: इस क़िस्म की हर दुकानों में एक न एक व्यक्ति, जो उस क्षेत्र का प्रतिष्ठित व्यक्ति (जैसे सरपंच, पटेल, कोटवार, माँझी, मुखिया या गाँयता-पुजारी आदि) था, हमें तम्बाकू मल कर खाता, दुकानदार से गपियाता या ग्राहकों से बतियाता, मोल-भाव करता हुआ मिला।
  हम अब कपड़े की दुकान के सामने ठहर गये हैं। एक आदिवासी युवक को निवार ख़रीदते देख जिज्ञासा हो आयी है। क्या आग जला कर उसके चारों ओर सोने वाले आदिवासी अब निवार-बुनी चारपायी का उपयोग करने लगे हैं या कि सिंयाड़ी रस्सी का उपयोग अब नहीं होता......!
  "क्या ले रहे हो, जी?"
  "........." वह उत्तर में मुस्करा देता है। उस वस्तु का नाम नहीं बता पाता।
  "क्या करोगे इसका, खाट में लगाओगे?" हम फिर पूछते हैं।
  उत्तर वह अब भी नहीं देता। उसकी जगह दुकानदार कह उठता है : "नाचने के लिये यो लोग निवार लेते हैं।"
  अब हम चौंकते हैं। नाच में निवार का क्या काम? दुबारा पूछने पर दुकानदार के साथ-साथ आसपास बैठे दो-तीन दूसरे लोग बताते हैं, "नाच के समय इसे कमर में लपेट कर ऊपर से घुँघरु बाँधते हैं।" 
  नाम पूछने पर पहले तो वह सकपका-सा जाता है कि पता नहीं क्यों पूछ रहे हैं। फिर वह हकलाता हुआ अपना नाम-गाँव बतलाता है, "तातीराम, गाँव : कड़ेनार।"
  बर्तन की दुकान पास ही में लगी है। यहाँ भी वही दृश्य! एक बिना काम का आदमी बैठा हुआ है। तीन-चार आदिवासी ग्राहक थाली-गिलास आदि हाथ में उठा कर देख रहे हैं। दुकानदार बर्तन ख़रीदने के लिये बैठे एक आदिवासी से मोल-भाव कर रहा है। उस व्यक्ति को उस बर्तन की क़ीमत अधिक लग रही है और वह अब वहाँ से उठ भी गया है। हम देख रहे हैं, दुकानदार उस बर्तन का भाव अब क्रमश: कम करता जा रहा है और कोहनी से उस बिना काम के व्यक्ति को टहोका भी मारता जा रहा है। वह ख़रीददार शायद समझदार है। उठ कर बाहर भीड़ में ग़ुम हो गया है। दुकानदार अन्तिम बार चिल्लाता है, "तीन कोड़ी ने एब्बे देयँदे। ए ना एय गोतिया.....(साठ रुपये में अभी दे दूँगा। ओ भाई.....!)" किन्तु वह ख़रीददार ओझल हो चुका है। खिसिया कर वह दुकानदार अपने नौकर से कहता है, "ले बे, रख उधर। साला, चालू लगता है!"   और फिर व्यस्त हो गया है-------"आले ना आना, कोन कसला आय जाले.....? (अच्छा जी लाओ, कौन सा लोटा है......?)"
  थाली खरीद कर वहीं बैठी हुई एक युवती से हम पूछ बैठते हैं, "क्यों बाई, थाली की क़ीमत तो ठीक है, न?"
  वह उत्तर में सिर हिला देती है केवल। ग्रामीणों की आम धारणा है कि मँडई में चीज़ें सस्ती मिलती हैं। दुकानदारों को ग्रामीणों की इसी धारणा के चलते काफ़ी फ़ायदा होता है। ड्योढ़े-दोगुने क़ीमत में ये अपनी चीज़ें इन मेलों में बेच लेते हैं। वहीं कुछ ग्रामीण ऐसे भी हैं जो इस सही तथ्य से परिचित हैं। ऐसे ही एक आदिवासी युवक से हमारी भेंट हो गयी। सायतूराम वनग्राम कारसिंग के कोटवार हैं। वे बताते हैं कि मेलों में चीज़ें कभी सस्ती नहीं मिलतीं। इसलिये वे मेलों में कभी कोई सामान नहीं लेते।
  "आप ऐसा कैसे कह सकते हैं?" हमने पूछा।
  "मैं रोज़ कोंडागाँव आना-जाना करता हूँ। वहाँ के बाज़ार या दुकानों में जो चीज़ें दस रुपये में मिलती हैं, यहाँ वही चीज़ें पन्द्रह रुपये से कम में नहीं दे रहे हैं दुकानदार।" सायतूराम का जवाब था।
  दुकानदारों को इन मेलों में वाक़ई फ़ायदा होता है या नहीं, इसकी जानकारी हमें मिली एक व्यापारी से ही। पूछने पर उन्होंने गर्व सहित उत्तर दिया : "अरे भाई! इन आदिवासियों को क्या मालूम, किस चीज का दाम क्या है? दस रुपये की चीज हम बीस रुपये बताते हैं। भाव उतारना इन आदिवासियों का धंधा ही है। उतरते-उतरते पन्द्रह रुपये पर तो सौदा पट ही जाता है।"
  उस व्यापारी से निबट कर आगे बढ़े तो एक आदिवासी बूढ़े को चक्की रखे देखा। बूढ़े बाबा को यही नहीं पता था कि कितने रुपये में उसे वह चक्की बेचना चाहिये। पूछने पर बताया, "बीस भी है, पचीस भी है। मैं नहीं जानता।" 
  हमने कुरेदा, "मेहनत कितने दिनों की लगी होगी?"
  "पाँच दिन कम से कम।"
  हम चौंक गये। पाँच दिनों की हाड़-तोड़ मेहनत की क़ीमत वह बेचारा केवल बीस या पचीस रुपये आँक रहा है।
  अब ऐसा नहीं है कि आदिवासी की आवश्यकताएँ मात्र नमक-मिर्च तक ही सीमित रह गयी हों। उनकी आवश्यकताएँ भी दिनों-दिन बढ़ती जा रही हैं। आसपास भरने वाले साप्ताहिक बाजार और मेले-मँडई के कारण और दूसरी चीजों से भी ये लोग परिचित हो गये हैं और उनका उपयोग जानने के बाद आवश्यकता महसूस करने लगे हैं। इधर इन मेलों में काफी फर्क भी आ गया है। कोरमेल गाँव से यहाँ मँडई देखने आये एक आदिवासी बुजुर्ग श्री कमलू से बातचीत करने पर वह अन्तर स्पष्ट हो जाता है, "बहुत अन्तर आ गया है, अब तो।" कमलू की बूढ़ी आँखों में पिछला दृश्य उभरने लगा है और स्वर में वर्तमान के प्रति असन्तोष भी...."देवता के उतरे हुए कपड़ों को हम पहना करते थे। आज तो स्थिति दूसरी है। किसम-किसम के कपड़े पहनने लगे हैं लोग। हमने पिछौरी और कुरता तो कभी पहना ही नहीं था।" 
  पुराने लोग पता नहीं क्यों अपनी उन परम्पराओं को ओढ़े रहना चाहते हैं, जबकि नयी पीढ़ी एकदम उनके खिलाफ है। वह अब रंग-बिरंगे और नए फैशन के कपड़े पहनना चाहती है।
  बात को मँडई की ओर ले जाते हुए हमारा प्रश्न है, "आप बताइये, मँडई में क्या फर्क नजर आता है आपको?" 
  इस पर वे सामने गुजर रहे देव-धामी की ओर इंगित कर कहते हैं, "ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। वो   देखिए, सामने लाट-बैरक जा रहे हैं और ये लड़के-लड़कियाँ कैसे उन देवताओं के सामने बन-ठन कर घूम रहे हैं! पहले ऐसा नहीं था। किसी की क्या मजाल थी कि देव बिहरने के समय सामने आ जाए।" वे पल भर रुकते हैं, फिर कुछ याद कर कहने लगते हैं, "घोटिया गाँव की मँडई की बात है। देव बिहरने के समय देवगुड़ी से दुलारदई देवी निकलीं और मँडई में प्रवेश किया ही था कि एक सजी-धजी औरत उनके सामने पड़ गयी। देवी ने कहा, अब मैं क्या घूमूँगी मँडई में। यहाँ तो यह औरत ही मुझसे अधिक सजी-सँवरी है। और देवी देवगुड़ी में वापस हो गयी। शाम होते न होते उस स्त्री की मृत्यु हो गयी।"
  ऐसी बात नहीं है कि आज की पीढ़ी के मन में देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा नहीं रह गयी है। किन्तु हाँ, पुरानी ऐसी परम्पराओं को वे जरूर छोड़ देना चाहते हैं, जिनके चलते उन्हें नुकसान उठाना पड़ रहा है।
  एक नर्तक-दल ने अभी-अभी मँडई-स्थल में प्रवेश किया था। सिर में सींग पहने, गले में माँदर और ठुड़का वाद्य-यन्त्र लटकाए मस्ती में बजाते-नाचते आदिवासी युवा मँडई में घूम रहे थे। हमने उनमें से एक को रोक कर पूछा, "कौन गाँव के हो?" हमारा इस तरह रोक कर पूछना उसे शायद अच्छा नहीं लगा, "......अरे, पुसपाल का। पुसपाल गाँव किसका, मर्दापाल किसका........?" उत्तर दिया उसने, लेकिन उनकी आँखों में हमारे प्रति घृणा और स्वर में आक्रोश स्पष्ट परिलक्षित हो रहा था। वह फिर बजाता-झूमता आगे बढ़ गया।
  मँडई में हम देख रहे हैं, लोग जहाँ पास के गाँवों पुसपाल, नवागाँव, कुधुर, कोरमेल, रानापाल, हड़ेली, पड़ेली, सुदापाल वगैरह से आये हैं, वहीं काफी दूर-दूर, जैसे तोकापाल, लोहंडीगुड़ा, चारामा आदि से भी आये हुए हैं। इस साल इधर गन्ने की फसल भी अच्छी हुई है। तभी तो यहाँ गन्ने का रस और गुड़ बहुत सस्ता बिक रहा है।
  मनोरंजन के लिये यहाँ बाहर से झूला वाले आये हैं। फोटो स्टूडियो और सर्कस वालों का प्रवेश अभी इधर नहीं हुआ है। हाँ, पिछली रात में दूर-दूर से आये हुए आदिवासी नर्तक-दलों ने कोकरेंग नृत्य सारी रात किया था। आज की रात बारह ओड़िया-नाच-दलों के आने की सम्भावना है। छत्तीसगढ़ी नाचा के भी आने की सम्भावना है।
  बहुत अच्छी बात जो यहाँ की मँडई में देखने को मिली, वह थी आदिवासी युवतियों का वस्त्र धारण किए होना। अद्र्धनग्न कोई भी नहीं दिख रही थी, जबकि नारायणपुर की मँडई में सुदूर अबूझमाड़ से आने वाली आदिवासी युवतियों के वक्ष प्राय: नग्न होते हैं। बहुत से शहरी यहाँ भी इसी आशा से आये हुए थे कि आदिवासी बालाओं के उघड़े बदन देख कर तृप्त हो लें। लेकिन जब ऐसा दृश्य उन्हें यहाँ नहीं दिखा तो वे लोग स्पष्ट कहते सुने गये, "यहाँ आने का कोई मतलब ही नहीं निकला। साले, सारे के सारे कपड़े पहने हुए हैं।"
  जिज्ञासा बढ़ी। हमने कुछेक आदिवासी युवकों से पूछा तो उन्होंने बताया, "लछिन-पेदा (इनका ज़िक्र पहले भी आ चुका है) ने हमें यह सब सिखाया है। अब इस इलाके के लोग, जो उनके सम्पर्क में हैं, न रात में घोटुल जाते हैं और न अद्र्धनग्न रहते हैं।"
  अधिकांश लोग प्रसन्न हैं कि इस साल की मँडई में कोई उपद्रव नहीं हुआ। पिछले साल तो माड़ियों ने लूट-पाट मचायी थी।
  शाम घिरने से पहले ही आसपास के गाँवों के लोग अपने-अपने बोझे ले कर वापस होने लगे हैं। जल्दी घर पहुँचेंगे तभी तो खा-पी कर रात में नाच देखने आयेंगे। दूर से आये आदिवासी भी अपने-अपने डेरों की ओर, जो कि पेड़ों के नीचे बने हुए हैं, जाने लगे हैं। अब कुछ घंटों के बाद नाच शुरु होंगे। नर्तक-दलों का आना तो शुरु हो ही गया है। और तब रात में मँडई की रौनक एक बार फिर देखते ही बनेगी।
("नवभारत" दिनांक 27 फरवरी 1983 अंक में प्रकाशित)